- मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान रोकने और झड़प के बाद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को सितंबर 2022 में ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया था लेकिन विवाद जारी है
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने राजनेताओं पर सनातन धर्म को बांटने और गाय हत्या को लेकर सरकार पर आरोप लगाए
मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान के लिए रोके जाने और शिष्यों एवं पुलिसकर्मियों के बीच हुई झड़प के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम घाट पर धरने पर बैठे गए. इसके बाद पुलिस और प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस भेज दिया और उनसे शंकराचार्य पद के दावे पर ही स्पष्टीकरण मांग लिया. इस घटना के बाद से विवाद गहरा गया है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिषपीठ के असली शंकराचार्य हैं कि नहीं? हालांकि ये पहला मामला नहीं है जब उनके नाम के साथ विवाद जुड़ा है.
कब बने शंकराचार्य?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने संस्कृत व्याकरण, वेद, पुराण, उपनिषद, वेदांत, आयुर्वेद और शास्त्रों की गहन शिक्षा के बाद 1990 के दशक में संन्यास लिया. स्वामी करपात्री जी के अस्वस्थ होने पर वे उनकी सेवा में जुट गए और अंतिम समय तक उनके साथ रहे. इसी दौरान उनका संपर्क ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुआ. 15 अप्रैल 2003 को उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा दी गई और तभी उन्हें नाम मिला स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती. सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) का शंकराचार्य नियुक्त किया गया.

हालांकि इस पद को लेकर तब से ही कुछ विवाद और कानूनी पेच सामने आते रहे हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट में है. उनके वकील टीएन मिश्रा के अनुसार, 11 सितंबर, 2022 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मृत्यु के बाद, 12 सितंबर, 2022 को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का 'पट्टाभिषेक' हुआ. 21 सितंबर, 2022 को स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने अभिषेक को रोकने के लिए एक अपील दायर की थी. हालांकि, मिश्रा ने दावा किया कि कोर्ट ने पाया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछली कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे और अपने आदेश में कोर्ट ने खुद उन्हें "शंकराचार्य" कहा था.
कोर्ट ने क्या कहा?
यह मामला 2020 से सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है. अक्टूबर 2022 में, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में ज्योतिष पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी. जस्टिस बी.आर. गवई और बी.वी. नागरत्ना की बेंच ने यह आदेश तब दिया, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य ने एक हलफनामा दायर किया है, जिसमें कहा गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में नियुक्त करने का समर्थन नहीं किया गया है.

केस नंबर
- सी.ए. नंबर 003010 / 2020, 27-08-2020 को रजिस्टर्ड
- एसएलपी(सी) नंबर 034253 - / 2017, 08-12-2017 को रजिस्टर्ड
शंकराचार्य बने रहने पर कब-कब उठे सवाल?
सितंबर 2022 से ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बनाए जाने को लेकर विवाद रहा है. उसी समय संन्यासी अखाड़े ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था. उस समय निरंजनी अखाड़े के सचिव और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने दावा किया कि अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति नियमों के खिलाफ है. उनका कहना था कि शंकराचार्य की नियुक्ति की एक प्रक्रिया होती है जिसका पालन नहीं किया गया.
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनसे जुड़े विवाद
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती उत्तराखंड के जोशीमठ स्थित ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य हैं.
- इनका जन्म 5 अगस्त, 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था.
- उनका मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है. उन्होंने वाराणसी के मशहूर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा ग्रहण की है.
- पढ़ाई के दौरान वो छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे. वे 1994 में छात्रसंघ का चुनाव भी जीते थे.
- उमाशंकर उपाध्याय की प्राथमिक शिक्षा प्रतापगढ़ में ही हुई. बाद में वे गुजरात चले गए.
- इस दौरान वो धर्म और राजनीति में समान दखल रखने वाले स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य के संपर्क में आए.
- उनके कहने पर ही उमाशंकर उपाध्याय ने संस्कृत की पढ़ाई शुरू की. करपात्री जी के बीमार होने पर वे आ गए और उनके निधन तक उनकी सेवा की.
- इसी दौरान वे ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के संपर्क में आए.
- संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें 15 अप्रैल 2003 को दंड सन्यास की दीक्षा दी गई. इसके बाद उन्हें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती नाम मिला.
राजनेताओं पर सनातनियों को बांटने का आरोप
शंकराचार्य के बयानों को लेकर भी कई बार सवाल उठे हैं. उन्होंने राजनेताओं पर सनातनियों को बांटने का आरोप लगाया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि राजनेताओं के कारण और तथाकथित उनकी राजनीति के कारण हमारा सनातन धर्म प्रभावित हो रहा है. हमारे धर्म में चार वर्ण की व्यवस्था है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि चारों वर्ण भगवान से पैदा हुए हैं, मतलब सभी भाई-भाई हैं. लेकिन इन बातों को तोड़-मरोड़ कर सनातन धर्म के लोगों को ही एक दूसरे के सामने खड़ा किया जा रहा है, जिससे सनातन धर्म कमजोर हो रहा है.

गाय हमारी माता, लेकिन सरकार उसकी हत्या का लाइसेंस दे रही
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जिस गाय को माता का दर्जा प्राप्त है, जिसे हम पूजते हैं, हमारे ही देश में उसकी हत्या कर बेची जा रही है. डॉलर के लिए सरकार उसे काटने का लाइसेंस दे रही है. ये सरकार हम सनातनियों के वोट से ही बनती है और हमारा वोट लेकर हमारी मां को ही काटोगे, यह धृष्टता आजादी के बाद से लगातार हो रही है.
सिंधु जल समझौते को रोकने पर सरकार को घेरा
उन्होंने कहा कि सरकार ने कहा कि पाकिस्तान के लिए सिंधु जल रोक दिया जाएगा. जब हमने भारत सरकार की जल रोकने की व्यवस्था के बारे में पता किया, तो पता चला कि सरकार के पास कोई व्यवस्था ही नहीं है. अगर सरकार इसको रोकने की तैयारी करे तो कम से कम 20 साल लगेंगे और पैसा कितना लगेगा, उसकी कोई बात ही नहीं है. संधि को खत्म करके जनता को मूर्ख नहीं बना सकते. सबसे पहले आतंकी हमले के जिम्मेदार की पहचान कर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करें. इसके बाद सीमा पार बैठे आकाओं को सबक सिखाने के लिए सरकार युद्ध की तैयारी करे. उन्होंने वक्फ बिल को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा और कहा कि यह एक राजनीतिक शिगूफा मात्र है और इसका कोई व्यावहारिक असर नहीं होगा.
केदारनाथ मंदिर से सोना गायब होने का लगाया आरोप
15 जुलाई 2024, को अविमुक्तेश्वरानंद ने केदारनाथ मंदिर से 228 किलो सोना गायब होने का आरोप लगाया था. साथ ही काशी कॉरिडोर को लेकर भी सवाल खड़े किए थे. उन्होंने कहा कि काशी में मंदिर तोड़े, सिर्फ मंदिर ही नहीं दो-दो हजार साल, 1500 साल, हजार साल पुरानी मूर्तियों को तोड़कर फेंका गया. हमसे नहीं देखा गया तो हमने विरोध किया, जब तक जीवित रहेंगे तब तक करते रहेंगे.

एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे पर बयान
जुलाई 17, 2024 को शंकराचार्य ने कहा था, ''हम हिंदू धर्म को मानते हैं. हम पुण्य और पाप में विश्वास करते हैं. विश्वासघात को सबसे बड़ा पाप कहा जाता है, यही उद्धव ठाकरे के साथ हुआ है. उन्होंने मुझे बुलाया था. मैं मातोश्री गया. उन्होंने स्वागत किया. हमने कहा कि उनके साथ हुए विश्वासघात से हमें दुख है. जब तक वे दोबारा सीएम नहीं बन जाते, हमारा दुख दूर नहीं होगा.''
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अयोध्या में श्री राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकराया
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की तैयारियां जोरों पर थीं. मंदिर के अभिषेक समारोह में शामिल होने के लिए हजारों वीआईपी और धार्मिक लोगों के अलावा अविमुक्तेश्वरानंद के पास भी निमंत्रण आया था, लेकिन उन्होंने इसको अस्वीकार कर दिया. उन्होंने 'अधूरे राम मंदिर' के अनावरण पर आपत्ति जताई थी, और कहा कि आधे-अधूरे मंदिर का उद्घाटन करना धर्म के खिलाफ है. साथ ही प्रयागराज में महाकुंभ की भगदड़ पर ही यूपी सरकार को घेरा था.

रामभद्राचार्य को दिया खुला चैलेंज
रामभद्राचार्य पर निशाना साधते हुए अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि आप कहते हो कि मैंने शास्त्र पढ़ लिए, लेकिन शास्त्रों में लिखा है कि जो भी विकलांग होता है उसको संन्यास का अधिकार नहीं है, उसके बाद भी आप दंड लेकर लोगों के सामने संन्यासी बने घूम रहे हो. शास्त्रों के विरोध में आप कैसे संन्यासी बनकर घूम रहे हो. आप तुलसी दास जी का विरोध करते हो, रामानंदाचार्य जी का विरोध करते हो. आदि शंकराचार्य और चारों पीठों के शंकराचार्य के खिलाफ टिप्पणी करते हो, आप उपनिषद के भी विरोधी हो.
दिल्ली के बुराड़ी में बन रहे केदारनाथ मंदिर की प्रतिकृति पर जताई नाराजगी
अविमुक्तेश्वरानंद ने दिल्ली के बुराड़ी में बन रहे केदारनाथ मंदिर की प्रतिकृति (डुप्लीकेट मंदिर) पर भी नाराजगी जताई थी. उन्होंने कहा था, "ये प्रतीकात्मक केदारनाथ नहीं बन सकता है. हमारे यहां शिव पुराण में द्वादश ज्योतिर्लिंग का उल्लेख किया गया है. 12 ज्योतिर्लिंगों के जहां नाम बताए गए हैं, वहीं पर उनका पता भी बता दिया गया है. ये भी उल्लेख है कि केदारनाथ हिमालय में है तो आप दिल्ली में केदार को कहां से लाकर रखोगे."

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