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नौकरियां देकर युवाओं में भरोसा बढ़ाते यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, योग्यता ही है एकमात्र पैमाना

आलोक चंद्रा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 28, 2026 16:45 pm IST
    • Published On सितंबर 28, 2026 16:45 pm IST
    • Last Updated On सितंबर 28, 2026 16:45 pm IST
नौकरियां देकर युवाओं में भरोसा बढ़ाते यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, योग्यता ही है एकमात्र पैमाना

किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा होते हैं. शासन का दायित्व है कि वह उनके सपनों को परिणाम तक पहुंचाए. सबको समान अवसर दे और ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करे कि किसी भी युवा को अपने प्रति अन्याय होता न प्रतीत हो. उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और युवा प्रदेश में यह भरोसा और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाला युवा केवल अपने लिए नहीं पढ़ता, उसके पीछे पूरे परिवार की उम्मीदें खड़ी होती हैं. परीक्षा की तारीख से लेकर परिणाम और फिर नियुक्ति पत्र तक की पूरी यात्रा में उसका धैर्य परखा जाता है. ऐसे में जब चयन प्रक्रिया पूरी होकर नियुक्ति पत्र हाथ में पहुंचता है तो वह कागज का एक टुकड़ा नहीं रह जाता, वह यह संदेश बन जाता है कि मेहनत का परिणाम संभव है और व्यवस्था पर भरोसा किया जा सकता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने भर्तियों में शुचिता और पारदर्शिता सुनिश्चित कर यह भरोसा हासिल किया है. पिछले चार दिन में 5,297 पदों पर पर नियुक्ति का प्रमाणपत्र लेने वाले युवाओं के खिले चेहरे इसके प्रमाण के रूप में देखे जा सकते हैं.

यूपी में सरकारी भर्तियों में विवाद का इतिहास

2017 से पहले के सालों को याद करें तो उत्तर प्रदेश में सरकारी भर्तियां अक्सर विवादों, पेपर लीक और भाई-भतीजावाद के आरोपों से घिरी रहती थीं. योग्य अभ्यर्थी सालों इंतजार करते रह जाते थे, भर्तियां अदालतों में उलझी रहती थीं और परीक्षा परिणाम आने से पहले ही यह चर्चा आम हो जाती थी कि 'किसकी पहुंच कहां तक है'. ऐसे माहौल में एक सामान्य परिवार का बेटा या बेटी, जिसके पास सिफारिश का कोई सहारा नहीं था, अक्सर हिम्मत हार बैठता था. प्रतिभा होते हुए भी वह खुद को दौड़ से बाहर महसूस करता था, क्योंकि नियम किताबों में कुछ और लिखे होते थे और जमीन पर व्यवहार कुछ और होता था.

2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद, उत्तर प्रदेश में भर्ती प्रक्रिया को लेकर एक बड़ी सोच यह सामने आई कि नौकरी पाने का रास्ता सिर्फ योग्यता से होकर गुजरना चाहिए, किसी और माध्यम से नहीं. पिछले नौ सालों में उपलब्ध आंकड़े इस बदलाव के साक्षी हैं. साल 2017 से 2026 के बीच पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक विभागों को मिलाकर करीब 9.5 लाख सरकारी नियुक्तियां हुई हैं. यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह 9.5 लाख परिवारों की दहलीज़ पर पहुंची खुशी का प्रतिबिंब है. युवाओं की जी-तोड़ मेहनत का इनाम है.

यूपी का पुलिस विभाग बना नजीर

सबसे बड़ा उदाहरण पुलिस विभाग का है. नौ सालों में कांस्टेबल, सब-इंस्पेक्टर और होमगार्ड को मिलाकर 2.20 लाख से अधिक पुलिसकर्मियों की भर्ती हुई है. यह वह विभाग है, जहां लंबे समय तक शारीरिक दक्षता परीक्षा से लेकर लिखित परीक्षा तक हर स्तर पर गड़बड़ियों की शिकायतें आती रही थीं. इतनी बड़ी संख्या में भर्तियां तभी संभव हैं जब प्रक्रिया सुव्यवस्थित हो और परीक्षाएं समय पर, बिना विवाद के पूरी हों. शिक्षा के क्षेत्र में भी तस्वीर उत्साहजनक है. प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में कुल मिलाकर डेढ़ लाख से अधिक भर्तियां हुई हैं, इनमें अकेले प्राथमिक शिक्षा में 54,706 नियुक्तियां शामिल हैं. एक शिक्षक की नियुक्ति सिर्फ एक व्यक्ति को नौकरी देना नहीं है, यह गांव-गांव, कस्बे-कस्बे में बच्चों के भविष्य को संवारने वाला निवेश है.

स्वास्थ्य क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 28 हजार से अधिक नियुक्तियां हुई हैं, जो कोविड जैसी वैश्विक महामारी के दौर में राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूती देने में मददगार साबित हुई हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से 48 हजार से अधिक अधिकारियों की भर्ती हुई है, जबकि अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने ग्रुप-सी और अन्य पदों पर 46 हजार से अधिक युवाओं को नौकरी दी है. ये दोनों आयोग, वे संस्थाएं हैं जिनकी साख पर वर्षों से सवाल उठते रहे थे और इनके माध्यम से इतनी बड़ी संख्या में पारदर्शी भर्तियां यह दिखाती हैं कि संस्थागत सुधार सिर्फ कागज़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धरातल पर है. 

नौकरियां देने का रिकॉर्ड बनाती योगी सरकार

यह प्रक्रिया रुकी नहीं है, बल्कि लगातार आगे बढ़ रही है. वर्तमान वर्ष में सरकार ने करीब 1.5 लाख नई सरकारी नौकरियां देने की योजना बनाई है, जिसमें से एक लाख नौकरियां अगले छह महीनों में दी जानी हैं. पुलिस और होमगार्ड विभाग में अकेले 77,000 नई भर्तियां प्रस्तावित हैं. शिक्षा क्षेत्र में भी 15,012 शिक्षक पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसमें सहायक अध्यापक और पीजीटी दोनों स्तर के विज्ञापन जारी किए गए हैं. नागरिक सुरक्षा विभाग में 191 पदों पर भर्ती की तैयारी है, तो राजस्व विभाग में इस साल करीब 20 हजार पदों पर नियुक्तियां प्रस्तावित हैं. सहायक लेखाकार और लेखा परीक्षक की मुख्य परीक्षा का परिणाम 12 अगस्त को घोषित हुआ, जिसमें 1828 पदों पर नियुक्ति होनी है.

आंकड़ों से आगे बढ़कर अगर उन चेहरों की बात करें जिन्हें यह नौकरियां मिलीं, तो तस्वीर और भी भावुक हो जाती है. 19 सितंबर को मुख्यमंत्री ने स्वयं 818 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र सौंपे, जिनमें एक्सरे-टेक्नीशियन के 357 पद और होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक समेत विभिन्न चिकित्सा पदों पर 404 अभ्यर्थी शामिल थे. इसी तरह एडेड माध्यमिक विद्यालयों में प्रधानाचार्य, प्रधान अध्यापक, प्रवक्ता और सहायक अध्यापक के कुल 3567 पदों पर नियुक्तियां की गईं. जब कोई मुख्यमंत्री खुद हाथों-हाथ नियुक्ति पत्र सौंपता है, तो यह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं रह जाती, यह संदेश बन जाता है कि सरकार युवाओं की मेहनत को गंभीरता से लेती है.

पिछले सालों में पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और दूसरे विभागों में हुई बड़ी संख्या में नियुक्तियों को और व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है. आंकड़ों के पीछे लाखों युवाओं की आकांक्षाएं और उतने ही परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हैं. यही कारण है कि सरकारी भर्ती का प्रश्न केवल 'कितने पद भरे गए', का सवाल नहीं है; असली प्रश्न यह है कि इन नियुक्तियों से कितने परिवारों को भविष्य का भरोसा मिला और शासन के प्रति विश्वास कितना मजबूत हुआ. छोटे शहर या गांव से निकलकर बड़े सपने देखने वाले युवाओं के लिए यह नौकरियां सिर्फ आंकड़ा नहीं, भरोसे की बहाली है. यह भरोसा कि अगर वह मेहनत करेगा, समय पर तैयारी करेगा और परीक्षा में बैठेगा, तो उसका परिणाम केवल उसकी काबिलियत के आधार पर तय होगा ना कि किसी सिफारिश के आधार पर. यही भरोसा किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है. युवाओं को जब लगता है कि व्यवस्था निष्पक्ष है, तो वे व्यवस्था पर विश्वास करना सीखते हैं, और यही विश्वास आगे चलकर एक जिम्मेदार और सक्षम समाज की नींव रखता है.

(डिस्क्लेमर: लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं. इन दिनों वो भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) कोलकाता में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, एनडीटीवी का उनसे सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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