- भारत का संघीय ढांचा और शक्तियों का विकेंद्रीकरण देश में विरोध प्रदर्शनों को विद्रोह में बदलने से रोकता है.
- युवा लोकतांत्रिक तरीके से जवाबदेही और व्यवस्था सुधार की मांग करते हैं, सरकार गिराने का उद्देश्य नहीं रखते.
- भारत का सामाजिक ताना बाना ही कुछ ऐसा है जो विरोध को विद्रोह में बदलने नहीं देती.
यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा
अल्लामा इकबाल की ये पंक्तियां आज के माहौल पर एकदम सटीक बैठती हैं. जब भी इतिहास ने भारत को किसी मोड़ पर आंका है, इस देश के सामाजिक ताने-बाने ने खुद को साबित किया है. अतीत में कई सभ्याताएं आईं और गईं, लेकिन भारत वैसे ही खड़ा रहा. वर्तमान में भी पड़ोसी देशों ने कई तख्तापलट देखे लेकिन हमारा समाज इतना परिपक्व है कि विरोध को विद्रोह तक नहीं जाने देता है.
जंतर मंतर पर स्टूडेंट के प्रोटेस्ट के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. लेकिन एक महीने के लंबे छात्र प्रदर्शन के दौरान भारत का ढांचा अडिग खड़ा है.
जब NEET पेपर लीक मामले को लेकर देश भर के 'जेन जी' छात्र, पर्यावरणविद और विपक्षी नेता दिल्ली के संसद मार्ग पर बैरिकेड्स के सामने डटे, तो दुनिया भर में यह सवाल उठने लगा कि क्या भारत में भी नेपाल और बांग्लादेश की तरह स्टूडेंट सरकार की सत्ता के खिलाफ खड़े हो जाएंगे? लेकिन ऐसा सोचना ही गलत है.
आइए समझते हैं कि क्यों भारत का ताना-बाना पड़ोसी देशों से पूरी तरह अलग क्यों हैं.
जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन
Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
संघवाद का सुरक्षा कवच
बांग्लादेश या नेपाल जैसे छोटे और केंद्रीय सत्ता वाले देशों में अगर राजधानी ठप्प हो जाए, तो पूरी सरकार और राज्य व्यवस्था पंगु हो जाती है. लेकिन भारत का ढांचा अलग है.
भारत 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में बंटा एक विशाल संघीय गणराज्य है. यहां ताकत किसी एक जगह केंद्रित नहीं है. अगर केंद्र या किसी एक राज्य सरकार से लोग नाराज होते हैं, तो उनके पास स्थानीय स्तर पर सरकारें बदलने का विकल्प होता है.
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट जैसी स्वतंत्र न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं जनता के गुस्से को सरकार गिराने का जरिया बनने से पहले ही सही दिशा में मोड़ देती हैं.

Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
व्यवस्था का सुधार या सत्ता का अंत? भारत के युवाओं के संस्कार में क्या है
नेपाल और बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन इसलिए उग्र हुए क्योंकि वहाँ के नागरिकों को लगा कि तानाशाही रवैये और सत्ता के एकाधिकार के कारण उनके पास कोई लोकतांत्रिक रास्ता नहीं बचा है. वहाँ का गुस्सा सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए था.
इसके ठीक उलट, भारत में जब जेन जी या युवा सड़कों पर उतरते हैं तो उनका मकसद देश के संविधान को तोड़ना या सरकार गिराना नहीं होता. उनका लक्ष्य निशानबद्ध जवाबदेही तय करना होता है. वे परीक्षा प्रणाली में सुधार, पेपर लीक माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई और संवैधानिक संस्थाओं को बेहतर बनाने की मांग करते हैं. भारतीय युवा तंत्र को खत्म नहीं, बल्कि तंत्र को सही तरीके से काम कराने के लिए लड़ते हैं.
विविधता भी एक वजह
1.4 अरब की आबादी वाले देश में किसी एक मुद्दे पर पूरे देश को उग्र विद्रोह के लिए एक साथ खड़ा करना व्यावहारिक रूप से असंभव है. तमिलनाडु की प्राथमिकताएं बिहार से अलग हैं, तो पंजाब के मुद्दे केरल से मेल नहीं खाते.
भारतीय समाज की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता इतनी व्यापक है कि कोई एक राजनीतिक चिंगारी पूरे देश में एक साथ आग नहीं लगा सकती. यही सामाजिक ताना-बाना भारत को किसी भी उग्र और एकतरफा तख्तापलट से बचाता है.

Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
'डिजिटल हथियार'
आज का भारतीय युवा हिंसा या तोड़फोड़ की जगह डिजिटल क्रांति का सहारा ले रहा है. इसे हम 'डिजिटल फ्रिक्शन' का दौर कह सकते हैं, जहां सड़कों पर पत्थर फेंकने से ज्यादा असरदार एक रील्स या मीम बन जाता है.
जेन जी यह भली-भांति जानती है कि किसी मंत्री या तंत्र की नाकामी पर बनाया गया एक व्यंग्यात्मक मीम या तथ्य-आधारित इंस्टाग्राम रील पूरे देश का ध्यान खींच सकती है. बिना हिंसा फैलाए, सिर्फ एक वीडियो के जरिए अधिकारी और नेता जनता के सामने बेनकाब हो जाते हैं. वैश्विक पटल पर सरकार की छवि पर पड़ने वाला असर अधिकारियों को तुरंत एक्शन लेने पर मजबूर कर देता है.

तख्तियों के साथ जंतर मंतर पर छात्र
Photo Credit: Ashutosh Kumar Singh/NDTV
लोकतंत्र पर भरोसा तो है ही
अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर किसान आंदोलन और हालिया छात्र प्रदर्शनों तक, भारत के युवाओं ने हमेशा एक बात साबित की है कि वे अपनी आवाज बुलंद करने के लिए कानून की सीमा तक जाते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे को कभी नुकसान नहीं पहुंचाते. उनका गुस्सा व्यवस्था से हो सकता है, लेकिन भारत के संविधान में उनका अटूट विश्वास बना रहता है.

प्रदर्शन के दौरान जंतर मंतर के बगल का इलाका जनपथ लेन भी जाम दिखा.
Photo Credit: Sakib Mazeed/NDTV
वोट की ताकत हमेशा सुरक्षित रहना भी एक कारण
जिन देशों में चुनाव प्रक्रिया पर से जनता का विश्वास उठ जाता है, वहां सड़क ही आखिरी हथियार बनती है. लेकिन भारत में हर कुछ महीनों में किसी न किसी राज्य या केंद्र के चुनाव होते रहते हैं.
जब भी युवाओं या आम जनता में सरकार के प्रति असंतोष पनपता है, तो 'ईवीएम का बटन' और चुनाव चक्र उस गुस्से को निकालने का सबसे सुरक्षित रास्ता बनते हैं. छात्र अपना गुस्सा सड़कों पर दिखाने के बाद आखिरकार वोटिंग बूथ पर जाकर अपना फैसला सुनाते हैं. सत्ता परिवर्तन का अधिकार भारत की जनता के हाथों में हमेशा सुरक्षित रहता है.
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