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जंग जारी रही तो दवा उद्योग पर भी पड़ेगा असर, MRI मशीनों का क्या होगा

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के अभी रुकने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं. इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ रहा है. इससे दवा उद्योग भी अछूता नहीं है. जानिए भारत के दवा उद्योग पर इस युद्ध का क्या असर हो सकता है.

जंग जारी रही तो दवा उद्योग पर भी पड़ेगा असर, MRI मशीनों का क्या होगा
नई दिल्ली:

मध्य पूर्व में जारी युद्ध का आज 25वां दिन है. इस युद्ध से दुनिया हलकान है. तेल की कीमतें रोज बढ़ रही हैं. इस युद्ध का दबाव दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर देखा जा रहा है.अगर यह युद्ध लंबा चला तो भारत में तेल और गैस के साथ-साथ दवा और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर भी असर पड़ेगा. यह असर दवाओं के सप्लाई चेन से लेकर उनके निर्माण तक पर पड़ेगा. भारत जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा सप्लायर है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में जेनरिक दवाओं की सप्लाई में भारत की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है. भारत ने 2024-25 में 30.5 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात किया था. भारत का दवा बाजार करीब 50 अरब डॉलर का है. इसके 2030 तक बढ़कर 130 अरब डॉलर का हो जाने का अनुमान  है. 

कैसे दूसरे देशों में जाएंगी दवाएं

पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध भारत के दवा उद्योग के लिए अच्छा संकेत नहीं है.भारत अपने दवा निर्यात का करीब छह फीसद मध्य पूर्व और खाड़ी के देशों को करता है. इसके अलावा दवा कंपनियों के लिए चीन से आने वाला कच्चा माल भी इन्हीं मध्य पूर्व के देशों से होकर आता है. इसलिए इस युद्ध का असर दोनों तरह से पड़ रहा है. भारत में तैयार दवाओं की मध्य पूर्व के देशों में भेजने की लागत बढ़ेगी और चीन से आने वाले कच्चे माल की ढुलाई भी प्रभावित होगी. एक तीसरी समस्या भी है. मध्य पूर्व के देश अमेरिका और यूरोप के देशों को भेजी जाने वाली दवाओं का ट्रांजिट प्वाइंट भी है, ऐसे अगर युद्ध लंबा खिंचा तो दवाओं के अमेरिका और यूरोप को होने वाले निर्यात पर भी असर पड़ सकता है. 

अभी के समय में शिपिंग कंपनियां मध्य पूर्व के देशों के लिए सामान भेजने में आनाकानी कर रही है और अगर बुकिंग कर भी रही हैं तो अतिरिक्त शुल्क भी वसूल रही हैं. इस युद्ध का असर केवल समुद्री आवागमन पर ही नहीं बल्कि हवाई यातायात पर भी पड़ा है. कई विमानन कंपनियों ने रास्ता बदल लिया है,क्योंकि यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि कब कौन सा रूट बंद हो जाएगा. इससे पहले से महंगा माना जाने वाला हवाई यातायात और भी महंगा हो गया है. 

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दवाओं के निर्माण पर असर 

पैरासिटामोल, पेनिसिलिन, एंटीबायोटिक्स और सिडेटिव जैसी दवाएं बेंजीन, टोल्यून और एथिलीन जैसे पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक से बनती हैं. ये एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट (एपीआई) के महत्वपूर्ण घटक हैं. कई छोटे अणु वाले एपीआई के निर्माण में पेट्रोकेमिकल का इस्तेमाल होता है. इनके अलावा सिरिंज, आईवी बैग और डायग्नोस्टिक किट बनाने में पेट्रोकेमिकल से बने प्लास्टिक और पॉलिमर का इस्तेमाल होता है. दवाओं की पैकेजिंग भी काफी हद तक इन्हीं पेट्रोकेमिकल पर निर्भर हैं.

युद्ध की वजह से इन पेट्रोकेमिकल की सप्लाई चेन प्रभावित हुई है. अगर युद्ध और लंबा खिंचा तो इसका असर दवाओं के उत्पादन पर दिखेगा. दरअसल बड़ी दवा कंपनियां तो तीन से छह महीने तक का कच्चा माल रखतीं हैं. लेकिन छोटी दवा कंपनियां उतना कच्चा माल स्टोर नहीं करती हैं. लेकिन सप्लाई चेन टूटने से उनका उत्पादन प्रभावित हो सकता है. ये छोटी दवा कंपनियां ही ज्यादातर जेनरिक दवाएं बनाती हैं. ये सस्ती जेनेरिक दवाएं ही प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र, सरकारी अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को भेजी जाती हैं. ऐसे में उनका कामकाज प्रभावित होने से एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक, डायबिटीज और हृदय रोग की दवाओं की सप्लाई प्रभावित होगी. इसका असर आम लोगों पर पड़ने की आशंका अधिक है. 

क्या ठप हो जाएंगी एमआरआई मशीनें 

इस युद्ध की वजह से हीलियम गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है. इसने हेल्थकेयर सेक्टर की चिंता में इजाफा किया है. इसका सबसे अधिक असर एमआरआई (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) स्कैन की लागत और नई मशीनों पर पड़ने की आशंका है. हीलियम एक रंगहीन, गंधहीन गैस है. यह एक गैर-नवीकरणीय संसाधन है. इसे एक रेयर अर्थ मैटेरियल माना जाता है, लेकिन धरती पर यह हाईड्रोजन के बाद सबसे अधिक पाई जाने वाली गैस है. अमेरिका और रूस के बाद कतर दुनिया में इसका तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है. इसका इस्तेमाल एमआरआई मशीनों के संचालन में किया जाता है. हीलियम का तरल रूप एमआरआई मशीन की सुपरकंडक्टिंग चुंबकों को ठंडा रखने का काम करता है.ये चुंबक एमआरआई मशीन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से हैं. ये चुंबक करीब -269 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर काम करते हैं. इतना कम तापमान के लिए हीलियम का इस्तेमाल कूलेंट के रूप में किया जाता है.

एमआरआई मशीने तीन प्रकार की होती हैं- हीलियम-फ्री, जीरो बॉयल ऑफ सिस्टम और  नॉन-जीरो बॉयल ऑफ सिस्टम. इनमें से हीलियम-फ्री मशीन के लिए हीलियम की जरूरत नहीं होती है. वहीं जीरो बॉयल ऑफ सिस्टम को प्रतिवर्ष 100–150 लीटर हीलियम की जरूरत होती है. वहीं नॉन-जीरो बॉयल-ऑफ सिस्टम को प्रतिवर्ष 600 लीटर तक हीलियम की जरूरत होती है. भारत में काम कर रहीं अधिकांश एमआरआई मशीने अंतिम दो तरह की हैं, जिनके लिए हीलियम जरूरी है.

एक एमआरआई मशीन की स्थापना के समय करीब 15 सौ लीटर हीलियम की जरूरत होती है. एक बार स्थापना के बाद इन मशीनों में हीलियम के रीफीलिंग की जरूरत पड़ती है. अगर किसी मशीन में हीलियम का स्तर 40 फीसदी से कम हो जाए तो उस स्थिति में उसका चुंबक काम नहीं करता है. भारत में करीब पांच हजार एमआरआई मशीने हैं. इनमें से करीब 150 ही हीलियम फ्री हैं. बाकी की मशीनों के लिए हीलियम जरूरी है. लेकिन खास बात यह है कि इन मशीनों में हीलियम की जरूरत हमेशा नहीं रहती है, मुख्य तौर पर इसकी जरूरत रिपेयरिंग के समय ही होती है. इसलिए अभी बहुत घबराने की जरूरत नहीं है. लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो हीलियम की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इसका परिणाम यह हो सकता है कि नई एमआरआई मशीने लगाने का काम प्रभावित हो. 

भारत के दवा उद्योग का साइज

दवाओं की दुनिया में भारत उत्पादन के हिसाब से तीसरे नंबर का देश है. भारत मूल्य (वैल्यू) के मामले में 11वें नंबर पर है. भारत में तीन हजार से अधिक दवा कंपनियां और साढ़े 10 हजार से अधिक कारखाने हैं. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में इस सेक्टर का कुल कारोबार 4.72 लाख करोड़ रुपए का था. वहीं पिछले 10 सालों में दवा निर्यात में हर साल औसतन सात फीसदी की दर से बढ़ा है. भारत में 60 अलग-अलग चिकित्सा श्रेणियों में करीब 60 हजार जेनेरिक दवाएं बनाई जाती हैं.

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