जुलाई की उमस भरी गर्मी में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, छात्रों ने इसका भी तोड़ निकाला- ग्राउंड रिपोर्ट
जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारियों ने उमस भरी गर्मी से लड़ने के लिए कई तरह के तोड़ निकाले हैं. फिज़ा में गूंजते इंक़लाबी नारों के साथ हवा में लहरा रहे हाथों में कई तरह के पंखे हैं, जिनके सहारे प्रोटेस्टर्स अपनी और बाहर से आने वाले लोगों के शरीर के पसीने के कम करने की कोशिश कर रहे हैं.
"मेरे अंदर जो गर्मी है, मौसम वाली गर्मी से ज़्यादा है. मेरे अंदर गुस्से वाली गर्मी है कि शिक्षा व्यवस्था में बहुत गड़बड़ हो रही है, बहुत बुरा हुआ है. मैं सत्याग्रह की धरती चंपारण से आया हूं. हमें बापू के मार्गदर्शन पर चलना है. मुझे यहां पर आकर बहुत ख़ुशी हो रही है. मुझे स्वर्ग यहीं पर मिल गया है. लोकतंत्र का स्वर्ग यहीं पर है."
ये कहना है जंतर-मंतर पर बिहार के चंपारण से आने वाले विशाल कुमार का. वे राजधानी पटना में टीचर और प्रोफेसर बनने की तैयारी करते हैं और प्रोटेस्ट में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय राजधानी आ गए हैं.
दिल्ली के जंतर-मतर पर कई दिनों से पेपर लीक मुद्दे पर स्टूडेंट्स का प्रोटेस्ट चल रहा है. इन दिनों जंतर-मंतर वाली जगह चौबीसों घंटे लोगों से आबाद रहती है. एक कोने में मंच लगा है, तो दूसरे सिरे पर मेडिकल हेल्प कैंप. तीसरे छोर पर खाना बांटा जा रहा है, तो चौथे किनारे पर लोगों को फल खिलाया जा रहा है. शायद प्रोटेस्ट के ज़िंदा रहने की यही वो तमाम वजहें हैं. लेकिन इन सब के बाद एक चीज़ जो सबसे ज़्यादा इस प्रोटेस्ट में नज़र आती है, वो यहां की गर्मी है.

गर्मी, धूप और बारिश से बचने के लिए तिरपाल ही प्रदर्शनकारियों का सहारा है. (Photo: Sakib Mazeed)
जंतर-मंतर पर धूप और बारिश से सिर बचाने के लिए कोई छत नहीं है. यहां छांव देने के लिए ज़्यादा पेड़ भी नहीं मौजूद हैं, सिवाय नीम के कुछ वृक्षों के... सिर्फ़ स्पीकर्स और नेताओं के लिए बने स्टेज के अलावा पूरा जंतर-मंतर का मैदान खुला है. दिल्ली की गर्मी अपने ख़तरनाक रूप के लिए जानी जाती है. ऐसी तपती और उमस भरी गर्मी में प्रदर्शनकारी छात्र धरना स्थल पर डटे हुए हैं.
उमस भरी गर्मी को कैसे चकमा दे रहे प्रोटेस्टर्स?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों का असली विरोध प्रदर्शन तब शुरू होता है, जब दिन चढ़ने लगता है. जुलाई की कड़क धूप जब सिर के ऊपर आती है, तो वह विकराल रूप होता है. लेकिन ऐसी स्थिति में भी प्रदर्शकारियों का हौसला कम होता नहीं नज़र आता. नारों की गूंज बढ़ने के बजाय कम नहीं होती है. कड़ी धूप और बदरा के बरसने पर बचने के लिए छात्रों ने कुछ बंदोबस्त कर रखे हैं. लेकिन यह व्यवस्था सिर्फ़ दीवारों के किनारों वाली जगहों पर है.
प्रोटेस्ट साइट पर बने मंच के सामने जो जगह है, उसके दाहिने और बाएं हाथ पर दीवारें हैं. इन्हीं के सहारे छात्रों ने कुछ तंबू बना रखे हैं. लेकिन भरी दोपहरिया के वक़्त इस तंबू के नीचे ख़तरनाक और बेतहाशा उमस होती है. यही वह जगह है, जहां पर प्रदर्शनकारी छात्र थकने पर बैठकर खाना खाते हैं, पानी पीते हैं और आराम करते हैं. बारिश से बचने के लिए भी यही उनका आशियाना है. इसी तंबू के नीचे कुछ छात्र रात में नींद भी पूरी कर लेते हैं. कुछ छात्र खुली सड़क पर बिछी दरी पर भी सो जाते हैं.

दीवार के किनारे तंबू लगाकर छाया बनाई गई है. (Photo: Sakib Mazeed)
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'हमारे अंदर आग दौड़ रही...'
दिल्ली के रहने वाले देव चौहान कहते हैं, "हमें यहां पर गर्मी से कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा है. हम यहां प्रोटेस्ट करने आए हैं, यह गर्मी हमें बिल्कुल भी नहीं रोक पाएगी. हमारे अंदर एक ही तरह की आग दौड़ रही है, जो हम सबको यहां पर यूनाइट कर रही है. यहां पर पानी और ओआरएस की व्यवस्था है. ऐसे में गर्मी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. हम सब एक हैं और लड़ रहे हैं. गर्मी से बचने के लिए मैं ओआरएस पी रहा हूं, हमारे पास हैंडफैन भी है.
गुजरात के राजकोट से आए हुए हसमुख को चार दिन हो गए हैं. उन्हें उम्मीद है कि इंसाफ मिलेगा. वे कहते हैं, "गर्मी से कुछ परेशानी नहीं होती है, थोड़ा सा पसीना आता है. मैं हाथ वाले पंखे का प्रयोग कर रहा हूं, जिसको किसी ने डोनेट किया है. रात के वक़्त खुले में फुटपाथ पर सो जाता हूं, मज़ा आता है. यहीं रहता हूं, यहीं सोता हूं. नहाने के लिए गुरुद्वारा चला जाता हूं."
'लोहा ही लोहे को काटता है...'
राहुल कुमार दुबे उत्तर प्रदेश के गोंडा में टूर एंड ट्रेवेल का काम करते हैं. वे कहते हैं, "देश की गर्मी से ज़्यादा यह गर्मी कुछ भी नहीं है. यहां युवाओं में पहले से ही इतनी गर्मी है कि धूप की गर्मी कोई मायने नहीं रखती है. यहां हर युवा के दिल में ऑलरेडी गर्मी है. इसी गर्मी से धूप वाली गर्मी कट जा रही है. लोहा ही लोहे को काटता है. हम लोगों की सेवा कर रहे हैं. लोगों ने हाथों का पंखा बांट रखा है."

हाथों में तरह-तरह के पंखे...
जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारियों ने उमस भरी गर्मी से लड़ने के लिए कई तरह के तोड़ निकाले हैं. फिज़ा में गूंजते इंक़लाबी नारों के साथ हवा में लहरा रहे हाथों में कई तरह के पंखे हैं, जिनके सहारे प्रोटेस्टर्स अपनी और बाहर से आने वाले लोगों के शरीर के पसीने के कम करने की कोशिश कर रहे हैं. कोई कार्टन के टुकड़े को हाथ का पंखा बना लिया है, किसी के हाथ में जूट से बने हाथ के पंखे हैं, तो कई डिजिटल पंखा हाथ में लिए टहल रहा है. प्रोटेस्ट साइट और मंच के आस-पास जाने के लिए लोगों की जो लाइन लगी हुई है, उस लाइन में खड़े लोगों को गर्मी से बचान के लिए लोग कार्टन के बड़े-बड़े टुकड़े से हवा चलाते नज़र आते हैं. कुछ बच्चों के हाथों में प्लास्टिक के बने हाथ वाले छोटे पंखे लहराते नज़र आते हैं.

प्रदर्शकारी छात्र एक-दूसरे को हाथ के पंखों से हवा देते हैं. (Photo: Sakib Mazeed)
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'हम सीजेपी, बीजेपी या कांग्रेस के लिए नहीं आए...'
मोहम्मद सलमान उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले से प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आए हैं. वे जंतर-मंतर आने वाले लोगों को गर्मी से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. उनके हाथ में जूट का एक पंखा है. जब लोग लाइन लगाकर प्रोटेस्ट वाली जगह पर आते हैं, तो गर्मी की वजह से पसीने से भीग जाते हैं. सलमान जैसे कई युवाओं (लड़के-लड़कियां) की कोशिश है कि प्रदर्शन में आने वाले किसी भी शख़्स को गर्मी न लगे.

प्रोटेस्ट साइट पर जाने के लिए लाइन मे लगे लोगों को गर्मी से बचाने की कोशिश की जा रही है. (Photo: Sakib Mazeed)

भीषण गर्मी के बावजूद प्रोटेस्ट साइट पर चौबीसों घंटे भीड़ जमा होती है. (Photo: Sakib Mazeed)
श्रिया उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली हैं और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से ह्यूमन राइट्स की पढ़ाई कर रही हैं. वे कहती हैं, "इतनी गर्मी है लेकिन यहां पर लोगों का प्रोटेस्ट और स्लोगन्स देख कर गर्मी से हमें कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. हम मोटिवेटेड हैं क्योंकि अभी मोटिवेशन की बहुत ज़रूरत हैं. हमें प्रोटेस्ट साइट पर प्लास्टिक फैन मिला और बोला गया कि यहां से जाते वक़्त हम इसे किसी और को दे दें."
'टीशर्ट भीगी है लेकिन गर्मी नहीं लग रही...'
दिग्विजय सिंह गोदारा, राजस्थान के सिलवाला खुर्द में मशरूम फार्मिंग करते हैं और प्रोटेस्ट में शामिल होने के लिए जंतर-मंतर पहुंचे हैं. प्रोटेस्ट साइट पर पड़ने वाली गर्मी को लेकर वे कहते हैं, "गर्मी लगने के लिए ही होती है. कुछ फर्क नहीं पड़ता है. यहां पर लोग एक दूसरे की मदद कर रहे हैं. हाथों से फैन चला रहे हैं. आप काम करते रहिए, तो गर्मी नहीं लगती है. सब मन का वहम है. मेरी पूरी टीशर्ट भीगी है लेकिन मुझे गर्मी नहीं लग रही है."

हाथ के पंखों से लोगों को हवा देने वाले छात्रों का कहना है कि वे ये काम ख़ुद से ही कर रहे हैं. (Photo: Sakib Mazeed)
दिग्विजय आगे कहते हैं कि अगर आज गर्मी और उमस से डरकर हम इस लड़ाई में नहीं शामिल होंगे, तो कल को हमें हमारे बच्चों के लिए आना पड़ेगा. इससे बेहतर है कि आज ही आकर लड़ाई लड़ ली जाए.
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