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भोजशाला में अयोध्या का फैसला बना नजीर, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने गिनाए वो 10 सिद्धांत, जो मंदिर-मस्जिद विवाद में अहम साबित हुए

Bhojsahala Mandir Verdict: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला अपने आप में अलग‑थलग नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले में स्थापित सिद्धांतों पर आधारित है. इंदौर खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि उसने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए 10 सिद्धांतों को ध्यान में रखकर ये फैसला दिया है.

भोजशाला में अयोध्या का फैसला बना नजीर,  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने गिनाए वो 10 सिद्धांत,  जो मंदिर-मस्जिद विवाद में अहम साबित हुए
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  • मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार जिले के भोजशाला परिसर को ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से मंदिर मानते हुए फैसला दिया
  • कोर्ट ने अयोध्या फैसले के 10 सिद्धांतों को आधार मानकर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया है
  • एएसआई की रिपोर्ट को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना गया है, परंतु इसे अंतिम निर्णय का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता
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नई दिल्ली:

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर अब मंदिर माना जाएगा. शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले ने सारे विवाद का अंत कर दिया. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला अपने आप में अलग‑थलग नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले में स्थापित सिद्धांतों पर आधारित है. इंदौर खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि उसने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए 10 सिद्धांतों को ध्यान में रखकर ये फैसला दिया है.  अदालत ने स्पष्ट किया कि पुरातात्विक (archaeological) व्याख्या कोई अनुमान का विषय नहीं है, बल्कि यह एक बहु‑विषयी (multidisciplinary) वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

अदालत ने यह भी कहा कि विवादित धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के मूल्यांकन के दौरान कोर्ट ऐसे वैज्ञानिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर भरोसा कर सकती है. जस्टिस विजय शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा,“हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई (ASI) की अधिसूचनाओं और सर्वे रिपोर्ट का मूल्यांकन किया है और वह भी एएसआई अधिनियम के प्रावधानों तथा अयोध्या मामले में तय सिद्धांतों के आधार पर. ”

वो 10 सिद्धांत कौन से हैं?

1.पहला सिद्धांत: ‘संभावना का पलड़ा भारी होने पर तथ्य माना जाएगा'

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में बताया कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो पहला सिद्धांत तय किया था, वह यहां भी लागू होता है.
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सबूत का स्तर (burden of proof) गणितीय सटीकता या संदेह से परे (beyond reasonable doubt) जैसा नहीं होता.  इसके बजाय अदालतें “अधि‍क संभावना के आधार” (preponderance of probability) को मानक मानती हैं. इसका मतलब यह है कि अगर उपलब्ध सबूतों के आधार पर किसी एक घटना या तथ्य के सच होने की संभावना ज्यादा है, तो उसे सही माना जा सकता है.
यानी जब यह लगता है कि कोई तथ्य ज्यादा संभव है बजाय इसके कि वह न हुआ हो, तो अदालत उसे साबित मान सकती है.

2. दूसरा सिद्धांत: कोर्ट का काम ‘धार्मिक पूर्णता' तय करना नहीं है
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बताया कि अयोध्या फैसले का दूसरा प्रमुख सिद्धांत यह है कि आधुनिक अदालतों का काम किसी संरचना की धार्मिक या थियोलॉजिकल परफेक्शन (सिद्धांतगत शुद्धता) तय करना नहीं है. अदालत ने कहा कि कोर्ट का ध्यान इन बातों पर होना चाहिए:
➔लोगों की आस्था और विश्वास (Faith and belief)
➔वहां होने वाली पूजा‑पद्धति और धार्मिक उपयोग
➔धार्मिक संपत्ति (endowment) का अस्तित्व और प्रकृति
➔क्या यह व्यवस्था स्थायी (perpetual) है या नहीं
➔भक्तों का व्यवहार (conduct of worshippers)
➔उस स्थान से जुड़े ऐतिहासिक दावे
➔समय के साथ धार्मिक विश्वास की निरंतरता और स्थिरता

अदालतें यह नहीं देखतीं कि कोई धार्मिक स्थल सिद्धांत के हिसाब से कितना शुद्ध है, बल्कि यह देखती हैं कि लोगों की आस्था, पूजा और परंपरा उस जगह से कैसे जुड़ी रही है.

3.तीसरा सिद्धांत: पूजा करने वाले भी कर सकते हैं देवता के हितों की रक्षा
अदालत ने बताया कि अयोध्या फैसले से निकलने वाला तीसरा सिद्धांत यह है कि देवता, धार्मिक संपत्ति (endowment) और उससे जुड़े पवित्र उद्देश्य की रक्षा करना अदालत का मुख्य उद्देश्य होता है. इसका मतलब यह है कि देवता या उस धार्मिक उद्देश्य के हितों की रक्षा उसके लाभार्थी यानी पूजा करने वाले (worshippers) भी कर सकते हैं. इस संदर्भ में लोकस स्टैंडी (locus standi)यानी कौन कोर्ट में मामला दायर कर सकता है के नियम को कुछ हद तक लचीला किया जाता है, ताकि न्याय सुनिश्चित किया जा सके और धार्मिक उद्देश्य की रक्षा हो सके.

4. चौथा सिद्धांत: मूर्ति के नष्ट होने से धार्मिक अधिकार खत्म नहीं होते
अदालत ने बताया कि अयोध्या फैसले से निकला चौथा महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि मूर्ति (idol) के नष्ट होने या मौजूद न रहने से धार्मिक उद्देश्य (endowment) खत्म नहीं होता. हाई कोर्ट ने कहा कि अगर मूर्ति नष्ट हो जाए, या वहां कभी‑कभी ही मौजूद हो, या पूरी तरह अनुपस्थित हो, तब भी धार्मिक उद्देश्य और उससे जुड़ी कानूनी पहचान बनी रहती है. अदालत के मुताबिक, धार्मिक उद्देश्य को एक कानूनी इकाई (legal entity) के रूप में देखा जाता है, जो संपत्ति को धारण कर सकती है, श्रद्धा और समर्पण (dedication) को स्वीकार कर सकती है और भक्तों के हितों की रक्षा कर सकती है.मूर्ति का भौतिक अस्तित्व जरूरी नहीं है; उससे जुड़े धार्मिक उद्देश्य और आस्था ही मुख्य होते हैं.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी धार्मिक उद्देश्य को कानूनी पहचान दी जाती है, तो इससे यह सुनिश्चित होता है कि एक ऐसी कानूनी इकाई (entity) मौजूद रहे, जिसके नाम पर संपत्ति हो सके,जहां श्रद्धालु अपना समर्पण कर सकें और जिसके जरिए भक्तों के हितों की रक्षा की जा सके.हाई कोर्ट ने आगे कहा, “देवता की सुरक्षा आधुनिक अदालतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.”अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कोई औपचारिक ट्रस्ट (trust) मौजूद न हो, लेकिन अगर कोई संपत्ति किसी धार्मिक या परोपकारी उद्देश्य के लिए समर्पित की गई है और उसका उद्देश्य पवित्र है तो उस संस्था या उद्देश्य को कानूनी व्यक्तित्व दिया जा सकता है, ताकि उसके हितों की रक्षा की जा सके और उसकी संपत्ति सुरक्षित रह सके.

5. पांचवा सिद्धांत: आस्था का परीक्षण ‘सच्चाई' से, न कि तर्क से
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बताया कि अयोध्या फैसले का पांचवा महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि आस्था और विश्वास (faith and belief) का महत्व बहुत ज्यादा होता है, लेकिन इन्हें हमेशा सीधे दस्तावेजी सबूतों से सिद्ध नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा आस्था को हमेशा तर्क (logic) या धर्मशास्त्रीय व्याख्या से नहीं मापा जा सकता. यह व्यक्ति के व्यक्तिगत विश्वास का हिस्सा होती है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों को यह नहीं देखना चाहिए कि कोई विश्वास तार्किक है या नहीं,
बल्कि यह देखना चाहिए कि वह विश्वास वास्तविक और सच्चा है या नहीं. अदालत ने कहा,“परीक्षण का आधार तर्क नहीं, बल्कि विश्वास की सच्चाई होनी चाहिए .”

अदालत ने आगे कहा कि जब मालिकाना अधिकार जैसे मामलों का निर्णय किया जाता है, तो आस्था (faith) की निरंतरता और लगातार बने रहने जैसे कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं.अदालत के अनुसार,अगर कोई धार्मिक समुदाय लंबे समय तक लगातार किसी आध्यात्मिक तथ्य या स्थल में विश्वास रखता आया है और इस दावे को रिकॉर्ड में मौजूद अन्य साक्ष्य भी समर्थन देते हैं,तो अदालत को यह नहीं करना चाहिए कि वह दो अलग‑अलग आस्थाओं की ताकत की तुलना करे बल्कि अदालत का ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि जो विश्वास है, वह कितना सच्चा और वास्तविक है. अदालत ने स्पष्ट किया कि फैसला किसकी आस्था ज्यादा मजबूत है पर नहीं, बल्कि आस्था कितनी सच्ची है इस आधार पर होना चाहिए.

6.  छठा सिद्धांत: गजेटियर ऐतिहासिक संदर्भ के लिए उपयोगी, लेकिन अंतिम प्रमाण नहीं
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बताया कि अयोध्या फैसले का छठा सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि सरकारी गजट और गजेटियर का सबूत के रूप में क्या महत्व है. अदालत ने कहा कि गजट और गजेटियर अस्वीकार्य नहीं होते, इन्हें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और अगर अन्य साक्ष्यों से मेल खाते हैं, तो इनकी पुष्टि करने वाली भूमिका भी होती है, लेकिन अदालत ने साफ किया कि इन्हें अंतिम और निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता. न मालिकाना हक (title) तय करने के लिए, न किसी स्थान के धार्मिक स्वरूप के लिए और न ही विवादित ऐतिहासिक तथ्यों को अंतिम रूप से साबित करने के लिए. अदालत ने यह भी कहा कि इन दस्तावेजों की जानकारी को पूरे रिकॉर्ड के साथ सावधानीपूर्वक जांचना जरूरी है, जिसमें शामिल हैं.

➔समकालीन दस्तावेज (contemporaneous records)
➔आधिकारिक रिकॉर्ड
➔पुरातात्विक साक्ष्य
➔संबंधित पक्षों का व्यवहार
➔ अन्य परिस्थितियां

7. सातवां सिद्धांत: सरकारी रिकॉर्ड अकेले पर्याप्त नहीं
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अनुसार, अयोध्या फैसले का सातवां सिद्धांत यह बताता है कि सरकारी दस्तावेज़ जैसे आधिकारिक विवरण, प्रशासनिक नामकरण और पत्राचार साक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण हो सकते हैं, खासकर तब जब वे किसी विवादित स्थल को लगातार धार्मिक या ऐतिहासिक पहचान के साथ जोड़ते रहे हों. अदालत ने कहा कि ऐसे रिकॉर्ड मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं और अन्य दस्तावेजी, ऐतिहासिक, पुरातात्विक और पूजा से जुड़े सबूतों को मजबूती देते हैं लेकिन, ये दस्तावेज अपने आप में अंतिम निर्णय का आधार नहीं बन सकते ,न मालिकाना हक तय करने के लिए,न धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने के लिए.इनका उपयोग केवल इस रूप में किया जा सकता है कि वे अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ मिलकर मामले को समझने में मदद करें.

8. आठवां सिद्धांत: ‘वक्फ बाय यूजर' हर स्थिति में लागू नहीं
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बताया कि अयोध्या फैसले का आठवां सिद्धांत “वक्फ बाय यूजर” (Waqf by user) से जुड़ा है और इसमें सबूत की जिम्मेदारी पर जोर दिया गया है.अदालत ने कहा कि  धार्मिक सिद्धांतों या आंतरिक मान्यताओं को सीधे‑सीधे कानूनी अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, अगर इससे दूसरे समुदाय के स्थापित अधिकार प्रभावित होते हों.

अयोध्या फैसले के संदर्भ में अदालत ने समझाया कि जैसे हिंदू पक्ष ने भूमि को देवता की “कानूनी इकाई” (juristic entity) माना,
वहीं मुस्लिम पक्ष ने पूरे विवादित स्थल पर “वक्फ बाय यूज़र” का दावा किया, लेकिन इन दावों को इस तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि
दूसरे समुदाय के पहले से स्थापित धार्मिक अधिकार पूरी तरह खत्म हो जाएं.

9. नौवां सिद्धांत: एएसआई रिपोर्ट का साक्ष्य मूल्य
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बताया कि अयोध्या फैसले का नौवां सिद्धांत एएसआई (ASI) रिपोर्ट के महत्व से जुड़ा है.अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में हाई कोर्ट द्वारा एएसआई रिपोर्ट का सही तरीके से मूल्यांकन न करने के तरीके को स्वीकार नहीं किया था.हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि एएसआई रिपोर्ट की कार्यप्रणाली (methodology) और निष्कर्षों पर की गई आलोचनाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है. इसके बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 26 नियम 10(2) के अनुसार, आयुक्त  की ओर से दी गई रिपोर्ट और उसके साथ जुटाए गए साक्ष्य मामले के सबूत माने जाएंगे और रिकॉर्ड का हिस्सा होंगे.

अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेषज्ञों की राय जैसे एएसआई रिपोर्ट को सीधे अंतिम और निर्णायक नहीं माना जा सकता.ऐसे निष्कर्षों को अदालत को खुद छांटकर और परखकर (evaluate) देखना होगा. हाई कोर्ट ने कहा, पुरातत्व (Archaeology) एक बहु‑विषयी और विस्तृत वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें कई अलग‑अलग क्षेत्रों का अध्ययन शामिल होता है.इसी वजह से इसे कमजोर साक्ष्य नहीं माना जा सकता.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में फैसले का आधार पूर्ण सत्य (absolute truth) नहीं, बल्कि अधिक संभावना (preponderance of probability) होना चाहिए. अदालत ने कहा कि कुछ स्थितियों में तोड़‑फोड़ के निष्कर्ष सीधे नहीं बल्कि परिस्थितियों के आधार पर अनुमानित हो सकते हैं, जैसे अगर नई इमारत की अपनी नींव नहीं है और वह पुरानी संरचना की दीवारों पर बनी हो या नई फर्श, पुरानी संरचना की फर्श के ऊपर ही बनाई गई हो.  अदालत ने यह भी कहा कि एएसआई रिपोर्ट को पूरे संदर्भ में पढ़ना जरूरी है.उसकी सभी आपत्तियों को वास्तविक रूप से परखना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उसके निष्कर्ष रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों से समर्थित हैं या नहीं.

10. दसवां सिद्धांत: पुरातात्विक साक्ष्यों का उच्च महत्व
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बताया कि अयोध्या फैसले से निकला दसवां सिद्धांत यह है कि जब कोई मामला किसी स्थल के धार्मिक स्वरूप, ऐतिहासिक उपयोग, पूजा की निरंतरता या अधिकारों के विवाद से जुड़ा हो, तो पुरातात्विक साक्ष्य बेहद अहम भूमिका निभाते हैं. अदालत ने कहा कि

➔धार्मिक प्रतीक (motifs),
➔मूर्तियां और कलाकृतियां,
➔शिलालेख (inscriptions),
➔स्थापत्य (architecture) के हिस्से और पुराने ढांचे के संकेत

यह सब इस बात का प्रमाण हो सकते हैं कि वहां पहले से किसी विशेष धर्म से जुड़ी संरचना मौजूद थी. अदालत के अनुसार, ऐसे साक्ष्यों को उच्च प्रमाणिक मूल्य दिया जाता है. इसके जरिए अदालतें अन्य कानूनी सिद्धांतों को लागू कर पाती हैं,और यह तय करती हैं कि किसके अधिकार अभी भी लागू हैं और किस समुदाय की आस्था और पूजा की परंपरा लगातार बनी रही है. 

अयोध्या मामले से अंतर: हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला अयोध्या विवाद से अलग है. अदालत ने कहा कि इस केस में वह विवादित भूमि के मालिकाना हक (title) का फैसला नहीं कर रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष और अन्य याचिकाकर्ताओं की दलीलें ऐसे पेश की गईं, मानो हिंदू पक्ष पूरे विवादित क्षेत्र पर मालिकाना हक का दावा कर रहा हो. अदालत ने कहा, “अयोध्या मामला एक सिविल सूट था, जिसमें विवादित क्षेत्र के स्वामित्व (title) का सवाल था, लेकिन वर्तमान मामले में हमें ऐतिहासिक दस्तावेज़, स्थापत्य विशेषताएं और एएसआई सर्वे रिपोर्ट के आधार पर विवादित स्थल के स्वरूप (character) का निर्धारण करना है.”अदालत ने यह भी कहा कि इस स्थल के चरित्र का निर्धारण करते समय उसे अयोध्या फैसले में तय 10 सिद्धांतों को ध्यान में रखना होगा.

सरकार की जिम्मेदारी पर भी टिप्पणी इस ऐतिहासिक फैसले में हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह ऐसे धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण (protection and maintenance) सुनिश्चित करे,तीर्थयात्रियों के लिए मूलभूत सुविधाएं प्रदान करे.आवास (shelter) की व्यवस्था करे,कानून‑व्यवस्था बनाए रखे और स्थल की पवित्रता (purity) और मूल स्वरूप (pristine character) को बनाए रखे.

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भो‍जशाला मामले में हाई कोर्ट के निष्कर्ष

अदालत ने पाया कि भोजशाला में हिंदू समुदाय की लगातार और निर्बाध पूजा के प्रमाण मौजूद हैं.कोर्ट ने यह भी माना कि यह स्थल ऐतिहासिक रूप से राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र और मां सरस्वती को समर्पित मंदिर रहा है. इसके साथ ही अदालत ने इस स्थल के संरक्षण और प्रबंधन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की भूमिका और अधिकार को भी बरकरार रखा. अपने फैसले में कोर्ट ने
➔मंदिर में पूजा करने का अधिकार केवल हिंदू पक्ष को दिया
➔ यह भी सुझाव दिया कि मुस्लिम समुदाय को नमाज़ के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाए
➔अदालत ने 2003 के ASI आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज की अनुमति दी गई थी.

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