- झारखंड में साल 2000 से 2025 तक हाथियों के हमलों में 1400 से अधिक लोगों की मौत और 600 से ज्यादा घायल हुए हैं.
- पश्चिम सिंहभूम जिले में एक आक्रामक हाथी ने जनवरी 2026 तक 22 लोगों की जान ली और रोज लगभग तीस किमी चल रहा है.
- हाथी का आक्रामक व्यवहार मस्त अवस्था के कारण होता है जिसमें टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की मात्रा बढ़ जाती है.
Jharkhand Human Wildlife Conflict: झारखंड में हाथियों और इंसानों के बीच टकराव लगातार भयावह रूप लेता जा रहा है. साल 2000 से 2025 के बीच राज्य में हाथियों के हमलों में 1400 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 600 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. वहीं 2026 में ये आंकड़ा फिर से बढ़ रहा है. यह आंकड़ा बता रहा है कि झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष अब एक बड़ी सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है. झारखंड में जंगली हाथियों द्वारा इंसानों पर हमले की मुख्य वजह मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) है, जो जंगल कटने, उनके प्राकृतिक निवास के सिकुड़ने और इंसानों के उनके इलाके में दखल से बढ़ता जा रहा है. हाथी भोजन और पानी की तलाश में गांवों में घुस आते हैं और डरे-सहमे या गुस्सा होकर लोगों पर जानलेवा हमले कर देते हैं. जिससे कई जानें जा रही हैं.

पश्चिम सिंहभूम में हाथी के हमले में 22 लोगों की हो चुकी मौत
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में एक जंगली हाथी 1 जनवरी से अब तक कुल 22 लोगों की जान ले चुका है. वन अधिकारियों के मुताबिक, झुंड से बिछड़ने के कारण यह हाथी अत्यंत हिंसक हो गया है. इसकी रफ्तार भी चिंता का विषय है. यह प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय कर रहा है, जिससे इसकी सटीक लोकेशन ट्रैक करना मुश्किल हो रहा है. यह लगातार मूव कर रहा है. और इसके बीच में जो आ रहा है, उस पर यह हमला कर रहा है.

क्यों आक्रामक है ये हाथी?
पश्चिम सिंहभूम जिले में इंसानों पर हमला करने वाला हाथी बेहद गुस्से में हैं. विशेषज्ञ इसके अलग-अलग कारण बताते हैं. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह हाथी अपने झुंड से इसलिए अलग हो गया है क्योंकि यह अभी मस्त अवस्था में है. मस्त के दौरान, हाथी के शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का लेवल बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे वह बहुत ज्यादा गुस्सैल, आक्रामक और खतरनाक हो जाता है.

इस हालत में वह झुंड के दूसरे हाथियों पर भी हमला कर सकता है. इसलिए उसे झुंड से अलग कर दिया जाता है. हाथियों में मस्त का यह समय दो से तीन महीने तक रहता है. इसके बाद, हाथी का व्यवहार नॉर्मल हो जाता है. हालांकि, अगर इस दौरान ऐसे हाथी का सामना किसी मादा हाथी से होता है और वे मेटिंग करते हैं, तो नर हाथी तब भी शांत हो जाता है.

झारखण्ड में 550 से 600 की संख्या में हैं हाथी
झारखंड में फिलहाल 550 से 600 के करीब हाथी हैं. इनमें एक ग्रुप पलामू में सक्रिय है, दूसरा झारखंड के दक्षिणी छोटानागपुर में सक्रिय है. पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ के अनुसार हाथी आबादी वाले क्षेत्रों में लगातार आ रहे हैं, इसलिए इंसान और हाथियों का संघर्ष तेज हो गया है. खासकर जंगल से सटे आबादी वाले इलाकों में हाथी दिन भर जंगल में रहते हैं, लेकिन रात के समय आबादी वाले इलाकों में पहुंच जाते हैं.

झारखण्ड में हाथी के सबसे ज्यादा प्रभावित जिले
पश्चिमी सिंहभूम:- जिले में इन दिनों हाथियों का भारी आतंक है, जहाँ एक आक्रामक जंगली हाथी के हमलों में पिछले कुछ दिनों में 22 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जिससे स्थानीय लोग दहशत में हैं और घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर शरण ले रहे हैं, जबकि वन विभाग उसे पकड़ने के लिए ड्रोन और विशेषज्ञों की मदद से अभियान चला रहा है, लेकिन हाथी के झुंड से अलग होने और आक्रामक स्वभाव के कारण उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है.
गढ़वा:- जिला दूसरे स्थान पर है, जहां हाथियों ने कई कच्चे मकान तोड़े हैं, फसलों को तबाह किया है, और अब तक कई लोगों की जान भी ले ली है.
रामगढ़ और बोकारो:- रामगढ़ और बोकारो के इलाकों में हाल ही में (दिसंबर 2025 और जनवरी 2026) में हाथियों के झुंड लगातार सक्रिय हैं, जहाँ जंगली हाथियों के झुंड ने कई लोगों को कुचलकर मार डाला है, घरों और फसलों को नुकसान पहुँचाया है, जिससे इलाके में अब भी दहशत है... ..
हजारीबाग:- यहाँ के टाटीझरिया, चलकुशा, सदर और बरकट्ठा ब्लॉक में हाथियों की दस्तक से लोग काफी दहशत में है.
संथाल परगना क्षेत्र:- (दुमका, जामताड़ा, गिरिडीह): यहाँ भी जंगली हाथियों के झुंड बड़े पैमाने पर फसलों और घरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं....
अन्य प्रभावित जिले:- पलामू, चतरा, और सरायकेला-खरसावां जहाँ हाथियों का आना-जाना लगा हुआ है...

लोगों ने छोड़े गांव, कई मचान बनाकर रह रहे
झारखण्ड में इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार हमले बेहद हिंसक हो रहे हैं. रात-रात भर हाथी के हमले से लोगों में डर फैल गया है कई गांव से सैकड़ों लोग अपने घर छोड़कर भाग चुके हैं. वही कुछ लोगों ने ऊंचे मचान बना लिए हैं ताकि रात में ऊपर रह सके. वन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि इतनी खतरनाक और अचानक हमले हाल के वर्षों में नहीं देखा गया है.
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