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Explainer: 'आरक्षण के भीतर आरक्षण' पर क्यों हो रही बहस, इसका क्या है मतलब?

बिहार सरकार का आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 फीसदी किए जाने का फैसला पटना हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया

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Explainer: 'आरक्षण के भीतर आरक्षण' पर क्यों हो रही बहस, इसका क्या है मतलब?
प्रतीकात्मक तस्वीर
नई दिल्ली:

पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के दलितों (SC), पिछड़े वर्गों और आदिवासियों (ST) को सरकारी नौकरियों एवं शिक्षण संस्थानों में दिए जाने वाले आरक्षण को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 फीसदी किए जाने का फैसला रद्द कर दिया है. जातीय सर्वे के बाद बिहार सरकार का आरक्षण की सीमा बढ़ाने का फैसला हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया. इससे एक बार फिर आरक्षण के भीतर आरक्षण (Quota within quota) का मामला बहस का मुद्दा बन गया है. 

पटना हाईकोर्ट का कहना है कि आरक्षण की सीमा तय है, इसे और नहीं बढ़ाया जा सकता. यह संवैधानिक मामला है, इसलिए इस पर आगे सुनवाई होगी. उसके बाद ही कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा.  हाईकोर्ट ने कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह आदेश पारित किया. इन याचिकाओं में नवंबर 2023 में बिहार सरकार की ओर से कराई गई जाति आधारित गणना के बाद आरक्षण में वृद्धि को लेकर लाए गए कानूनों का विरोध किया गया है.

संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 20 का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं का का कहना है कि कोर्ट ने उनकी याचिकाओं पर मार्च में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. आरक्षण में वृद्धि संबंधी सरकार के फैसले से संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 20 का उल्लंघन हुआ है. संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण, अनुच्छेद 15 में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव के निषेध और अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता की गारंटी देने की व्यवस्था है.

पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद बिहार में पहले से तय आरक्षण की सीमा, जो कि अधिकतम 50 प्रतिशत है, लागू रहेगी. जातीय सर्वेक्षण के बाद राज्य में आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 65 फीसदी कर दी गई थी. बिहार में अनुसूचित जाति-जनजाति (SC-ST), अन्य पिछड़ा वर्ग ( OBC) और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (EBC) के लिए आरक्षण की सीमा 50 से बढ़ाकर 65 फीसदी की गई थी. 

संविधान पीठ तय करेगी कि कोटा के भीतर कोटा उचित या अनुचित
हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि आरक्षण की सीमा बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी तो यह संविधान पीठ ही तय करेगी. इससे साफ है कि यह केस अब सुप्रीम कोर्ट में जाएगा.  इंदिरा साहनी केस में तय कर दिया गया था कि किसी भी हालत में तीन श्रेणियों एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं किया जा सकता है.

फिलहाल ओबीसी को 27 प्रतिशत, एससी को 15 प्रतिशत और एसटी को 7.5 प्रतिशत आरक्षण मिला है. आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लोगों को भी 10 प्रतिशत आरक्षण मिला है. इस हिसाब से आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण देने का सरकार का फैसला सही ठहरा चुका है. उसका कहना है कि इससे संविधान के मूल ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचता है.

क्या है आरक्षण के भीतर आरक्षण? 
अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के लिए उप-वर्गीकरण को “कोटा के भीतर कोटा” कहा जाता है. यानी कि यदि एक समुदाय या श्रेणी के लोगों को आरक्षण दिया जा रहा है तो उसी श्रेणी का उप वर्गीकरण करके उनके बीच आरक्षित सीटों का बंटवारा करना. उदाहरण के तौर पर यदि अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षण 15 प्रतिशत तय है तो इस वर्ग में शामिल जातियों और उनके सामाजिक, आर्थिक पिछेड़ेपन के आधार पर अलग-अलग आरक्षण देना.     

बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पिछले साल 21 नवंबर को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए वंचित जातियों के लिए आरक्षण 50 से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की सरकारी अधिसूचना जारी की थी. बिहार सरकार ने जाति आधारित गणना कराई थी जिसके अनुसार राज्य की कुल आबादी में ओबीसी और ईबीसी की हिस्सेदारी 63 प्रतिशत है. अनुसूचित जाति और जनजाति की कुल जनसंख्या 21 प्रतिशत से अधिक है. आबादी में हिस्सेदारी के आधार पर आरक्षण की सीमा बढ़ाई गई है.

कमजोर समुदायों को लाभान्वित करने का तर्क
केंद्र और राज्य सरकारों ने फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि अनुसूचित जाति समुदायों के आरक्षण के भीतर आरक्षण से जरूरतमंद और सबसे कमजोर समूहों को बड़ा लाभ मिल सकेगा. इसके साथ-साथ जो लोग सामाजिक पिछड़ेपन से उबर चुके हैं उन्हें आरक्षण का का अधिक लाभ लेने से रोका जा सकेगा. 

अनुसूचित जाति समुदायों के उप-वर्गीकरण को लेकर केंद्र सरकार का कहना है कि केंद्र सैकड़ों वर्षों से भेदभाव से पीड़ित लोगों को समान स्तर पर लाने के लिए सकारात्मक उपाय के तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की घोषित नीति के लिए प्रतिबद्ध है. आरक्षण के लाभों के श्रेणीबद्ध वितरण के लिए एससी के उप-वर्गीकरण की जरूरत है. उप-वर्गीकरण न होने से आरक्षित श्रेणी के भीतर असमानता कायम रहती है. समानता के लिए आरक्षित सीटों और रोजगारों की सीमित संख्या का तर्कसंगत वितरण अहम है.

सन 2017 में केंद्र सरकार ने जस्टिस रोहिणी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया था. यह आयोग ओबीसी के आरक्षण में उप-वर्गीकरण की संभावना तलाशने के लिए किया गया था. अब तक इस आयोग की रिपोर्ट सामने नहीं आई है.

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