यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ आज गोरक्षपीठ के महंत रहे अवैद्यनाथ को श्रद्धांजलि गोरखपुर जाएंगे. महंत अवैद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि है. अवैद्यनाथ केवल गोरक्षपीठ के महंत ही नहीं बल्कि योगी आदित्यनाथ के गुरु भी हैं. उन्होंने ही योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. योगी आदित्यनाथ की तरह ही अवैद्यनाथ भी राजनीति में सक्रिय रहे और गोरखपुर से सांसद भी रहे. कॉलेज के दिनों में योगी आदित्यनाथ की उनसे मुलाकात हुई थी.
कब मिले योगी और अवैद्यनाथ?
महंत अवैद्यनाथ रिश्ते में योगी आदित्यनाथ के दादा लगते थे. लेकिन उनकी पहली मुलाकात की वजह पारिवारिक रिश्ता बिल्कुल नहीं थी. दोनों की पहली मुलाकात साल 1992 में हुई थी. ये वही वक्त था, जब राम मंदिर आंदोलन पूरे देश में चरम पर था. उस समय योगी आदित्यनाथ का नाम अजय सिंह बिष्ट हुआ करता था. अजय ऋषिकेश से ग्रेजुएशन कर रहे थे. वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़कर छात्र राजनीति और राष्ट्रवादी आंदोलनों में सक्रिय थे.
राम मंदिर आंदोलन को लेकर ही ऋषिकेश में एबीवीपी की एक सभा हुई. इस सभा में राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे गोरखपुर के तत्कालीन सांसद और गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ भी मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे थे. इसी सभा के दौरान छात्र अजय सिंह बिष्ट पहली बार महंत अवैद्यनाथ के संपर्क में आए. पहली मुलाकात में ही अवैद्यनाथ अजय बिष्ठ से प्रभावित हो गए और उन्हें गोरखपुर आने का न्योता दिया.
जब अजय बिष्ठ ने छोड़ा घर
महंत अवैद्यनाथ ने से पहली मुलाकात के बाद अजय सिंह बिष्ट का झुकाव अध्यात्म और समाज सेवा की तरफ तेजी से बढ़ने लगा. उन्होंने 1993 में महज 21 साल की उम्र में अपना घर छोड़ दिया. उन्होंने गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ पर शोध करने के बहाने अपनी मां से झूठ बोलकर घर छोड़ दिया. गोरखपुर पहुंचने के बाद उन्होंने महंत अवैद्यनाथ की शरण ले ली. अगले ही साल 15 फरवरी 1994 को उन्होंने नाथ संप्रदाय के पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार गुरु अवैद्यनाथ से दीक्षा ग्रहण की. उनके कान छिदवाए गए, उन्हें गेरुआ वस्त्र मिला और इसी दिन 'अजय सिंह बिष्ट' हमेशा के लिए 'योगी आदित्यनाथ' बन गए.
इधर योगी आदित्यनाथ के परिवार को इस पूरे प्रकरण की कोई खबर नहीं थी. जब बेटा महीनों तक घर नहीं लौटा, तो अजय बिष्ट के पिता गोरखपुर पहुंचे. वहां अपने बेटे को सन्यासी के रूप में देखकर वे हैरान रह गए. इसके बाद महंत अवैद्यनाथ ने उनके पिता को समझाया और उन्हें राजी कर लिया. इसके बाद, साल 1998 में मात्र 26 साल की उम्र में योगी आदित्यनाथ अपने गुरु की राजनीतिक विरासत को संभालते हुए देश के सबसे युवा सांसद बने और आज वे देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री हैं.
कौन थे महंत अवैद्यनाथ?
महंत अवैद्यनाथ का जन्म 28 मई 1921 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कांड़ी गांव में हुआ था. कम उम्र में ही माता-पिता का निधन हो गया. इस घटना ने उनके जीवन की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला और उनका झुकाव अध्यात्म की ओर बढ़ता गया, युवावस्था में उन्होंने हिमालय से लेकर कैलाश मानसरोवर, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थस्थलों की यात्राएं कीं. इन्हीं यात्राओं के दौरान उनके भीतर साधना और वैराग्य की भावना मजबूत होती गई.
साल 1940 में बंगाल यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात गोरखनाथ मठ के तत्कालीन पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ से हुई. यह मुलाकात उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई. करीब दो साल बाद, 8 फरवरी 1942 को महज 23 साल की उम्र में दिग्विजयनाथ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उन्हें 'अवैद्यनाथ' नाम दिया. इसके बाद, 1969 में दिग्विजयनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद अवैद्यनाथ गोरक्षपीठ के पूर्ण पीठाधीश्वर बने.
महंत अवैद्यनाथ जिस परंपरा में आए, उसकी वैचारिक नींव उनके गुरु दिग्विजयनाथ से जुड़ी थी. दिग्विजयनाथ ने साधु-संतों को केवल आध्यात्मिक गतिविधियों तक सीमित न रहकर सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया था. अवैद्यनाथ ने इस विरासत को आगे बढ़ाया। उनके लिए धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित विषय नहीं था. वे इसे सामाजिक संगठन और जागरण का माध्यम मानते थे.
जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई. 1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में सामूहिक धर्मांतरण की घटना ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया. इसके बाद उन्होंने हिंदू समाज की एकता और सामाजिक समरसता पर जोर दिया. उनका तर्क था कि जातिगत विभाजन समाज को कमजोर करता है. गोरक्षपीठ की जिम्मेदारी संभालने से पहले ही अवैद्यनाथ सक्रिय राजनीति में उतर चुके थे. हिंदू महासभा के टिकट पर उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा की मानीराम सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. 1962, 1967, 1974 और 1977 में वो विधायक रहे। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर संसद तक पहुंचा. 1970, 1989, 1991 और 1996 में वे गोरखपुर से सांसद चुने गए. बाद में वे भाजपा से जुड़े.
लंबी आध्यात्मिक, सामाजिक और राजनीतिक यात्रा के बाद 12 सितंबर 2014 को गोरखपुर में महंत अवैद्यनाथ का निधन हुआ. नाथ परंपरा के अनुसार उन्हें पद्मासन मुद्रा में समाधि दी गई. उनके निधन के बाद भी उनका नाम गोरक्षपीठ, राम जन्मभूमि आंदोलन और सामाजिक समरसता से जुड़े विमर्श में लगातार लिया जाता रहा.
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