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480 रुपए में एक आम और मिनटों में स्टॉक खत्म... गामा रेडिएशन किरणों से गुजरकर कैसे अमेरिका पहुंचता है भारतीय आम

Indian Mangoes in US: अमेरिका में भारतीय आमों के प्रति गजब की दीवानगी है. यहां 400 से 500 रुपए प्रति आम की कीमत चुकाने के बाद भी मिनटों में स्टॉक खत्म हो जाती है. अमेरिका भेजे जाने इन भारतीय आमों को परमाणु ऊर्जा केंद्र में गामा रेडिएशन किरणों से गुजारा जाता है. आइए इसका पूरा प्रोसेस जानते हैं?

480 रुपए में एक आम और मिनटों में स्टॉक खत्म... गामा रेडिएशन किरणों से गुजरकर कैसे अमेरिका पहुंचता है भारतीय आम
मुंबई स्थित ऊर्जा विभाग की फूड इरेडिएशन फैसिलिटी में अमेरिका भेजने वाले आमों के साथ अधिकारी.
  • अमेरिका में भारतीय आमों की भारी मांग के कारण एक बॉक्स की कीमत लगभग पचास से साठ डॉलर तक पहुंच जाती है.
  • भारतीय आमों को अमेरिका भेजने से पहले परमाणु ऊर्जा विभाग में गामा रेडिएशन से उपचारित किया जाता है.
  • इस विकिरण उपचार प्रक्रिया से आमों का स्वाद और रंग प्रभावित नहीं होता बल्कि उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है.
मुंबई:

Indian Mangoes in US:  अमेरिका में भारतीय आम के लिए लोगों की दीवानगी जगजाहिर है. यहां बॉक्स खुलते ही सारे मिनटों में आम बिक जाते हैं. कुछ दिनों पहले ही अमेरिकी बाजार में इंडियन मैंगो की डिमांड और सेल से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला इंटरनेट पर दिखा था. अमेरिकी यूजर ने एक्स पर पोस्ट कर बताया था कि कैसे मात्र 20 मिनट में अमेरिका में इंडियन मैंगो का स्टॉक खत्म हो जा रहा है. सोशल मीडिया पर यह पोस्ट वायरल हुआ. भारतीय आम के लिए अमेरिकी भारत से आने वाली फ्लाइट्स पर नजर रखते हैं, वेयरहाउस की ओर दौड़ते हैं, अपनी ID दिखाते हैं और आम से भरे क्रेट्स को किसी कीमती खजाने की तरह पकड़ कर बाहर निकलते हैं. 

एक आम के लिए 480 रुपए तक देते हैं अमेरिकी

अमेरिका में भारतीय आम की दीवानगी के कारण कीमतें आसमान छूने लगती हैं. इंटरनेट पर किए गए दावे के अनुसार भारत से आए आम के एक केस में 9 से 10 पीस होते हैं. ये केस 49.99 डॉलर का है. भारतीय रुपए में ये कीमत करीब 4800 रुपये होती है. इसे भारतीय रुपए में बदले तो करीब एक आम की कीमत 480 रुपए तक पड़ती है. 

WSJ की रिपोर्ट- इंडियन मैंगो के लिए कुछ भी कर सकते हैं अमेरिकी

कुछ दिनों पहले वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अमेरिका में भारतीय आम की दीवानगी पर पहले पन्ने पर रिपोर्ट छापी थी. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने 5 मई को रिपोर्ट किया, "भारतीय आम पाने के लिए अमेरिकी कुछ भी कर सकते हैं." जिसमें अमेरिका में भारतीय आमों के प्रति दीवानी और थोड़ी हद तक सनकी हो चुकी एक कम्युनिटी का जिक्र किया गया था. 

WSJ में छपी भारतीय आम की दीवानगी की रिपोर्ट.

WSJ में छपी भारतीय आम की दीवानगी की रिपोर्ट.

गामा रेडिएशन किरणों से गुजर कर अमेरिका पहुंचता है भारतीय आम

अल्फांसो, केसर से लेकर चौसा, लंगड़ा तक अमेरिका में भारत की इन उन्नत आम की किस्मों की खूब डिमांड है. लेकिन अमेरिका भेजे जा रहे इन भारतीय आमों की प्रोसेसिंग गजब की है. अमेरिका भेजे जाने से पहले इन आमों को मुंबई स्थित परमाणु ऊर्जा विभाग की फूड इरेडिएशन फैसिलिटी में गामा रेडिएशन किरणों से गुजारा जाता है. 

ऊर्जा विभाग की फूड इरेडिएशन फैसिलिटी पहुंचा NDTV

आम को गामा रेडिएशन किरणों से गुजारने वाले इस प्रोसेस को समझने के लिए NDTV परमाणु ऊर्जा विभाग की फूड इरेडिएशन फैसिलिटी में पहुंचा, यहां NDTV ने इस पूरे यूनिट को समझा. अधिकारियों से बात की, फिर कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आई. 

NDTV को ऊर्जा विभाग की फूड इरेडिएशन फैसिलिटी में आमों के ढेर मिले. कुछ चमकीले पीले, पके हुए, बाकी हरे और ठोस. अधिकारियों ने बताया कि पके हुए आम भारतीय बाजार में जाने के लिए तैयार हैं. बाकी हरे और ठोस अमेरिका जाने के लिए तैयार हैं.

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'हरा वाला इरेडिएटेड आम अमेरिका जाने को तैयार'

मुंबई में परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत विकिरण और आइसोटोप प्रौद्योगिकी बोर्ड के मुख्य कार्यकारी प्रदीप मुखर्जी ने कहा, "यह हरा वाला इरेडिएटेड आम है, जो अमेरिका को निर्यात के लिए तैयार है. यह पीला वाला नॉन-इरेडिएटेड आम है."

कीड़ों को खत्म करने के लिए गामा रेडिएशन किरणों से गुजाता जाता है आम

बताते चले कि लंबे समय तक भारतीय आमों को अमेरिकी बाजार से बाहर रखा गया था. समस्या स्वाद की नहीं, कीड़ों की थी.
WSJ के अनुसार, दक्षिण अमेरिकी आमों को साफ करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला गर्म पानी का ट्रीटमेंट भारतीय आमों की नाजुक किस्मों को खराब कर देता था. इसका समाधान था फूड इरेडिएशन.  मतलब गामा रेडिएशन का इस्तेमाल करके कीड़ों को मारना. इस प्रोसेस के तहत आम के स्वाद पर कोई असर डाले बिना आमों के पकने की गति को धीमा किया जाता है.

आइसोटोप प्रौद्योगिकी बोर्ड के मुख्य कार्यकारी प्रदीप मुखर्जी ने कहा, “बुनियादी जरूरत है शेल्फ लाइफ बढ़ाना. जब आमों को एक्सपोर्ट करना होता है, तो फाइटोसैनिटरी ट्रीटमेंट जरूरी होता है. भारतीय आमों के लिए, इरेडिएशन ही एकमात्र समाधान है.”

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र ने डेवलप किया है प्रोसेस

यह प्रक्रिया भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC), मुंबई द्वारा विकसित की गई थी और कड़े प्रोटोकॉल के तहत इसका परीक्षण किया गया था. आखिरकार, इसे US के अधिकारियों द्वारा प्रमाणित कर दिया गया, जिससे भारतीय आमों के लिए अमेरिकी दुकानों में कानूनी तौर पर प्रवेश करने का रास्ता साफ़ हो गया.

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पकने से पहले आमों का होता है इरेडिएशन

इस सुविधा के अंदर, कोबाल्ट 60 के स्रोत नियंत्रित गामा रेडिएशन उत्सर्जित करते हैं, जिससे कटाई के बाद आमों का ट्रीटमेंट किया जाता है. फलों को बिल्कुल सही अवस्था में तोड़ा जाता है और पूरी तरह पकने से पहले ही उनका इरेडिएशन कर दिया जाता है.

मुखर्जी कहते हैं, “इरेडिएशन फाइटोसैनिटरी ट्रीटमेंट के साथ-साथ पकने की प्रक्रिया को भी धीमा कर देता है. ये आम अपने गंतव्य पर पहुंचने के बाद, यानी जब वे अमेरिका पहुंचते हैं, तब पकते हैं.”

क्या रेडिएशन से स्वाद बदल जाता है? 

इस सवाल के जवाब में मुखर्जी कहते हैं, “इसमें बिल्कुल भी कोई फर्क नहीं होता.” एक टेस्ट से इस बात की पुष्टि भी हो जाती है. बिना रेडिएशन वाला अल्फांसो आम ठीक वैसा ही लगता है, जैसा कि उम्मीद की जाती है. रेडिएशन वाला आम भी लगभग वैसा ही लगता है. रंग भी वैसा ही होता है. स्वाद भी वैसा ही होता है. बस, इसकी शेल्फ लाइफ थोड़ी ज़्यादा हो जाती है.

आज भारत में चार रेडिएशन प्लांट ऐसे हैं, जिन्हें US के इंस्पेक्टर्स से सर्टिफिकेशन मिला हुआ है. ये सभी मिलकर हर साल लगभग 30,000 मीट्रिक टन रेडिएशन वाले आम एक्सपोर्ट करते हैं. मुखर्जी कहते हैं, “भारत को इससे हर साल लगभग 57 मिलियन डॉलर की कमाई होती है.”

अमेरिका में भारतीय आम के एक बॉक्स की कीमत 50-60 डॉलर तक

‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल' के मुताबिक, आमों के इस छोटे लेकिन जोरदार सीजन के दौरान इंपोर्टर्स को दिन-रात फ़ोन आते रहते हैं. आमों के एक बॉक्स की कीमत 50 से 60 डॉलर तक होती है, जो पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा है. इसकी वजह हवाई माल-भाड़े में बढ़ोतरी और दुनिया भर में फैली अनिश्चितता है.

US के एक इंपोर्टर भास्कर सवानी ने ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल' से कहा, “आम तो अपने आप ही बिक जाता है.” उन्होंने भारतीय आमों को “भगवान का फल” बताया, और आम की दूसरी क़िस्मों को यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि उनका स्वाद तो “कच्चे आलू” जैसा होता है.

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मैक्सिकन आमों के मुकाबले करीब 5 गुना अधिक कीमत

WSJ ने बताया कि जहां एक तरफ भारतीय आमों की कीमत मैक्सिकन आमों के मुकाबले लगभग पांच गुना ज्यादा होती है, वहीं दूसरी तरफ इनकी माँग में कोई कमी नहीं आती. पहली खेप के भारत से रवाना होने से पहले ही, सारे प्री-ऑर्डर बिक चुके होते हैं.

अब यह उत्साह सिर्फ भारतीय-अमेरिकियों तक ही सीमित नहीं रह गया है. US के एक इंपोर्टर ने WSJ को बताया, “हमारे सबसे पक्के ग्राहक तो अमेरिकी लोग ही हैं.” हैरानी की बात यह है कि भारत से जाकर विदेश में बसे लोग (एक्सपैट्स) कभी-कभी आमों की कीमत को लेकर शिकायत भी करते हैं.

आमों को अमेरिका भेजना जोखिम भरा काम

हालांकि, आमों को अमेरिका तक पहुंचाना एक जोखिम भरा काम बना हुआ है. आमों की तुड़ाई के बाद प्रमाणित भारतीय संयंत्रों में उनका विकिरण उपचार किया जाता है, फिर उन्हें मुख्य रूप से यात्री विमानों में लादा जाता है और लगभग एक सप्ताह के भीतर अमेरिकी उपभोक्ताओं तक पहुंचाना होता है. उड़ान छूट जाना, कागजी कार्रवाई में गड़बड़ी या निरीक्षण में कोई समस्या आने से हजारों डॉलर मूल्य की पूरी खेप बर्बाद हो सकती है.

दक्षिण भारत में केवल एक ही विकिरण उपचार केंद्र है, जिससे मौसमी अड़चन पैदा होती है. माल ढुलाई के लिए स्थान की प्रतिस्पर्धा दवाइयों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों से होती है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट है कि भू-राजनीतिक तनाव और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण इस साल खेप में पहले ही देरी हो चुकी है.

फिर भी, इन सब बातों से मांग पर कोई असर नहीं पड़ा है. कुछ कंपनियां तो आमों के सीजन पास भी दे रही हैं, जिसके तहत वे लगभग 1,000 डॉलर में पूरे सीजन के लिए अमेरिकी घरों में साप्ताहिक बॉक्स पहुंचाती हैं. यह उस फल के लिए एक उल्लेखनीय यात्रा है जिस पर कभी अमेरिका में पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ था.

सुपरमार्केट में भारतीय आम.

सुपरमार्केट में भारतीय आम.

2006 में जॉर्ज बुश और मनमोहन सरकार ने साफ किया था इंपोर्ट का रास्ता

दो दशक पहले, विकिरण उपचार की मंजूरी के लिए उच्चतम स्तर पर राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता थी. 2006 में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रतिबंध हटाने पर सहमत हुए थे. खबरों के मुताबिक, बुश ने अपनी भारत यात्रा के दौरान एक आम चखा और कहा, "यह तो लाजवाब फल है!"

लगभग बीस साल बाद, आम भारत-अमेरिका संबंधों में एक अहम भूमिका निभाने लगे हैं. परमाणु ऊर्जा विभाग की सुविधा के अंदर, प्रक्रिया शांत, व्यवस्थित और अंतिम उपभोक्ता के लिए अदृश्य है. यह समाज की सेवा में परमाणु ऊर्जा है. परमाणु विज्ञान जो खाद्य पदार्थों की शेल्फ लाइफ बढ़ाता है. फसलों की रक्षा करता है. विदेशी मुद्रा अर्जित करता है. और अमेरिकियों की एक अनपेक्षित चाहत को पूरा करता है.

जैसा कि वॉल स्ट्रीट जर्नल ने बड़े ही सजीव ढंग से बताया है, अमेरिकी भारतीय आमों के दीवाने हो रहे हैं. दरअसल, वे भारतीय परमाणु विज्ञान की एक ऐसी सफलता का स्वाद चख रहे हैं जो चुपचाप, सटीक और प्रभावी ढंग से काम कर रहा है.

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