भारतीय सैनिकों द्वारा कारगिल की बर्फीली चोटियों को फिर से हासिल करने के ढाई दशक बाद भी, यह संघर्ष भारत की सैन्य नीति, रक्षा आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को आकार दे रहा है. हर साल 26 जुलाई को मनाया जाने वाला 'कारगिल विजय दिवस', 1999 के कारगिल युद्ध में भारत की फतह की याद दिलाता है. यह दिन 'ऑपरेशन विजय' के दौरान अपनी जान गंवाने वाले 527 सैनिकों की याद दिलाता है और दुनिया के सबसे मुश्किल युद्ध-क्षेत्रों में से एक में लड़ने वाले हजारों सैनिकों के साहस को नमन करता है.
दिलों में जिंदा हैं उदयमान
विजय दिवस के मौके पर एनडीटीवी उस कमरे में पहुंचा, जो एक मां ने अपने बेटे के लिए बनाया था. एक ऐसा बेटा जो कभी वापस नहीं लौटा. कारगिल युद्ध के हीरो 5 जुलाई, 1999 को बर्फीली ऊंचाइयों पर शहीद हो गए थे. 27 साल बाद भी, उनकी मां उनकी यादों को संजोए हुए हैं. वे उस टुकड़ी का हिस्सा थे, जिसकी अगुवाई ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव कर रहे थे, जिन्हें परमवीर चक्र मिला था. उदयमान सिंह को गोली लगी थी, लेकिन वे आखिरी सांस तक लड़ते रहे.

आप आज भी उनके वॉलेट पर गोली का निशान देख सकते हैं. वही गोली, जिसने उन्हें हमेशा के लिए उनसे दूर कर दिया. यहां एक रुपये का सिक्का है, एक ऐसा सिक्का जिस पर गोली लगी थी. उन्होंने इसे संभालकर रखा, क्योंकि यह आखिरी चीज थी जो उन्हें छूकर गुजरी थी.

इतने साल बाद भी, जब वे इस कमरे में कदम रखती हैं, तो उनकी आंखें भीग जाती हैं. गर्व तो है, लेकिन दर्द कभी कम नहीं हुआ.

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उदयमान सिंह की बहन वंदना लंगेह कहती हैं, "हमें अपने भाई पर गर्व है. मैं उन्हें राखी नहीं बांध पा रही हूं, लेकिन उनकी महान कुर्बानी की वजह से कई और बहनें ऐसा कर पा रही हैं."
उनके लिए, यह सिर्फ एक कमरा नहीं है. यह एक पवित्र जगह है. यह उन सभी जन्मदिनों की याद है, जो उन्होंने नहीं मनाए. वे सभी त्योहार जब वे यहां नहीं थे. वे सभी बातें जो वे कभी कह नहीं पाए.

कौन थे उदयमान सिंह?
ग्रेनेडियर उदयमान सिंह, जम्मू के शमाचक के रहने वाले भारतीय सेना के एक बहादुर सैनिक थे. 5 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल पर लड़ते हुए 18 साल की उम्र में वे शहीद हो गए. मोर्चे पर असाधारण बहादुरी और वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से सम्मानित किया गया.

कारगिल हीरो उदयमान सिंह की यादें 27 साल बाद भी उनकी मां के पास जिंदा हैं. कारगिल युद्ध के 27 साल बाद भी ग्रेनेडियर उदयमान सिंह की यादें जम्मू में उनकी मां द्वारा सहेजकर रखे गए एक कमरे में जिंदा हैं. 5 जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर 18 साल की उम्र में शहीद हुए उदयमान सिंह घायल होने के बावजूद लड़ते रहे. गोली के निशान वाला उनका वॉलेट और उनका सामान उनकी कुर्बानी की अनमोल यादें हैं.
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