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फैजल से खान सर, 'राजा' बनने की ज़िद... पढ़ें- बिहार के कोचिंग किंग की संपूर्ण दास्तां

खान सर उर्फ फैजल खान सेना में जाकर देश के लिए मर-मिटना चाहते थे. NDA की परीक्षा भी दी, लेकिन फिजिकल फिटनेस के एक छोटे से मेडिकल रिजेक्शन ने उनके उस सपने को हमेशा के लिए तोड़ दिया.

फैजल से खान सर... अब 5000 करोड़ के बाजार के लिए खूनी जंग!
पटना:

चमक-दमक... सुर्खियां, लाखों की भीड़ और डिजिटल दुनिया का अंधा सम्मोहन. अक्सर हमारे देखने के नजरिए को धुंधला कर देता है. सोशल मीडिया के इस दौर में हम अक्सर 'मसीहा' और 'मर्यादा' के बीच का फर्क भूल जाते हैं. जब एक शिक्षक के हाथ में कलम की जगह सरेआम कानून को अपने हिसाब से चलाने की ताकत आ जाए, तो सवाल सिर्फ एक कोचिंग संस्थान का नहीं रह जाता, सवाल हमारी पूरी व्यवस्था के इकबाल का बन जाता है. हम बात कर रहे हैं बिहार के खान सर उर्फ फैसज खान की, जिनकी तलाश में पुलिस जुटी हुई है. कहा जा रहा है कि खान सर जल्‍द सरेंडर कर देंगे. 

कानून से बड़े नहीं खान सर 

क्या लोकप्रियता का पैमाना इतना बड़ा हो चुका है कि वो इंसाफ के तराजू को भी झुका दे? आज देश के सामने सबसे बड़ा विरोधाभास यही है. एक तरफ वो छात्र हैं, जो अपने गुरु की तस्वीर को सामने रखकर उसे पूजते हैं, जिनके लिए खान सर की कही हर बात पत्थर की लकीर है. और दूसरी तरफ है हमारा संविधान, हमारा कानून, जो यह साफ कहता है कि चाहे आपकी शोहरत का आसमान कितना भी ऊंचा क्यों न हो, आपकी हैसियत इस देश की अदालतों और पुलिस की तफ्तीश से बड़ी नहीं हो सकती. पटना की सड़कों पर चली वो गोलियां सिर्फ दो कोचिंग माफियाओं की आपसी जंग नहीं थीं, बल्कि वो इस बात का सबूत थीं कि जब विद्या का मंदिर एक आक्रामक और अनियंत्रित व्यापार में तब्दील हो जाता है, तो वहां मर्यादाएं सबसे पहले दम तोड़ती हैं. अगर प्रतिद्वंद्वी ने हमला किया तो वो अपराध है, लेकिन अगर उस अपराध के जवाब में अपनी समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश की गई, तो उसे भी किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता.

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सच्चाई क्या है, साजिश कहां तक बुनी गई और कौन बेकसूर है, इसका फैसला पटना पुलिस की चार्जशीट और अदालत की चौखट पर होगा. लेकिन इस पूरे विवाद ने आज एक बहुत बड़ा सवाल हमारे समाज के सामने छोड़ दिया है. क्या सोशल मीडिया का कोई भी सुल्तान, डिजिटल दुनिया का कोई भी भगवान, इस देश के कानून और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से ऊपर हो सकता है? 

सोशल मीडिया के किंग खान सर

यूट्यूब पर 2 करोड़ 59 लाख यानी करीब 26 मिलियन सब्सक्राइबर्स! व्यूज की गिनती करने बैठेंगे तो कैलकुलेटर थक जाएगा. पौने तीन सौ करोड़ से ज्यादा व्यूज. फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर... हर प्लेटफॉर्म पर खान सर का सिक्का चलता है. और ये शोहरत, ये कामयाबी किसी डांस या एंटरटेनमेंट वीडियो से नहीं आई है, ये आई है 'शिक्षा' के दम पर.
                          

  • यूट्यूब सब्सक्राइबर्स - 25.9M = 2.59 करोड़     
  • फेसबुक - 4.8M = 48 लाख
  • हाईएस्ट व्यूज -  69 M = 6.90 लाख
  • इंस्टाग्राम - 2.9 M = 29 लाख


खान सर चलती-फिरती यूनिवर्सिटी

पटना की सड़कों पर चली गोलियां गवाह हैं कि जब विद्या का मंदिर एक आक्रामक व्यापार बनता है, तो मर्यादाएं दम तोड़ती हैं. सच्चाई क्या है. इसका फैसला अदालत की चौखट पर होगा. छात्रों के खान सर आज विवादों के घेरे में. एक साधारण से परिवार से निकला लड़का कैसे चलती-फिरती यूनिवर्सिटी बना? खान सर में एक अदद सफेद बोर्ड, हाथ में एक मार्कर पेन, गजब का देसी अंदाज और दुनिया के सबसे मुश्किल टॉपिक को सत्तू और लिट्टी चोखा के उदाहरण से समझा देने की कला है. ये सोशल मीडिया का वो सुल्तान है, जिसे दुनिया खान सर के नाम से जानती है. आज डिजिटल दुनिया में खान सर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि अपने आप में एक पूरी की  पूरी यूनिवर्सिटी बन चुके हैं.

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गरीब के बच्चे को राजा बनाने की जिद!

लोग पूछते हैं कि कितना पैसा, कितनी शोहरत? शोहरत का आलम ये है कि जब पटना के एसके मेमोरियल हॉल में रक्षाबंधन का त्योहार मनता है, तो देश का रिकॉर्ड टूट जाता है.15 हजार से ज्यादा छात्राएं अकेले खान सर को राखी बांधने पहुंचती हैं. पैसे और शोहरत की अंधी दौड़ को दरकिनार कर इस शख्स ने जो रास्ता चुना, वो मिसाल है. जहां बड़े-बड़े एड-टेक ब्रांड्स लाखों की फीस वसूल रहे हैं, वहां खान सर ने यूट्यूब पर मुफ्त क्लासेज की बाढ़ ला दी. अपनी वेबसाइट और ऐप पर महज कुछ सौ रुपयों में यूपीएससी और कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की वो तैयारी कराई कि कई बच्चे सरकारी दफ्तरों में अफसर बनकर बैठ गए. ये है खान सर का अचीवमेंट... गरीब के बच्चे को राजा बनाने की जिद!

खान सर, लेकिन... इसी अचीवमेंट, इसी शोहरत और इसी कामयाबी के पीछे छिपी है एक ऐसी कहानी, जिसने आज पूरे पटना को हिलाकर रख दिया है. अचानक ऐसा क्या हुआ कि खान सर के कोचिंग सेंटर के बाहर गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी? क्यों उनके दफ्तर पर पत्थरों की बारिश कर दी गई और क्यों वहां सैकड़ों-हजारों की तादाद में आक्रोशित स्टूडेंट्स का हुजूम उमड़ पड़ा? क्या ये सिर्फ दो कोचिंग सेंटर्स की आपसी रंजिश थी या फिर इसमें खान सर के अपने सुरक्षाकर्मियों ने कानून को हाथ में लेने की बड़ी गलती की थी? आखिर उस रात क्या हुआ था?

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पत्‍थर बरसे, गोलियां चलीं... उस रात क्‍या-क्‍या हुआ?  

तारीख- 2 जून की रात... जगह- कदमकुआं, पटना... खान सर के संस्थान पर 15-20 लोग हमला करते हैं. खान सर के मैनेजमेंट की तरफ से सीधे तौर पर प्रतिद्वंद्वी ज्ञान बिंदु एकेडमी के मालिक रोशन आनंद पर साजिश रचने का आरोप लगाया जाता है. पुलिस CCTV फुटेज खंगालती है और रोशन आनंद समेत तीन लोगों को दबोच लेती है. लेकिन कहानी में असली धमाका तब होता है, जब सोशल मीडिया पर एक और वीडियो सामने आता है. इस वीडियो में खान सर के दो प्राइवेट गार्ड्स, सरकारी राइफल से सरेआम हवा में फायरिंग करते नजर आते हैं. इसी आधार पर पटना पुलिस ने  BNS की धारा 109 और आर्म्स एक्ट के तहत खान सर यानी फैजल खान को इस मामले में मुख्य आरोपी बनाते हुए नामजद FIR दर्ज कर ली.

इस FIR के बाद देश भर में खान सर के समर्थक और विरोधी आमने-सामने आ गए हैं. इस पूरे घटनाक्रम से पहले खान सर ने अपनी क्लास के भीतर बच्चों को संबोधित करते हुए इस पूरे मामले पर अपनी सफाई दी और बताया कि कैसे असली मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है.

कानून अपना काम करेगा, लेकिन खान सर का उदय किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है. पटना के मुसल्लहपुर हाट और कदमकुआं की सड़कों पर आज भले ही खान सर की एक झलक पाने के लिए हजारों छात्र जान छिड़कते हों, लेकिन इस कामयाबी की नींव उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पड़ी थी. दिसंबर 1993 में जन्मे फैजल खान का बचपन किसी मखमली गद्दे पर नहीं, बल्कि कड़े संघर्षों के बीच बीता. पिता सेना में थे, देश की सेवा करते थे, इसलिए अनुशासन खून में था. मां एक  गृहणी थीं और भाई भी देश की सुरक्षा के लिए फौज में तैनात हुए. 



NDA में रिजेक्शन, फिर करोड़ों का साम्राज्य!

फैजल भी सेना में जाकर देश के लिए मर-मिटना चाहते थे. NDA की परीक्षा भी दी, लेकिन फिजिकल फिटनेस के एक छोटे से मेडिकल रिजेक्शन ने उनके उस सपने को हमेशा के लिए तोड़ दिया. शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था. फौज की वर्दी तो नहीं मिली, लेकिन फैजल ने हाथ में कलम उठा ली. शुरुआती दिनों में जब खान सर ने पटना में पढ़ाई शुरू की, तो एक कोचिंग संस्थान के नियमों के चलते उन्होंने अपना असली नाम नहीं बताया. छात्र उन्हें प्यार से अमित सिंह भी बुलाने लगे. जब ये बात सोशल मीडिया पर आई, तो धर्म और नाम को लेकर एक बहुत बड़ा बवंडर खड़ा हो गया. लेकिन खान सर ने हमेशा एक बात कही एक शिक्षक का धर्म सिर्फ शिक्षा देना होता है, उसकी जाति या मजहब नहीं.

सिर्फ 40 छात्रों से एक छोटे से कमरे में कोचिंग की शुरुआत हुई. लेकिन खान सर का अंदाज सबसे जुदा था. वो गंभीर से गंभीर जियोपॉलिटिक्स, स्पेस साइंस या इतिहास को पटना की देसी भाषा, भोजपुरी के तड़के और गजब के ह्यूमर के साथ समझाते. साल 2019 में खान सर ने यूट्यूब की दुनिया में कदम रखा...'Khan GS Research Centre'वजूद में आया और देखते ही देखते, सोशल मीडिया पर एक ऐसी आंधी आई, जिसने बड़े-बड़े एडु-टेक (Edu-tech) दिग्गजों के सिंहासन हिला दिया. 

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जरा दावों का ये गणित समझने की कोशिश कीजिए!

कोचिंग का सिस्टम सिर्फ बच्चों को पास नहीं कराता, बल्कि अर्थ की तार की तरह शिक्षकों से चिपकाए भी रखता है. खान सर वाली जंग की जड़ को समझने के लिए आपको शिक्षा के इस बाजार का एक 'अजूबा गणित' समझना होगा. हाल ही में बिहार पुलिस भर्ती परीक्षा के नतीजे आए. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, कुल भर्तियां थीं-19,838 यानी करीब 20 हजार. लेकिन जैसे ही नतीजे आए, पटना के बड़े-बड़े दिग्गजों में अपना-अपना पोस्टर चमकाने की होड़ मच गई.

  • 'खान ग्लोबल स्टडीज' ने दावा ठोका कि उनकी कोचिंग से 12 हजार बच्चों का सिलेक्शन हुआ. 
  • नंबर-2 पर खड़ी 'ज्ञान बिंदु एकेडमी' ने लिस्ट जारी की कि 10 हजार बच्चे उनके यहां से पास हुए. 
  • 'रहमान MIMT कोचिंग' ने भी 4 हजार बच्चों का दावा कर दिया. 

अब इन तीनों बड़े प्लेयर्स के दावों को जोड़ दीजिए... आंकड़ा बैठता है 26 हजार! नौकरियां थीं 19 हजार 838, और पटना के सिर्फ तीन कोचिंग वालों ने मिलकर पास करवा दिए 26 हजार बच्चे! ये कैसे मुमकिन है? क्या ये बिहार का नया गणित है? नहीं, इसे कहते हैं 'क्रेडिट वॉर'. जब एक ही छात्र पीटी कहीं और से पढ़ता है, मेन्स कहीं और से, और टेस्ट सीरीज कहीं और लगाता है तो हर कोचिंग संस्थान उसकी तस्वीर पर अपना ठप्पा लगा देता है. क्योंकि बाजार में जिसकी लिस्ट जितनी लंबी होगी, अगले सीजन में उसकी दुकान पर उतनी ही ज्यादा भीड़ उमड़ेगी.

असली जंग  बिहार के 15 हजार करोड़ के कोचिंग मार्केट के लिए 

हालांकि, असली खेल ये नहीं, कोचिंग इंडस्ट्री आखिर है कितने की. असली खेल है बिहार के 15 हजार करोड़ रुपए के कोचिंग मार्केट पर एकछत्र राज करने का! बिहार शिक्षा विभाग की रिपोर्ट कहती है कि राज्य में 12 हजार 700 से ज्यादा प्राइवेट कोचिंग हैं, जहां 10 लाख से ज्यादा बच्चे अपनी किस्मत चमकाने आते हैं. और इस समंदर के दो सबसे बड़े शार्क हैं-खान सर और रोशन सर.

बाजार के जानकार सीधे शब्दों में कहते हैं कि यह लड़ाई नंबर-1 और नंबर-2 की है. अगर रोशन सर की 'ज्ञान बिंदु' कोचिंग पर कोई दाग लगता है, उनके पैर उखड़ते हैं, तो इसका सीधा, एकतरफा फायदा खान सर की कोचिंग को मिलेगा और बाजार में उनकी मोनोपॉली यानी एकाधिकार हो जाएगा. यही वजह है कि आज दोनों तरफ से साजिशों के तीर चल रहे हैं. रोशन सर का गुट खान सर पर आरोप लगा रहा है, तो खान सर का खेमा इसे अपनी छवि खराब करने की विरोधी कोचिंग वालों की साजिश बता रहा है. लेकिन चमक-दमक, लाखों फॉलोअर्स और अरबों व्यूज वाली इस चमचमाती दुनिया का एक दूसरा पहलू भी है. सोशल मीडिया पर जितनी तेजी से खान सर की लोकप्रियता का ग्राफ आसमान पर गया, उतनी ही तेजी से वो विवादों के भंवर में भी घिरते चले गए. 

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शान सर से जुड़े विवाद 

घूंघट विवाद 
 

जून 2025 में उनकी शादी और रिसेप्शन की तस्वीरें सामने आईं, तो एक नया 'घूंघट विवाद' खड़ा हो गया.  देश को प्रोग्रेसिव सोच की सीख देने वाले टीचर की पत्नी जब पूरे चेहरे पर लाल घूंघट डाले नजर आईं, तो ट्रोलर्स ने उन्हें आड़े हाथों ले लिया. सवाल उठे कि क्या एक आधुनिक शिक्षक की सोच आज भी घूंघट जैसी पुरानी रीतियों में बंधी है? हालांकि, खान सर ने इस पर सफाई देते हुए कहा किये उनकी पत्नी का बचपन का सपना था और यह उनका व्यक्तिगत फैसला था, जिसे थोपा नहीं गया. 

देसी अंदास पर बवाल

विवाद सिर्फ घूंघट तक सीमित नहीं रहा. खान सर का सबसे बड़ा हथियार यानी उनका 'देसी अंदाज' कई बार उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया. धर्म, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर बोलते हुए उनके बयानों ने कई बार विवाद के धागे खोले. याद कीजिए 2021 में फ्रांस और पाकिस्तान के रिश्तों पर दिया गया उनका वो बयान, जिसके बाद सोशल मीडिया पर #ArrestKhanSir ट्रेंड करने लगा था.

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अगर अब्दुल पायलट होता... 

खान सर का वो चर्चित और विवादित कमेंट जिसमें उन्होंने एक समुदाय विशेष का जिक्र करते हुए कहा था कि अगर अब्दुल पायलट होता तो क्या होता. आलोचकों ने इसे एक खास समुदाय के प्रति रूढ़िवादी और संकीर्ण सोच का उदाहरण माना, तो समर्थकों ने कहा कि इसे केवल एक मजाकिया और अनौपचारिक उदाहरण के तौर पर देखा जाना चाहिए.

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