- भारतीय वैज्ञानिकों ने बताया है कि 'गंदा पुराना कोयला' नए जमाने का 'काला सोना' बन सकता है.
- ये भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के साथ एक साफ-सुथरे और हरे-भरे 'विकसित भारत' के सफर में मदद कर सकता है.
- कोयले को लेकर 'ब्लैक इज डर्टी' की सोच 'ब्लैक इज ब्यूटीफुल' हो रही है, ये ऊर्जा क्रांति की नई पहचान बन सकती है.
भारत आज एक कड़वे सच के सामने खड़ा है. एक तरफ देश तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जहां ऊर्जा की मांग हर दूसरे दिन बढ़ रही है. तो दूसरी तरफ उस हकीकत से सामना भी है कि तेल, गैस और अन्य कई जरूरी औद्योगिक फ्यूल के लिए भारत आज भी बहुत हद तक बाहर के देशों पर निर्भर है. पर एक सबसे अहम बात ये कि भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक है. अब, जब मध्य-पूर्व में तनाव से सप्लाई चेन बाधित हो रहे हैं जिससे फ्यूल आपूर्ति की कमजोरियां उजागर हो रही हैं तो भारत एक नए सवाल के साथ कोयले की ओर फिर से देख रहा है.
सवाल ये कि क्या इस तथाकथित गंदे ईंधन को साफ और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है?
लंबे समय से भारत के कोयले को 'खलनायक' माना जाता रहा है, लेकिन इस विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) पर भारतीय वैज्ञानिकों ने बताया है कि कैसे 'गंदा पुराना कोयला' असल में नए जमाने का 'काला सोना' बन सकता है और ऊर्जा आत्मनिर्भरता के साथ एक साफ-सुथरे और हरे-भरे 'विकसित भारत' के सफर में मदद कर सकता है.
तो क्या भारत अपने ही कोयले को साफ और स्मार्ट तरीके से इस्तेमाल करके ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल कर सकता है?

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आंकड़े जो पूरी कहानी साफ कर देते हैं
भारत के पास करीब 400 अरब टन कोयले के भंडार हैं, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में गिने जाते हैं. लेकिन तस्वीर दूसरी तरफ कुछ और ही है.
भारत की ऊर्जा जरूरत का लगभग 55% हिस्सा कोयले से पूरा होता है.
देश की 74% बिजली कोयले से बनती है
भारत को लगभग 83% कच्चा तेल बाहर से मंगाना पड़ता है.
50% प्राकृतिक गैस भी आयात करनी पड़ती है.
कई केमिकल और इंडस्ट्रियल फीडस्टॉक में 80–90% तक निर्भरता विदेशों पर है.
इससे यह तो स्पष्ट है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतें घरेलू संसाधनों से पूरी नहीं कर पाता है.
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वैश्विक संकट ने चिंता और बढ़ा दी है
मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव- ईरान vs इजरायल और अमेरिका युद्ध ने पूरी दुनिया को फिर से ये याद दिलाया है कि ऊर्जा सप्लाई कितनी नाजुक होती है. होर्मुज स्ट्रेट जैसे अहम समुद्री रास्तों में रुकावट का सीधा असर दुनिया में तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल, सप्लाई चेन में अनिश्चितता पैदा होना.
इसका भारत जैसे देशों पर सीधा असर पड़ता है. तो संदेश बिल्कुल साफ है. अब सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा पर्याप्त नहीं है, असली जरूरत है ऊर्जा आत्मनिर्भरता की. भारत तेजी से एनर्जी इंडिपेंडेंस चाहता है, और यहीं पर कोयले की फिर से खोज हो रही है.

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कोयले का नया रूप: गैसीफिकेशन तकनीक
अब बात पुराने तरीके से कोयला जलाने की नहीं हो रही है, बल्कि उसे बदलने की हो रही है. भारत अब कोयला गैसीफिकेशन पर जोर दे रहा है. इस प्रक्रिया में कोयले को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसे एक साफ गैस में बदला जाता है जिसे सिंथेसिस गैस कहते हैं.
यह गैस कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण होती है.
इससे कई चीजें बनाई जा सकती हैं. जैसे- खाद, मेथनॉल, अमोनिया, सिंथेटिक फ्यूल, हाइड्रोजन एनर्जी. यानी एक ही कोयले से पूरा इंडस्ट्रियल सिस्टम खड़ा किया जा सकता है.
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भारत की बड़ी योजना: 37500 करोड़ का दांव
भारत सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने 37500 करोड़ रुपये की कोयला और लिग्नाइट गैसीफिकेशन योजना शुरू की है. इसका लक्ष्य है 75 मिलियन टन कोयले का गैसीफिकेशन. इससे कई लाख करोड़ रुपये का निवेश आने की उम्मीद है. इससे पहले भी एक 8500 करोड़ रुपये की पायलट योजना शुरू की जा चुकी है.
इस बदलाव की कमान कई बड़ी भारतीय कंपनियों और संस्थानों के हाथ में है- कोल इंडिया लिमिटेड, भारत हेवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड, थर्मैक्स.
देसी टेक्नोलॉजी में बड़ी छलांग
भारत हेवी इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड ने एक स्वदेशी तकनीक विकसित की है. प्रेशराइज्ड फ्लूडाइज्ड बेड गैसीफिकेशन (Pressurised Fluidised Bed Gasification). यह खास तौर पर भारत के हाई-ऐश कोयले (35% से 45% तक राख वाले कोयले) के लिए बनाई गई है.
इस तकनीक से कोयला सिनगैस में बदल जाता है. बिजली बनाई जा सकती है. मेथनॉल और अमोनिया जैसे केमिकल तैयार किए जा सकते हैं.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
डॉ. वीके सारस्वत जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की ऊर्जा मांग आने वाले वर्षों में और तेजी से बढ़ेगी.
उनका कहना है, “अगर हम कोयले को पुराने तरीके से इस्तेमाल करते रहे, तो यह गंदा ईंधन ही रहेगा. लेकिन अगर हम इसे साफ तरीके से इस्तेमाल करें, तो यही हमारी ताकत बन सकता है.”
वे ये भी बताते हैं, गैसीफिकेशन से प्रदूषण काफी कम किया जा सकता है. अगर कार्बेन कैप्चर जोड़ दिया जाए तो उत्सर्जन लगभग शून्य के करीब पहुंच सकता है. भारत के पास इतना कोयला है कि यह 180 से 200 साल तक ऊर्जा दे सकता है.
पुराना मिथक टूटा
पहले यह माना जाता था कि भारत का हाई-ऐश कोयला इस्तेमाल के लायक नहीं है. लेकिन अब यह सोच बदल रही है. पायलट प्रोजेक्ट्स में भारतीय कोयले से सिनगैस बन रहा है. मेथनॉल का उत्पादन भी शुरू हो चुका है. यानी यह साबित हो रहा है कि भारतीय कोयला भी काम का है.

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भविष्य में क्या बदल सकता है?
कोयला गैसीफिकेशन से भारत तेल आयात पर निर्भरता बहुत हद तक कम कर सकता है. गैस का आयात भी घटा सकता है. उर्वरक के आयात में बड़ी कटौती संभव है. केमिकल सेक्टर को भी मजबूत बना सकता है और हाइड्रोजन आधारित/संचालित अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ सकता है
बता दें कि चीन जैसे देश पहले ही इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपना चुके हैं. अब भारत अपनी खुद की देसी तकनीक के साथ तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.
तो भारत को जहां एक तरफ तेज विकास की जरूरत है वहीं दूसरी ओर उसने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है.
इसी संतुलन की वजह से कोयला एक संभावित समाधान माना जा रहा है. बस शर्त ये है कि इसे साफ तरीके से इस्तेमाल किया जाए.
तो कोयले को लेकर 'ब्लैक इज डर्टी' की सोच बदलकर 'ब्लैक इज ब्यूटीफुल' हो रही है, जो भारत की ऊर्जा क्रांति की नई पहचान बन सकती है.
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