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Explainer: अमेरिका के साथ ट्रेड डील में भारत कृषि और डेयरी उत्पादों को क्यों शामिल नहीं करना चाहता?

भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कृषि और डेयरी को बाहर रखना किसानों, खाद्य सुरक्षा, धार्मिक, सांस्कृतिक और आत्मनिर्भर भारत की रणनीति है. सरकार क्यों बार-बार इसे ‘रेड लाइन’ बता रही है, समझिए पूरा मामला.

Explainer: अमेरिका के साथ ट्रेड डील में भारत कृषि और डेयरी उत्पादों को क्यों शामिल नहीं करना चाहता?
  • भारत में कृषि व्यापार नहीं, 70 करोड़ लोगों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा का आधार है.
  • अमेरिकी सब्सिडी और कॉर्पोरेट फार्म भारतीय किसानों के लिए असमान मुकाबला पैदा करते हैं.
  • डेयरी में भारत का सहकारी मॉडल, अमेरिकी कॉर्पोरेट एवं हार्मोन-आधारित मॉडल से अलग है.

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील में कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से कोई समझौता नहीं किया गया है. किसानों और डेयरी सेक्टर के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं.” यह बयान है भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का. लेकिन सवाल यह है कि सरकार को यह बात बार-बार, इतनी साफ़ और जोर देकर क्यों कहनी पड़ रही है? दरअसल, भारत-अमेरिका ट्रेड डील की चर्चा होते ही देश में एक पुरानी लेकिन बेहद संवेदनशील बहस फिर से जिंदा हो जाती है- क्या भारत वैश्विक व्यापार के दबाव में अपने किसानों और डेयरी सेक्टर को खोल देगा? सरकार का दावा है- ‘नहीं' ,जिसके पीछे देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति मौजूद है, जिन्हें समझना जरूरी है.

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Photo Credit: PIB

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सरकार का पक्ष

बुधवार को देश की संसद में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में भारत-यूएस ट्रेड डील की पूरी जानकारी दी. उन्होंने कहा कि भारत के किसानों और संवेदनशील सेक्टर जैसे कृषि और डेयरी का पूरा ध्यान रखा गया है. गोयल ने साफ कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत में भारत ने अपने जरूरी सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित रखे हैं.

उन्होंने विपक्ष के उन आरोपों का भी जवाब दिया जिनमें कहा जा रहा था कि यह डील किसानों के खिलाफ है. गोयल ने कहा कि कृषि और किसानों का हित हमेशा सरकार की प्राथमिकता रहा है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह ट्रेड डील भविष्य में नए कारोबार और रोजगार के मौके खोल सकती है.

गोयल ने विपक्ष पर संसद में हंगामा करने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि हंगामे की वजह से डील पर सही और विस्तृत चर्चा नहीं हो पाई. उन्होंने कहा कि इस तरह का व्यवधान देश के हित में नहीं है.

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भारत में कृषि संवेदनशील सेक्टर क्यों है?

भारत में कृषि और डेयरी जैसी गतिविधियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं. ये करीब 70 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देती हैं. विकसित देशों के उलट भारत में खेती सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि आजीविका का सवाल है. अगर उन विकसित देशों की कंपनियों को आयात शुल्क में छूट दी जाए जो अपने किसानों को भारी सब्सिडी देती हैं, तो भारत में सस्ते खाद्यान्न और कृषि उत्पादों की बाढ़ आ सकती है. इसका सीधा असर भारतीय किसानों की आमदनी और रोजी-रोटी पर पड़ेगा.

वैश्विक कृषि व्यापार में बड़ी कंपनियों का दबदबा

रिपोर्ट्स के मुताबिक वैश्विक खाद्य व्यापार का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सिर्फ पांच बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में है. ये कंपनियां आक्रामक मूल्य नीति अपनाती हैं. अगर भारत इस सेक्टर में ज्यादा ढील देता है, तो घरेलू किसान इन कंपनियों पर निर्भर हो सकते हैं. इसके राजनीतिक और आर्थिक असर गंभीर हो सकते हैं. यही वजह है कि कृषि भारत सरकार के लिए हमेशा संवेदनशील मसला रहा है.

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विकसित देश क्यों चाहते हैं भारत में ज्यादा बाजार पहुंच

भारत में किसानी ग्रामीण लाइफस्टाइल का अहम हिस्सा है, जबकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ के लिए यह व्यापारिक उद्योग है. 2024 में अमेरिका का कृषि निर्यात 176 अरब डॉलर रहा, जो उसके कुल वस्तु निर्यात का करीब 10 प्रतिशत है. भारी सब्सिडी और मशीनी खेती की वजह से ये देश भारत को अपने निर्यात के लिए बड़ा बाजार मानते हैं.

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कृषि क्षेत्रः अमेरिकी vs भारत 

अगर हम अमेरिकी कृषि उद्योग की तुलना भारतीय कृषि से करें तो साफ पता चलता है कि ये बराबरी की लड़ाई कहीं से भी नहीं है. अमेरिका के पास बड़े-बड़े फार्म हैं, अत्याधुनिक मशीनें, सरकार की तरफ से मिलने वाले भारी-भरकम सब्सिडी हैं और इस सब की वजह से बहुत कम लागत में होने वाला उत्पादन है. अगर इसकी तुलना भारत से करें तो यहां छोटे खेतों और मानसून पर निर्भर खेती, सीमित सरकारी सहायता और बढ़ती लागत जैसी समस्याओं से उतार चढ़ाव वाला होता है इससे लागत बढ़ जाती है.

कृषि, डेयरी सेक्टर खोलने से क्या होगा?

अब अगर ऐसे में भारत अपने बाज़ार को पूरी तरह खोल दे तो अमेरिकी उत्पाद सस्ते बिकेंगे. भारतीय फसलें उनसे महंगी बिकेंगी. मतलब, भारतीय किसानों से फसल कम खरीदे जाएंगे. या तो सरकार को बहुत बड़ी सब्सिडी देनी होगी जो राजकोषीय घाटे में बदलेगी. या फिर किसान की आय गिरेगी, वो किसानी छोड़ेंगे. तो यह केवल व्यापार घाटा नहीं बल्कि खेती में घाटा, कर्ज से लदे किसान, बुनियादी सुविधाओं की कमी और गांव से पलायन जैसे ग्रामीण संकटों को और गहरा करने वाला कदम होगा.

खाद्यान्न उत्पादन में हो रही वृद्धि

वैसे पिछले कुछ वर्षों में इसमें लगातार वृद्धि देखने को मिली है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत का खाद्यान्न उत्पादन कृषि वर्ष 2024-25 में 357.73 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है. यह पिछले वर्ष के उत्पादन की तुलना में 254.3 लाख मीट्रिक टन या लगभग 7.65% अधिक है. यह वृद्धि चावल, गेहूं, मक्का और मोटे अनाज (श्री अन्न) की बेहतर पैदावार के कारण हुई है. 

साथ ही भारत अपने कृषि क्षेत्र को मध्यम से ऊंचे आयात शुल्क के जरिए बचाता है. आयात शुल्क शून्य से 150 प्रतिशत तक जाते हैं. अमेरिका भी कई कृषि उत्पादों पर भारी शुल्क लगाता है, जैसे तंबाकू पर 350 प्रतिशत. इसके अलावा अमेरिका कई कृषि उत्पादों पर नॉन एड वैलोरम टैक्स लगाता है. जो वजन, आकार, या मात्रा पर लगाया जाता है. इससे सस्ते देशों से आने वाला सामान अपने आप महंगा हो जाता है.

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डेयरी के मामले में स्थिति और भी जटिल

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है, लेकिन यह उपलब्धि छोटे किसानों और सहकारी मॉडल (जैसे अमूल), ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर टिकी है.
अमेरिका का डेयरी मॉडल बिल्कुल अलग है. कॉर्पोरेट फार्म, हार्मोन-आधारित उत्पादन, मांस और डेयरी का संयुक्त उद्योग, भारत को लंबे समय से आपत्ति रही है कि अमेरिकी डेयरी में ऐसे तरीकों और चारे का इस्तेमाल होता है जो भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से मेल नहीं खाते.
इसी कारण भारत ने पहले भी कई ट्रेड एग्रीमेंट्स में डेयरी को बाहर रखा है.

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खाद्य सुरक्षा का सवाल

भारत में कृषि सिर्फ किसानों के लिए नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी अहम है. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और बफर स्टॉक- ये सभी व्यवस्थाएं इस सोच पर टिकी हैं कि भारत अपने देशवासियों के अन्न की जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर न हो. अगर कृषि को पूरी तरह वैश्विक बाजार के हवाले कर दिया गया तो एमएसपी तंत्र कमजोर पड़ जाएगा, सरकारी खरीद प्रभावित होगी और सबसे बड़ी और दीर्घकालिक समस्या ये पैदा होगी कि अमेरिका पर निर्भरता से संकट के समय खाद्य उपलब्धता खतरे में पड़ सकती है. लिहाजा, भारत डब्ल्यूटीओ जैसे मंचों पर भी खाद्य सुरक्षा को लेकर सख़्त रुख अपनाता रहा है.

राजनीति भी अहम 

भारत में कृषि सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील विषय है. हाल के किसान आंदोलनों ने यह साफ कर दिया है कि कृषि सुधार आसान नहीं है. ऐसे में विदेशी दबाव में लिया गया कोई भी फैसला भारी पड़ सकता है. तो सरकार यह जोखिम नहीं लेना चाहती कि उस पर यह आरोप लगे कि उसने किसानों के हितों से समझौता किया. इसीलिए पीयूष गोयल और सरकार बार-बार यह संदेश दे रहे हैं कि कृषि और डेयरी सुरक्षित हैं

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आत्मनिर्भर भारत की सोच

सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय उत्पादन है. अगर सस्ते विदेशी कृषि और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में भर गए तो स्थानीय किसान और MSME प्रभावित होंगे. ग्रामीण रोजगार पर असर पड़ेगा. आत्मनिर्भरता का लक्ष्य कमजोर होगा, लिहाजा सरकार इसे लेकर न केवल रक्षात्मक बल्कि रणनीतिक कदम भी उठा रही है.

पीयूष गोयल के बयान के मुताबिक आधिकारिक विवरण जारी हेंगे, लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारत ने कृषि और डेयरी को अपनी रेड लाइन माना है. यही वजह है कि पीयूष गोयल का बयान सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि उस नीति का संकेत है जिसमें वैश्वीकरण और घरेलू संरक्षण- दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की जा रही है. बार-बार सरकार की ओर से इस पर बयान का आना यह स्पष्ट संदेश है कि अर्थव्यवस्था के लिए व्यापार तो बेहद जरूरी है पर वह किसानों और डेयरी सेक्टर की कीमत पर नहीं होगा.

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