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Braj ki Holi: जानें कितनी बदल गई ब्रज की होली?

ब्रज की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं का उत्सव है. देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इसे देखने आते हैं.

Braj ki Holi: जानें कितनी बदल गई ब्रज की होली?

History of Braj ki Holi: होली का नाम आते ही एक उत्साह और उमंग की आस लोगों के मन में जग जाती है. ऐसे में जब बात ब्रज की होली की हो यह उत्साह कई गुना बढ़ जाता है. ब्रज की होली भारत की सबसे प्रसिद्ध और अनोखी होलियों में से एक है. यह उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में विशेष रूप से मनाई जाती है. यह विशेष होली भगवान श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ी है.

ब्रज की होली क्यों खास है? 

ब्रज की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं का उत्सव है. देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इसे देखने आते हैं. इस होली में लठमार होली का विशेष महत्व है. लठमार होली के तहत महिलाएं पुरुषों पर लाठियों से प्रतीकात्मक प्रहार करती हैं, और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं. यहां फूलों की होली भी खेली जाती है. फूलों की होली में यहां रंगों की जगह फूलों से होली खेली जाती है, विशेषकर मंदिरों में.

इसी क्रम में ब्रज की होली का एक अहम भाग है, रंग-गुलाल और रसिया गीत. ब्रज में फाग और रसिया गीत गाए जाते हैं, जिनमें कृष्ण-राधा की लीलाओं का वर्णन होता है. ब्रज की होली की विशेषता है कि यह होली कई दिनों तक चलती है और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है.

ब्रज की होली क्यों और कितनी बदली है?

लेकिन समय के चक्र के साथ ब्रज की होली में कोई बदलाव नहीं हुआ है, ऐसा दावा वहां के पुजारी से लेकर युवा पुजारियों ने किया. उन्होंने कहा कि अपनी परंपरा में हमने कोई भी बदलाव नहीं किया है. आज दुनियाभर से लोग होली मनाने वृंदावन आते हैं. लेकिन आज भी उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक आत्मा आज भी ठीक वैसी ही कायम है. पहले ब्रज क्षेत्र (जैसे मथुरा, वृंदावन, बरसाना) में होली भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ा धार्मिक उत्सव थी.

बता दें कि ब्रज में इको-फ्रेंडली होली की ओर झुकाव देखा जा रहा है. हालांकि एक बड़ा बदलाव यह है कि मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव टीवी, फ़िल्मों और सोशल मीडिया ने ब्रज की होली को वैश्विक पहचान दी है. अब इस त्योहार का व्यावसायीकरण भी देखा जा रहा है.

ब्रज की होली की मूल भावना भक्ति, रास और परंपरा अब भी है लेकिन अब वो वैश्विक छाप छोड़ रहा है. साथ ही अपने प्रेम के मूल्य से विश्व को नई दिशा दे रहा है.

ब्रज की होली को लेकर स्थानीय लोगों का क्या कहना है?

इस विषय पर हमने वृंदावन में कई विद्वानों से भी बात की और ब्रज की होली को समझने का प्रयास किया. राधारानी मंदिर के मुख्य सेवाधिकारी ने हमसे बात करते हुए होली के हुड़दंग पर अपनी चिंता प्रकट की. उनका कहना था कि होली पर नशा करने से बच्चों को बचना चाहिए और प्रेम के त्योहार को प्रेम से मनाना चाहिए.

वहीं हमसे बात करते हुए गोपीचंद गोस्वामी जी ने बताया कि होली में प्रेम और सम्मान ही मानवता का प्रतीक है. इसके अलावा एक अन्य विद्वान ने भी होली में प्राकृतिक रंगों और गुलाल के इस्तेमाल की बात पर जोर दिया.

होली के महत्व को लेकर क्या कहते हैं जानकार?

इस विषय पर लिखते हुए हमने भारतीय संस्कृति और परंपरा के जानकार दीपक दुबे से बात किया. उन्होंने ब्रज की होली पर एक तुलनात्मक अध्ययन हमारे सामने रखा. उन्होंने कहा कि "समाजशास्त्र के अनुसार समाज एक संगठित तंत्र है, जिसमें प्रत्येक परंपरा और उत्सव एक सामाजिक कार्य होता है. इसी क्रम में होली समाज में एकता और सामूहिकता को बढ़ाती है. इस त्योहार में रंग, हंसी मजाक से तनाव कम होता है.

यह सामूहिक अनुष्ठान सामाजिक संतुलन और एकता को मजबूत करने में मदद करता है. होली जैसी त्योहारों के कारण सदियों की परंपरा आज तक बरकरार है. लेकिन यह भी सच है कि समय के साथ हर पर्व त्योहार की तरह ब्रज की होली भी बदली है. वैश्वीकरण, तकनीकी पहुंच और न्यू मीडिया ने हमारे पर्व में नए लक्षण समावेशित किए हैं. लेकिन यह भी एक तथ्य है कि भारतीय त्योहारों का मूल तत्व अभी भी अपने स्वरूप में विद्यमान है और पूरे विश्व को मार्गदर्शित कर रहा है."

अंत में ब्रज की होली में कई परिवर्तन आए हैं. यह समय की मांग भी है. पहले यह मुख्यतः धार्मिक और पारंपरिक स्वरूप का था, जिसमें स्थानीय समुदाय और श्रद्धालु मिलकर मंदिरों और गलियों में उत्सव मनाते थे. आज यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन का आकर्षण बन चुका है. आज ब्रज की होली को  मीडिया और सोशल मीडिया ने इसे वैश्विक पहचान दी है. सबसे बड़ी बात यह है कि ब्रज की होली की मूल भावना भक्ति, प्रेम, सौहार्द और सामूहिक उत्सव अक्षुण्ण बनी हुई है. यह न केवल रंगों का पर्व है, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोककला और धार्मिक परंपराओं का एक जीवंत प्रतीक है.

निशान्त मिश्रा NDTV में पत्रकार हैं.

डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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निशांत मिश्रा
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