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भारतीय सेना को मिलने वाली है अनोखी आर्टिलरी शेल, टैंक की बढ़ जाएगी मारक क्षमता

भारतीय सेना ने आईआईटी मद्रास के साथ मिलकर एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे तोप की मारक क्षमता बढ़ गई है.

भारतीय सेना को मिलने वाली है अनोखी आर्टिलरी शेल, टैंक की बढ़ जाएगी मारक क्षमता
सेना की बढ़ने वाली है ताकत
नई दिल्ली:

रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए आईआईटी मद्रास ने ऐसे रैमजेट आधारित आर्टिलरी शेल विकसित किए हैं, जिनसे मौजूदा तोपों की मारक दूरी लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है.  वह भी बिना मारक क्षमता में कमी आए हुए. इस तकनीक को अलग-अलग तोप प्रणालियों पर कई परीक्षणों में परखा गया और नतीजों में फायरिंग रेंज में साफ बढ़ोतरी देखी गई. 155 मिमी के सामान्य आर्टिलरी शेल में रैमजेट इंजन लगाने से ATAGS तोप की रेंज 40 किमी से बढ़कर 70 किलोमीटर हो गई. वहीं, K9 वज्र स्वचालित होवित्जर की रेंज 36 किमी से 62 किमी हो गई.


धनुष तोप की रेंज 30 किमी से बढ़कर 55 किमी हो गई

IIT मद्रास के एक अधिकारी के मुताबिक यह तकनीक रॉकेट-सहायता प्राप्त शेल या केवल एयरोडायनामिक सुधारों से अलग है. इसमें शेल के तोप की नली से बाहर निकलने के बाद भी लगातार ताकत मिलती रहती है, जिससे ज्यादा दूरी तक मार संभव होती है. इसके लिए न तो नई तोपें चाहिए और न ही महंगे मिसाइल सिस्टम.

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रैमजेट तकनीक क्या है?

रैमजेट एक ऐसा इंजन होता है जिसमें हवा को तेज रफ्तार से दबाकर, उसमें ईंधन मिलाया जाता है और बिना टरबाइन जैसे घूमने वाले हिस्सों के थ्रस्ट (धक्का) पैदा किया जाता है. तोप प्रणालियों में रैमजेट की मदद से शेल फायर होने के बाद भी आगे बढ़ता रहता है. इससे बिना तोप बदले रेंज बढ़ जाती है। इससे सेना को ज्यादा दूरी तक वार करने की क्षमता मिलती है और लागत भी कम रहती है. यह तकनीक आधुनिक तोपखाने की एक बड़ी समस्या को हल करती है. इसके जरिए तोपों की रेंज बढ़ती है, वह भी मोबिलिटी, तैनाती और मारक क्षमता से समझौता किए बिना. हालांकि मिसाइलें लंबी दूरी तक मार कर सकती हैं, लेकिन वे महंगी और जटिल होती हैं. वहीं तोपें आज भी युद्धक्षेत्र की रीढ़ हैं, क्योंकि वे सरल, टिकाऊ और किफायती होती हैं. इन नई तकनीक के जरिए उनकी रेंज काफी बढ़ी है. 

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सेना और IIT मद्रास की पहल 

यह परियोजना 2020 में  आईआईटी मद्रास द्वारा भारतीय सेना के साथ मिलकर शुरू की गई थी. इसका नेतृत्व प्रो. पी. ए. रामकृष्ण, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) पी. आर. शंकर, प्रो. एच. एस. एन. मूर्ति, प्रो. जी. राजेश, प्रो. एम. रामकृष्ण, प्रो. मुरुगैयन, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) हरि मोहन अय्यर, प्रो. लाजर सी और डॉ. योगेश कुमार वेलारी ने किया. परियोजना के तहत देवलाली और पोखरण में कई फील्ड और गन ट्रायल किए गए। इनमें शेल का सुरक्षित बाहर निकलना, स्थिर उड़ान और रैमजेट का सही तरीके से चालू होना सफल साबित हुआ.

रॉकेट की रफ्तार भी बढ़ेगी?

IIT मद्रास में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. पी. ए. रामकृष्ण ने कहा कि अगर यह तकनीक पूरी तरह लागू हो जाती है, तो भारतीय तोपखाना इकाई लगभग 50 प्रतिशत ज्यादा दूरी तक लक्ष्य पर वार कर सकेंगी. इससे कमांडरों को ज्यादा विकल्प मिलेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि बढ़ी हुई रेंज के बावजूद युद्धक्षेत्र में मारक क्षमता बनी रहेगी. उन्होंने यह भी कहा कि यही तकनीक अगर रॉकेटों में अपनाई जाए, तो उनकी रेंज भी काफी बढ़ाई जा सकती है. इस दिशा में कुछ परियोजनाएं पहले से चल रही हैं.

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