'भारत में रहने वाले लोगों को विदेशी जीवनशैली को बिना विचार किए अपनाने के बजाय भारतीय संस्कृति और मूल्यों के अनुरूप जीवन जीना चाहिए.' शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उक्त बातें कही. भागवत दिल्ली में विश्वमांगल्य सभा द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम ‘युगानुकूल मातृत्व' के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने कहा कि मातृत्व के बिना संसार की रचना, पालन-पोषण और संरक्षण संभव नहीं है.
उन्होंने कहा, "प्रकृति ने सभी जीवों को जीवन दिया है, लेकिन मनुष्य को सोचने और विचार करने की विशेष क्षमता प्रदान की है. यही विचार-शक्ति मनुष्य को अन्य प्रजातियों से अलग बनाती है और उसे चुनौतियों का समाधान खोजने में सक्षम बनाती है. इसी क्षमता के कारण मनुष्य आज समाज और सभ्यता के विकास का नेतृत्व कर रहा है."
'इतिहास की घटनाओं से समझते हुए मूल सांस्कृतिक सोच को संरक्षित रखना जरूरी'
मोहन भागवत ने भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा, "समय के साथ देश को अनेक विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा. इन परिस्थितियों में समाज को अपनी सुरक्षा के लिए कई ऐसे बदलाव अपनाने पड़े, जो मूल भारतीय परंपराओं का हिस्सा नहीं थे. कुछ परिवर्तन परिस्थितियों की मजबूरी में हुए, जबकि कुछ बाहरी प्रभावों के कारण समाज में आए. इतिहास की इन घटनाओं को समझते हुए अपनी मूल सांस्कृतिक सोच और मूल्यों को संरक्षित रखना आवश्यक है."
अनुभव से मिलने वाली शिक्षा जीवनभर साथ रहती हैः मोहन भागवत
उन्होंने कहा, "समय के साथ बदलना भी मातृत्व का एक महत्वपूर्ण पहलू है. जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है और मनुष्य अपने अनुभवों से लगातार सीखता रहता है. सीखने के कई माध्यम होते हैं. यदि मार्गदर्शन उपलब्ध हो तो व्यक्ति सहज रूप से आगे बढ़ता है, लेकिन कई बार अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक बनता है. हालांकि अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी वह जीवनभर साथ रहती है."
'मां का रिश्ता सबसे अलग और स्थायी'
भागवत ने कहा, "मां का स्नेह और भावनात्मक सहयोग केवल बचपन तक सीमित नहीं होता. जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह कई बार मां की बातों का विरोध भी करता है, लेकिन इसके बावजूद मां का रिश्ता सबसे अलग और स्थायी रहता है. जीवन के हर चरण में व्यक्ति को भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है और मां वह स्थान होती है, जहां व्यक्ति बिना किसी संकोच के अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है."
उन्होंने कहा, "जीवन में एक समय ऐसा आता है जब औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता कम हो जाती है, लेकिन भावनात्मक मार्गदर्शन और अपनापन हमेशा जरूरी रहता है. मां का स्नेह व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों से उबरने की शक्ति देता है."
परिवार और समाज दोनों की मजबूती में मातृत्व की भूमिका अहमः भागवत
अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि समाज को मातृत्व के महत्व को केवल पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे मानवीय मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन के आधार के रूप में देखना चाहिए. उनके अनुसार, परिवार और समाज दोनों की मजबूती में मातृत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है.
भागवत ने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान देश ने अपनी परंपराओं पर विश्वास खो दिया और लोगों के मन में अपनी ही परंपराओं को लेकर संदेह पैदा हो गया. उन्होंने कहा, “लंबे समय तक यह भ्रम फैलाया गया कि हमारी परंपराएं गलत हैं, जबकि हमारी सांस्कृतिक नींव अत्यंत मजबूत और प्रमाणित है. हमें अपने इतिहास, ज्ञान और परंपराओं पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए.”
हम तकनीक के गुलाम नहीं, स्वामी बनेंगेः भागवत
भागवत ने कहा कि भारत की परंपराएं जीवन के अनुभवों पर आधारित हैं. उन्होंने कहा, “यदि हम अपनी जड़ों को सही ढंग से समझें, तो पाएंगे कि वे केवल सिद्धांतों या ग्रंथों पर नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों पर आधारित हैं. तब भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी. तेज़ी से हो रहे तकनीकी बदलावों से डरने की आवश्यकता नहीं है. हम तकनीक पर महारत हासिल करेंगे. हम उसके गुलाम नहीं, बल्कि उसके स्वामी बनेंगे और मानवता के कल्याण के लिए उसका उपयोग करेंगे.”
23 और 24 जुलाई को आयोजित इस दो दिवसीय सम्मेलन में देशभर से लगभग 280 महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया. आयोजकों के अनुसार, समापन सत्र में 900 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया.
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