टाटा की अंदरूनी लड़ाई एक बार फिर बाहर आ गई है. एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर टाटा संस और टाटा ट्रस्ट आमने-सामने आ गए हैं. टाटा संस का बोर्ड चाहता है कि चंद्रशेखर फिर से चेयरमैन बनें, जबकि टाटा ट्रस्ट इसका विरोध कर रहा है. ऐसे में यह लड़ाई कानूनी दांव-पेच में उलझती दिख रही है.
टाटा में चल रही इस जंग के बीच टाटा ट्रस्ट का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने NDTV को दिए खास इंटरव्यू में कहा कि 66% शेयरहोल्डर्स की 'असहमति' के बाद एक बोर्ड मनमाने फैसले नहीं ले सकता.
वहीं, चंद्रशेखरन के लीगल एडवाइजर और सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने भी NDTV को दिए इंटरव्यू में सारा फोकस बोर्ड मीटिंग पर है, जिस कारण 'असली मुद्दे' से ध्यान हट गया है.
सिंघवी V/s साल्वे: किसके क्या तर्क?
सिंघवी का तर्क: 66% मालिक को दरकिनार नहीं कर सकता बोर्ड
बोर्ड फैसला नहीं ले सकता: सिंघवी ने हॉलीवुड फिल्म 'रनअवे जूरी' का उदाहरण देते हुए कहा, 'आप ऐसा 'रनअवे बोर्ड' नहीं रख सकते, जो 66 फीसदी शेयरहोल्डर के खुले विरोध के बावजूद मनमाने फैसले ले. यदि ऐसे बोर्ड को मेजोरिटी शेयरहोल्डर की आपत्ति नजरअंदाज करने की छूट दी गई, तो यह भारत के कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिए विनाशकारी होगा.'
जमशेदजी टाटा का विजन: सिंघवी ने कहा कि जमशेदजी टाटा ने एक सदी पहले एक अनूठा ढांचा तैयार किया था, जहां टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की 66% हिस्सेदारी है. टाटा संस से आने वाले डिविडेंड. का एक-एक पैसा परोपकारी ट्रस्टों के जरिए अस्पताल, यूनिवर्सिटी और रिसर्च में जाता है. उन्होंने कहा, 'इस गर्भनाल को काटना जमशेदजी टाटा के विजन की जड़ पर प्रहार करने जैसा है. संसद के कानून के अलावा इसे किसी ऐसे तरीके से नहीं तोड़ा जा सकता.'

यह नोएल बनाम चंद्रा नहीं: सिंघवी ने साफ किया कि ये विवाद व्यक्तिगत नहीं है. नोएल टाटा या चंद्रशेखरन कोई व्यक्तिगत शेयरहोल्डर नहीं हैं. यह 'शेयरहोल्डर-ओनर प्राइमेसी' का सैद्धांतिक मुद्दा है. उन्होंने कहा कि चंद्रशेखरन ने खुद दोबारा पद न लेने की बात सार्वजनिक की थी और खुद कहा था कि 'अध्याय समाप्त हो चुका है' लेकिन फिर भी उन्हें 5 साल का विस्तार दे दिया गया.
कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ा विवाद: सिंघवी ने कहा कि यह मामला कुछ समय से चल रहा है. ऐसा लगता है कि अब इसे कानूनी लड़ाई के बिना नहीं सुलझाया जा सकता. मुझे लगता है कि सबसे अच्छा तो यही होगा कि किसी तरह इससे बचा जाए. उन्होंने कहा कि जो भी हो, मुझे उम्मीद है कि यह मामला बहुत लंबा नहीं खिंचेगा.
टाटा संस की लिस्टिंग पर: उन्होंने कहा कि जमशेदजी टाटा ने जो ढांचा बनाया था, उसमें अहम बात यह है कि टाटा संस को जो भी डिविडेंड या पैसा मिलता है- टाटा संस को मिलने वाला हर एक पैसा, जिसे वह डिविडेंड या किसी भी रूप में बांटती है- उसका 66% हिस्सा सिर्फ चैरिटेबल या परोपकारी ट्रस्ट को ही जाना चाहिए, न कि किसी आम शेयरहोल्डर को.
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— NDTV (@ndtv) September 20, 2026
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हरीश साल्वे का तर्क: असली मुद्दे से भटकाया जा रहा ध्यान
जंगल छोड़ पत्तों में उलझ रहे: जब पूछा गया कि 66% शेयरहोल्डर की इच्छा के खिलाफ बोर्ड कैसे जा सकता है? तो साल्वे ने कहा, इसके कई सीधे जवाब हैं, लेकिन यहां दांव पर बड़े मुद्दे लगे हैं. हमें जंगल देखने के बजाय पेड़ों में नहीं उलझना चाहिए. यह कानूनी सलाह हासिल करने का एक अच्छा फोरेंसिक दांव है.
लिस्टिंग करना मजबूरी: साल्वे ने बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से टाटा संस को 'अपर-लेयर NBFC' के रूप में वर्गीकृत किए जाने के बाद कंपनी को अनिवार्य रूप से लिस्टिंग की दिशा में कदम बढ़ाना पड़ा है.

लिस्टिंग से फायदा ही होगा: साल्वे ने दलील दी कि टाटा संस की लिस्टिंग टाटा ग्रुप की कंपनियों को फायदा ही होगा. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि टाटा संस की टाटा स्टील में 4% हिस्सेदारी है, जिसकी वैल्यू करीब 40,000 करोड़ रुपये है. यदि टाटा संस लिस्ट होती है, तो टाटा स्टील अपनी हिस्सेदारी को भुनाकर अपना कर्ज कम कर सकती है. जबकि हिस्सेदारी बनाए रखने पर कंपनी को अपना कर्ज चुकाने के लिए टाटा संस से मिलने वाले डिविडेंड पर निर्भर रहना पड़ेगा.
हमारी इकोनॉमी पर असर पड़ेगा: उन्होंने कहा कि टाटा संस की वैल्यूएशन लगभग 20-25 अरब डॉलर है. टाटा ग्रुप और टाटा संस की कुल वैल्यूएशन 270 अरब डॉलर है. अगर टाटा संस को कुछ होता है, तो हमारी इकॉनमी पर असर पड़ेगा.
RBI पर उठाए सवाल: उन्होंने कहा कि टाटा संस को लिस्ट करने के RBI के निर्देश से कॉर्पोरेट गवर्नेंस और कंपनी के बोर्ड पर रेगुलेटर की निगरानी को लेकर भी सवाल उठते हैं. साल्वे ने कहा, जब रेगुलेटर कहता है कि खुद को लिस्ट करो, तो क्या होता है? A: कॉर्पोरेट गवर्नेंस कमजोर पड़ जाता है. B: बोर्ड में कौन शामिल होगा, इस पर रिजर्व बैंक की निगरानी का अधिकार होता है.
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