अस्पताल मरीजों से जिन मेडिकल कंज्यूमेबल्स का पैसा वसूलते हैं, उनकी खरीद कीमत और एमआरपी के बीच का अंतर चौंकाने वाला है. कुछ मामलों में यह ट्रेड मार्जिन 2000 फीसदी से भी ज्यादा बताया जा रहा है. इस मुद्दे को लेकर महाराष्ट्र के एफडीए चीफ तुकाराम मुंडे ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है. उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में यह साफ नहीं है कि इस भारी अंतर का फायदा आखिर किसे मिल रहा है.
मुंडे ने NDTV से खास बातचीत में कहा कि मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और मरीजों से वसूले जाने वाले अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच काफी बड़ा फर्क है. उनके मुताबिक यह समस्या किसी एक उत्पाद तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग सभी मेडिकल कंज्यूमेबल्स में दिखाई दे रही है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि खरीद कीमत में मिलने वाला लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच रहा है.
उन्होंने कहा कि इसी वजह से इस पूरे मामले को NPPA के सामने उठाया गया है. मुंडे के अनुसार यह जांच की जरूरत है कि निर्माता कंपनियां मेडिकल उत्पादों का एमआरपी किस आधार पर तय करती हैं और इतने बड़े ट्रेड मार्जिन की गुंजाइश कैसे बनती है. उन्होंने इसे फार्मा सेक्टर में सूचना असमानता और पारदर्शिता की कमी से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया.
कौन है इसका जिम्मेदार?
जब उनसे पूछा गया कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है, तो उन्होंने कहा कि यह किसी एक संस्था या व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से जुड़ा सवाल है. उनका कहना था कि यदि कोई निर्माता किसी अस्पताल को ऐसा उत्पाद देता है, जिसमें ट्रेड मार्जिन 2000 फीसदी से अधिक हो, तो यह स्वीकार्य नहीं माना जा सकता. ऐसे मामलों में संबंधित नियामक प्राधिकरणों के हस्तक्षेप की जरूरत है.
ट्रेड मार्जिन कितना होना चाहिए, इस सवाल पर मुंडे ने कहा कि यह सरकार और NPPA को तय करना है. उन्होंने बताया कि इस विषय पर संबंधित पक्षों के साथ चर्चा की जाएगी और उसके बाद उचित निर्णय लिया जाएगा.
अब तक क्या कदम उठाए गए हैं?
मुंडे ने कहा कि फिलहाल उनकी ओर से जो सबसे बड़ा कदम उठाया गया है, वह इस मुद्दे को संबंधित प्राधिकरण के संज्ञान में लाना है. उनके मुताबिक यदि ऐसी प्रथाएं एक राज्य में हो रही हैं, तो संभव है कि दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की स्थिति हो. इसलिए इसकी व्यापक जांच जरूरी है.
उन्होंने बताया कि NPPA को जानकारी देने के बाद प्राधिकरण ने भी इस दिशा में काम शुरू कर दिया है और कुछ स्तर पर निर्णय प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही इस संबंध में ठोस कदम देखने को मिल सकते हैं.
क्या अस्पतालों के खिलाफ दर्ज किए जा सकते हैं एफआईआर?
जब उनसे पूछा गया कि क्या मरीजों के साथ धोखाधड़ी करने वाले अस्पतालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, तो मुंडे ने साफ कहा कि केवल इस आधार पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती. उनके मुताबिक अस्पताल यदि एमआरपी से अधिक मूल्य नहीं वसूल रहे हैं, तो वे कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं. एफआईआर तभी दर्ज हो सकती है जब किसी कानूनी प्रावधान का उल्लंघन साबित हो.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कानून और नैतिकता दो अलग-अलग पहलू हैं. उनका कहना है कि भले ही मौजूदा नियमों के तहत यह अवैध न हो, लेकिन क्या मरीजों से इतनी ऊंची कीमत वसूलना उचित और नैतिक है, यही सवाल उन्होंने संबंधित प्राधिकरण के सामने रखा है.
मुंडे ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि संबंधित प्राधिकरण ने उनकी ओर से उठाई गई चिंताओं का संज्ञान ले लिया है. उन्होंने यह तो नहीं बताया कि बदलाव कब तक होंगे, लेकिन विश्वास जताया कि मरीजों के हित में जरूरी सुधार और नीतिगत कदम जल्द सामने आ सकते हैं.
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