- जर्मनी जल्द ही आईएफसी–आईओआर में अपना लायजन अधिकारी तैनात करेगा, जो भारत के साथ समुद्री सहयोग को मजबूत करेगा.
- आईएफसी–आईओआर का उद्देश्य हिंद महासागर में समुद्री गतिविधियों की निगरानी के साथ जानकारी साझा करना है.
- भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग पहले से है, जिसमें पनडुब्बी निर्माण और बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास शामिल हैं.
जर्मनी ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के साथ अपने समुद्री और रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम फैसला लिया है. जर्मनी जल्द ही गुरुग्राम स्थित इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर–इंडियन ओशन रीजन, यानी आईएफसी–आईओआर में अपना एक लायजन अधिकारी तैनात करने जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक जर्मन अधिकारी अगले कुछ महीनों में इस साल जून से पहले, आईएफसी–आईओआर में काम संभाल सकता है.
यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब जर्मन चांसलर फ़्रेडरिक मर्ज दो दिनों के आधिकारिक भारत दौरे पर हैं. पद संभालने के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा है, इसलिए इसे सामरिक और रणनीतिक लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि आईएफसी–आईओआर में जर्मन लायजन अधिकारी की तैनाती भारत और जर्मनी के बीच बढ़ते रक्षा और सुरक्षा सहयोग का प्रतीक है.
भारतीय नौसेना ने 2018 में आईएफसी–आईओआर की स्थापना की थी. इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में होने वाली समुद्री गतिविधियों पर लगातार नजर रखना और अलग-अलग देशों के साथ जानकारी साझा करना है. खास तौर पर यह केंद्र व्हाइट शिपिंग, यानी वाणिज्यिक जहाजों से जुड़ी सूचनाओं को इकट्ठा करता है, उनका विश्लेषण करता है और फिर साझेदार देशों के साथ साझा करता है. इससे समुद्री सुरक्षा, जहाजों की सुरक्षित आवाजाही और गैरकानूनी गतिविधियों पर नियंत्रण में मदद मिलती है.
फिलहाल आईएफसी–आईओआर में 15 देशों के इंटरनेशनल लायजन अधिकारी तैनात हैं. भारतीय नौसेना की योजना है कि आने वाले समय में यहां 40 अंतरराष्ट्रीय लायजन अधिकारियों को जगह दी जाए. इसके लिए जरूरी स्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है. यह केंद्र इस समय 57 समुद्री सुरक्षा एजेंसियों और 25 साझेदार देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है. जर्मनी के जुड़ने से इस नेटवर्क को और मजबूती मिलेगी.
भारत और जर्मनी के बीच सैन्य सहयोग कोई नई बात नहीं है. दोनों देश पिछले कई सालों से रक्षा क्षेत्र में साथ काम कर रहे हैं और अब अपने सामरिक रिश्तों को और गहरा करने के तरीके तलाश रहे हैं. भारतीय नौसेना के पास फिलहाल शिशुमार श्रेणी की चार डीजल–इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं, जिन्हें जर्मनी से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत बनाया गया था. यह सहयोग दोनों देशों के बीच भरोसे की मजबूत नींव को दिखाता है.
इसके अलावा, 2024 में जर्मनी के यूरोफाइटर टाइफून लड़ाकू विमानों ने तमिलनाडु के सुलूर में हुए बहुराष्ट्रीय हवाई अभ्यास ‘तरंग शक्ति 2024' में हिस्सा लिया था. यह भारतीय वायुसेना का पहला बहुराष्ट्रीय हवाई अभ्यास था, जिसमें जर्मनी की भागीदारी को काफी अहम माना गया.
भारत और जर्मनी के बीच साल 2000 से रणनीतिक साझेदारी चली आ रही है, जिसे 2011 से सरकार प्रमुखों के स्तर पर होने वाली वार्ताओं के जरिए और मजबूत किया गया है. हाल ही में भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह से मुलाकात की. इस बैठक में दोनों देशों के बीच रक्षा उपकरणों के सह–उत्पादन पर भी चर्चा हुई.
इसी कड़ी में मुंबई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड और जर्मनी की थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स के बीच भारत में छह आधुनिक पनडुब्बियां बनाने की पी–75 आई परियोजना को लेकर बातचीत चल रही है. करीब 70,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना को लेकर सूत्रों का कहना है कि सौदा अंतिम चरण में है और इसे 31 मार्च 2026 को खत्म होने वाले मौजूदा वित्त वर्ष से पहले साइन किया जा सकता है. इस समझौते के तहत जर्मनी की कंपनी मझगांव डॉकयार्ड के साथ मिलकर भारत में आधुनिक पनडुब्बियां बनाएगी, वो भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ.
कुल मिलाकर, आईएफसी–आईओआर में जर्मन लायजन अधिकारी की तैनाती इस बात का संकेत है कि भारत और जर्मनी के बीच रणनीतिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं. हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के बीच यह साझेदारी दोनों देशों के लिए लंबे समय तक अहम भूमिका निभाने वाली है.
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