केंद्र की मोदी सरकार ने राज्यों के बीच चल रहे दशकों पुराने कई जल विवादों को सुलझाने में बड़ी कामयाबी हासिल की है. एक महीने के भीतर ही ऐसे बड़े समझौते हुए हैं जिन्होंने सालों से चली आ रही कड़वाहट को दूर करने में कामयाबी हासिल की है. आला सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में भी यह सिलसिला जारी रहेगा.
2047 में विकसित भारत बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के बीच चले आ रहे दशकों पुराने विवादों को हल करने पर जोर दिया है. उन्होंने इसके लिए सहकारी संघवाद की भावना को आगे बढ़ाने की बात कही थी और टीम इंडिया के तहत मिल कर काम करने पर जोर दिया है.
यमुना जल परियोजना कहां लगेगी
इनमें से कई विवाद नदियों के जल के बंटवारे से जुड़े हैं तो कुछ सीमा के विवाद भी हैं. इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने जल विवादों को सुलझाने के लिए पहल की. सबसे पहले उन विवादों पर ध्यान केंद्रित किया गया जो बीजेपी शासित राज्यों के बीच आपस में था. इन पर सहमति बनाने के लिए जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल और गृह मंत्री अमित शाह के साथ इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कई दौर की बैठकें हुईं. इसका परिणाम है कि केवल एक महीने के भीतर ही कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं. गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में 29 जून को हरियाणा और राजस्थान ने यमुना जल परियोजना को लेकर समझौते पर दस्तखत किए. राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के बीच बनी सहमति के बाद दोनों राज्यों ने करीब 30 साल पुराने विवाद को पीछे छोड़ते हुए यमुना जल परियोजना के निर्माण और इसके क्रियान्वयन को लेकर एक ऐतिहासिक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते से राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र और हरियाणा के सीमावर्ती इलाकों में यमुना के सरप्लस पानी के अधिकतम उपयोग का रास्ता साफ हुआ है.
मोदी जी के ‘संवाद से समाधान' के मंत्र से देश की दशकों पुरानी अनेक समस्याओं का समाधान हो रहा है। इसी क्रम में आज राजस्थान–हरियाणा यमुना जल परियोजना के ऐतिहासिक समझौते से तीन दशक पुरानी जल समस्या का समाधान हुआ।
— Amit Shah (@AmitShah) June 29, 2026
इस समझौते से दोनों राज्यों को लाभ होगा और पेयजल आपूर्ति सुदृढ़ होगी।… pic.twitter.com/3FryWUkqSX
सात जुलाई को एक बड़ी पहल में नर्मदा नदी परियोजना भुगतान विवाद को हल किया गया. इसमें चार राज्यों के मुख्यमंत्री एक साथ आए. मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र सभी बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने गृह मंत्री शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर प्रोजेक्ट और इंद्रा सागर प्रोजेक्ट से जुड़े दशकों पुराने वित्तीय और पुनर्वास विवाद को पूरी तरह सुलझा लिया. इन परियोजनाओं में विस्थापितों के पुनर्वास खर्च, जलमग्न हुई जमीन के मुआवजे और निर्माण के लिए लिए गए कर्ज के ब्याज को लेकर राज्यों के बीच लंबे समय से बकाया लंबित था. चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने 'वन-टाइम सेटलमेंट' समझौते पर हस्ताक्षर कर इस वित्तीय गतिरोध को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया.
क्या किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर भी होगा समझौता
अब अगला बड़ा समझौता 15 जुलाई को होने की संभावना है. यह छह राज्यों से जुड़ी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना का समझौता है. हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के बीच यह समझौता गृह मंत्री शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में दस्तखत होने की संभावना है जिसमें सभी छह मुख्यमंत्री मौजूद रहेंगे.
यमुना की सहायक टोंस नदी पर बनने वाली किशाऊ बांध परियोजना और यमुना नदी के पुनर्जीवन को लेकर इन छह राज्यों के बीच गृह मंत्री शाह के दखल के बाद एक व्यापक सहमति बन गई है. जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की पहल पर हुए इस समझौते से आने वाले समय में दिल्ली सहित इन सभी राज्यों को पीने के पानी की आपूर्ति और बिजली उत्पादन में बड़ी मदद मिलेगी. इस समझौते से इन सभी राज्यों को लाभ मिलेगा.
सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में कुछ और भी बड़े समझौते होने जा रहे हैं जिनके लिए सहमति बनाने पर प्रयास चल रहा है. इनमें थोड़ा समय लग सकता है क्योंकि आपसी विवाद के इन राज्यों में कुछ विपक्ष के शासन वाले राज्य भी हैं.
एक बड़ा घटनाक्रम बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी विवाद के हल के तौर पर देखने को मिल सकता है. दशकों से चला आ रहा यह विवाद सुलझ रहा है. जल्दी ही इसे लेकर समझौता हो सकता है. 1973 में तत्कालीन अविभाजित बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच 'बाणसागर समझौता' हुआ था. साल 2000 में झारखंड के गठन के बाद से ही वह सोन नदी के पानी में अपने हिस्से यानी दो मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) की मांग कर रहा था, जिसे लेकर बिहार और झारखंड में गतिरोध था. इसे अब सुलझा लिया गया है. इसके तहत कुल 7.75 एमएमएफ पानी में से बिहार को 5.75 और झारखंड को दो एमएएफ पानी मिलेगा. इस ऐतिहासिक समझौते से दोनों राज्यों के बीच इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है. इससे दोनों राज्यों के किसानों को भारी फायदा होगा.
क्या सुलझ पाएगा कृष्णा नदी के पानी बंटवारे का विवाद
केंद्र के दखल के बाद कृष्णा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद के सुलझने के आसार भी बने हैं. हाल ही में कर्नाटक और तेलंगाना ने सहयोग की एक नई मिसाल पेश की है. इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार है. अपने-अपने राज्यों के हितों के मद्देनजर इन राज्यों के बीजेपी नेताओं की आशंकाओं के बावजूद केंद्र ने इस पर आगे बढ़ने का फैसला किया है.
दरअसल, 2014 में तेलंगाना का गठन होने के बाद से वह कृष्णा नदी के पानी में अपने लिए बड़े हिस्से की मांग कर रहा है. केंद्र सरकार ने इस विवाद को सुलझाने के लिए कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण का कार्यकाल बढ़ाकर 31 जुलाई 2026 तक किया हुआ है. इस बीच पुरानी कड़वाहट को दरकिनार करते हुए तेलंगाना और कर्नाटक सरकारों ने कृष्णा नदी पर नारायणपुर बांध के निचले बहाव पर एक संयुक्त बैराज बनाने का फैसला किया है. इसके लिए दोनों राज्यों के मंत्रियों के बीच हैदराबाद में सकारात्मक बैठक हुई. यह बैराज दोनों राज्यों के सीमावर्ती गांवों में पीने के पानी की किल्लत को दूर करेगा.
केंद्र सरकार के सूत्रों के अनुसार आने वाले समय में तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों से चले आ रहे कावेरी जलविवाद के हल के लिए भी कदम उठाए जाएंगे. यह भारत का सबसे पुराना और सबसे चर्चित जल विवाद है. कमजोर मानसून की आशंकाओं और मेकेदातु परियोजना के कारण यह एक बार फिर गरमा गया है. दरअसल, कर्नाटक कावेरी के ऊपरी बहाव पर स्थित है और तमिलनाडु निचले बहाव पर. तमिलनाडु का डेल्टा क्षेत्र पूरी तरह कावेरी के पानी पर निर्भर है, जबकि कर्नाटक का तर्क है कि उसे बेंगलुरु जैसे महानगरों के पीने के पानी और अपनी सिंचाई के लिए अधिक पानी चाहिए. कर्नाटक सरकार कावेरी नदी पर मेकेदातु में एक जलाशय और पीने के पानी की परियोजना बनाना चाहती है. तमिलनाडु इसका कड़ा विरोध कर रहा है. जून-जुलाई 2026 में तमिलनाडु विधानसभा ने इसके खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया है और तमिलनाडु कांग्रेस ने भी स्पष्ट किया है कि वे तमिलनाडु की सहमति के बिना वहां एक ईंट भी नहीं रखने देंगे. जबकि कर्नाटक में कांग्रेस की ही सरकार है.
इन सभी समझौतों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जो पानी कानूनी लड़ाइयों और वित्तीय विवादों के कारण सालों से अटका हुआ था, अब उसका सीधा लाभ देश के किसानों और आम जनता को मिल सकेगा. दशकों से लटके यह विवाद दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की राह देख रहे थे. यह एक सकारात्मक घटनाक्रम है कि इन्हें एक-एक कर सुलझाया जा रहा है.
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