कर्नाटक में आखिरकार वही हो गया जो लंबे समय से चर्चा में था. सत्ता का ट्रांसफर. सिद्धारमैया ने इस्तीफा दे दिया और अब डीके शिवकुमार की ताजपोशी तय मानी जा रही है. लेकिन असली सवाल ये है कि जो काम कांग्रेस राजस्थान और छत्तीसगढ़ में नहीं कर पाई, वो कर्नाटक में इतनी आसानी से कैसे हो गया?
दरअसल, इस बार पूरा खेल दिल्ली से तय हुआ. राहुल गांधी ने सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों को बुलाया, मीटिंग की और फिर सिद्धारमैया को अलग से बुलाकर साफ कहा- अब आपको इस्तीफा देना चाहिए और डीके शिवकुमार को कुर्सी सौंप देनी चाहिए. साथ में ये भी ऑफर दिया कि आप राज्यसभा के जरिए दिल्ली आ जाइए, आपके अनुभव की जरूरत पड़ेगी.
सिद्धारमैया ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की. उन्होंने कहा कि सरकार अच्छी चल रही है, गारंटी योजनाएं लागू हो रही हैं और अगला चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जाना चाहिए. यहां तक कहा कि 2028 में वे खुद सत्ता डीके शिवकुमार को सौंप देंगे. लेकिन इस बार राहुल गांधी नहीं माने. राहुल ने सीधा फैसला सुनाया और कोई समझौता नहीं किया.

दिल्ली से हुआ कर्नाटक का फैसला.
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दिल्ली से तय हुआ फैसला, विधायकों की राय नहीं
सबसे अहम बात यह रही कि इस बार न कोई ऑब्जर्वर बेंगलुरु भेजा गया, न विधायकों की राय ली गई. वजह साफ थी, ज्यादातर विधायक सिद्धारमैया के साथ थे. अगर उनकी राय ली जाती तो मामला अटक सकता था, जैसा पहले हो चुका है.
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राजस्थान-छत्तीसगढ़ में क्यों फेल हुआ फॉर्मूला?
अब जरा राजस्थान की तरफ चलते हैं. 2022 में कांग्रेस आलाकमान अशोक गहलोत को हटाकर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था. इसके लिए ऑब्जर्वर जयपुर भेजे गए, लेकिन गहलोत कैंप ने विधायकों की ताकत दिखा दी. पूरा प्लान वहीं फेल हो गया. आलाकमान को पीछे हटना पड़ा और बाद में चुनाव भी हार गए.
छत्तीसगढ़ की कहानी भी लगभग ऐसी ही रही. वहां 90 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस के पास 68 विधायक थे. जबरदस्त बहुमत. फॉर्मूला बना कि भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहेंगे. लेकिन जब भी बदलाव की बात आई, बघेल समर्थक विधायक जुटा लेते थे. हाईकमान हर बार दबाव में आ गया और फैसला टलता गया. नतीजा यह हुआ कि अंदरूनी लड़ाई के चक्कर में चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा.
केरल का भी अहम किस्सा
केरल का उदाहरण भी दिलचस्प है. वहां विधायकों का झुकाव केसी वेणुगोपाल की तरफ बताया जाता था, लेकिन फैसला वीडी सतीशन के पक्ष में गया. यानी राहुल गांधी अब यह संकेत दे रहे हैं कि अंतिम फैसला दिल्ली में ही होगा, सिर्फ विधायकों की संख्या से नहीं.

सिद्धारमैया ने लोकभवन के सचिव को सौंपा इस्तीफा. राज्यपाल मौजूद नहीं थे.
कांग्रेस में भी दिख रहा हाईकमान कल्चर
अब फर्क साफ दिख रहा है. कर्नाटक में राहुल गांधी ने न तो विधायकों की परेड देखी, न ही किसी गुट का दबाव माना. सीधे फैसला लिया और लागू कराया. ये वही मॉडल है जो अब तक बीजेपी में देखने को मिलता था. केंद्रीय नेतृत्व तय करता है कि कौन मुख्यमंत्री होगा.
पार्टी के अंदर भी यही चर्चा है कि राहुल गांधी अब किसी क्षेत्रीय क्षत्रप के दबाव में नहीं आ रहे. फैसले लेने से पहले वे खड़गे, केसी वेणुगोपाल और अपने फीडबैक सिस्टम पर भरोसा कर रहे हैं. बताया जाता है कि कर्नाटक पर फैसला लेने से पहले वे 10 जनपथ भी गए थे.
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कांग्रेस के एक बड़े नेता का कहना है कि पहले फैसले टल जाते थे, अब सीधे लागू हो रहे हैं. और इसके पीछे बड़ी वजह है 2027-28 के विधानसभा चुनाव और 2029 का लोकसभा चुनाव. यानी साफ है, कर्नाटक सिर्फ CM बदलने की खबर नहीं है, ये कांग्रेस के बदलते पावर स्ट्रक्चर की कहानी है. अब देखना होगा कि राहुल गांधी का ये ‘नया हाईकमान मॉडल' आगे कितने राज्यों में सफल होता है.
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