राजधानी दिल्ली के रोहिणी सेक्टर 16 में एक निर्माणाधीन इमारत के गिरने से अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है. इससे पहले मुंबई के मानखुर्द के जनता नगर इलाके में चार मंजिला इमारत भरभराकर गिर गई. इमारत पास की झोपड़ियों पर आ गिरी, जिससे छह लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए. वहां रह रहे लोगों को इस चार मंजिला इमारत में इसके गिरने के निशान पहले ही दिखने लगे थे.

दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-16 में गिरी निर्माणाधीन इमारत के मलबे
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स्थानीय लोगों के मुताबिक, हादसे से कई घंटे पहले ही इमारत में दरारें पड़ने लगी थीं और वह एक तरफ झुकती हुई दिखाई दे रही थी. खतरे को देखते हुए कुछ परिवार दिन में ही बाहर निकल गए थे. लेकिन पास की झोपड़ियों में रहने वाले लोगों को शायद अंदाजा नहीं था कि रात होते-होते पूरी इमारत उन पर आ गिरेगी.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी, बल्कि यह भी है कि खतरे के संकेत मिलने के बावजूद हादसा क्यों नहीं टल सका.

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मानखुर्द बार-बार चर्चा में क्यों आता है?
मुंबई के पूर्वी हिस्से में स्थित मानखुर्द लंबे समय से अवैध निर्माण, घनी आबादी और पुनर्वास की धीमी रफ्तार जैसी समस्याओं से जूझ रहा है. शहरी योजनाकार बताते हैं कि इस इलाके का बड़ा हिस्सा कभी दलदली जमीन था. समय के साथ यहां बस्तियां बसती चली गईं. ऐसी जमीन पर मजबूत नींव और सुरक्षित निर्माण करना पहले से ही चुनौती होता है. अगर निर्माण बिना इंजीनियरिंग मानकों या मंजूरी के हो, तो जोखिम और बढ़ जाता है. इसी वजह से मानखुर्द में कई इमारतें समय के साथ कमजोर होती चली जाती हैं, खासकर मानसून के दौरान.

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क्या सिर्फ अवैध निर्माण ही जिम्मेदार है?
अवैध निर्माण एक बड़ी वजह जरूर है, लेकिन पूरी कहानी नहीं. कई बार एक या दो मंजिल की इमारत पर धीरे-धीरे तीसरी और चौथी मंजिल जोड़ दी जाती है. कई जगह निर्माण के दौरान क्वालिटी की जांच नहीं होती और न ही स्ट्रक्चरल ऑडिट कराया जाता है. मानखुर्द में जो चार मंजिला इमारत गिरी है उसके बारे में नगर निगम के अधिकारियों ने कहा कि ढही हुई इमारत अनधिकृत थी.
मुंबई में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके लिए कानूनी और सुरक्षित मकान खरीदना या किराए पर लेना करीब-करीब नामुमकिन है. ऐसे में वे मजबूरी में उन्हीं इलाकों में रहते हैं जहां घर तो सस्ता मिल जाता है, पर उसकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती. यही वजह है कि एक्सपर्ट इस समस्या को सिर्फ अवैध निर्माण नहीं, बल्कि हाउसिंग क्राइसिस भी मानते हैं.
अगर इमारत अवैध थी, तो पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यह सवाल भी बार-बार उठता है. कई अवैध बस्तियां और इमारतें वर्षों पुरानी हैं. ऐसे मामलों में अदालतों के आदेश, पुनर्वास की प्रक्रिया और कानूनी नियमों के कारण प्रशासन तुरंत कार्रवाई नहीं कर पाता. दूसरी ओर, हजारों परिवारों को बिना वैकल्पिक व्यवस्था के हटाना भी आसान नहीं होता. यानी कानून लागू करने और लोगों को बेघर होने से बचाने के बीच प्रशासन को अक्सर मुश्किल संतुलन बनाना पड़ता है. हालांकि सभी मामलों में ऐसा ही नहीं होता, कई जर्जर इमारतों को लेकर मुंबई प्रशासन नोटिस देकर मकान को खाली करता है और वहां रह रहे लोगों को नई जगह शिफ्ट कराया जाता है.

राजधानी दिल्ली में जून 2026 में एक इमारत ढहने से छह लोगों की मौत हो गई
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क्या ऐसी घटनाएं सिर्फ मुंबई में होती हैं?
जी नहीं, केवल मुंबई ही इससे परेशान नहीं है बल्कि आए दिन देश के विभिन्न शहरों से ऐसी खबरें आती रहती हैं. मई के अंत में ऐसी ही एक खबर राजधानी दिल्ली से भी आई थी जहां साकेत में एक इमारत के ढहने से छह लोगों की मौत हो गई थी.
दुनिया के कई बड़े शहर भी इस तरह की चुनौती का सामना कर रहे हैं. नाइजीरिया के लागोस में अवैध निर्माण और कमजोर निगरानी के कारण इमारत गिरने की घटनाएं बार-बार होती हैं. अभी 26 जून को ही तीन मंजिला इमारत के ढहने से वहां 9 लोगों की मौत हो गई थी.
मिस्र की राजधानी काहिरा से भी पुरानी और बिना अनुमति बदली गई इमारतों के ढहने की खबरें अक्सर आती रहती हैं. बांग्लादेश की राजधानी ढाका और पाकिस्तान के कराची में भी तेजी से बढ़ती आबादी, सस्ते घरों की कमी और निर्माण नियमों की अनदेखी ने कई जानलेवा हादसों को जन्म दिया है.
मतलब साफ है कि केवल मुंबई नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ती महानगरों की आबादी की यह साझा चुनौती है.
क्या अवैध इमारतों को गिराने से मसला हल हो जाएगा?
जानकारों का मानना है- नहीं. उनका कहना है कि अगर सभी अवैध इमारतें गिरा भी दी जाएं और वहां रह रहे लोगों को सुरक्षित और किफायती घर मुहैया न कराया जाए तो वो किसी अन्य असुरक्षित बस्ती में रहने को मजबूर हो जाएंगे.
इसलिए समाधान सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि उनके जल्दी पुनर्वास, सुरक्षित आवास, और उस इमारत की नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट, निर्माण नियमों का सख्ती से पालन और समय रहते खतरे की पहचान भी है.
दिल्ली हो या मुंबई या हो बेंगलुरु इमारतों का गिरना वैसे तो कई कारकों पर निर्भर है लेकिन यह तेजी से बढ़ते शहरों की उस हकीकत को सामने लाता है, जहां आबादी बढ़ती जा रही है लेकिन सुरक्षित आवास उतनी तेजी से नहीं बन पा रहे हैं.
जब तक शहरों में सस्ते और सुरक्षित घरों की उपलब्धता नहीं बढ़ेगी, अवैध निर्माण पर शुरुआती स्तर पर रोक नहीं लगेगी और कमजोर इमारतों की समय-समय पर जांच नहीं होगी, तब तक हर मानसून के साथ ऐसे हादसों का खतरा बना रहेगा. क्योंकि इसके पीछे सच्चाई यही है कि पुरानी और जर्जर होती इमारतें गिरती इसिलिए हैं क्योंकि वे सालों की लापरवाही, कमजोर निगरानी और अधूरी योजनाओं का नतीजा होती हैं.
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