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ट्रंप ने कहा- भारत वेनेजुएला से तेल खरीदना शुरू कर सकता है- क्या पड़ेगा तेल आयात और अर्थव्यवस्था पर असर?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है. पर भारत ने करीब एक साल से वेनेजुएला से तेल नहीं लिया है. वेनेजुएला का तेल सस्ता होता है पर क्या ये भारत के लिए फायदेमंद होगा? ट्रंप के इस बयान के बाद क्या रूस से भारत तेल आयात करना बंद कर देगा?

ट्रंप ने कहा- भारत वेनेजुएला से तेल खरीदना शुरू कर सकता है- क्या पड़ेगा तेल आयात और अर्थव्यवस्था पर असर?
  • ट्रंप के बयान से भारत-वेनेजुएला तेल व्यापार फिर शुरू होने के संकेत मिले. इससे भारत का एनर्जी बास्केट बदलेगा.
  • इससे रूस पर निर्भरता कम होगी, रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार आ सकता है और इसका आर्थिक असर देखने को मिल सकता है.
  • फिलहाल यह एनर्जी नहीं, बल्कि अमेरिका-रूस-चीन-भारत के बीच नए जियो-पॉलिटिकल संतुलन का हिस्सा माना जा रहा है.
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीद फिर शुरू करेगा, जिससे रूस से होने वाले कुछ आयात की भरपाई होगी. यह कदम ऐसे समय आया है जब अमेरिका भारत पर रूसी तेल खरीद घटाने का दबाव बना रहा है और वेनेजुएला तेल पर पहले लगाए गए 25% टैरिफ में नरमी के संकेत भी दिए जा रहे हैं. ट्रंप ने यह भी कहा कि चीन को भी वेनेजुएला तेल पर डील करने के लिए स्वागत है. यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक ऊर्जा संतुलन का बड़ा मोड़ है- जिसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आयात बिल, रिफाइनिंग मार्जिन, मुद्रास्फीति और अमेरिका-रूस संबंधों के बीच संतुलन पर पड़ेगा.

यह क्यों अहम है?

अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने एयर फोर्स वन में प्रेस से कहा कि 'हमने पहले ही उस डील का कॉन्सेप्ट बना लिया है', यानी भारत वेनेजुएला से क्रूड खरीद फिर शुरू करेगा ताकि रूस से आयात का कुछ हिस्सा बदला जा सके. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद कम करने का दबाव बढ़ाया है और इससे पहले वेनेजुएला तेल खरीदने वाले देशों पर 25% टैरिफ भी लगाया गया था. रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत ने पिछले साल वेनेजुएला से खरीद रोक दी थी, लेकिन अब अमेरिका संकेत दे रहा है कि भारत को फिर से खरीद की अनुमति मिल सकती है ताकि वह पूरी दुनिया के लिए रूसी तेल का विकल्प बने और भारत पर आया ट्रंप का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि यह तेल का एक बड़ा आयातक देश है. 

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खबर में दो और महत्वपूर्ण तथ्य हैं. भारत ने 2019 में ईरान से तेल खरीद अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण बंद कर दी थी, और उसके बाद भारतीय रिफाइनरों ने अमेरिकी तेल की ओर रुख किया, फिर यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से डिस्काउंटेड समुद्री तेल का बड़ा खरीदार बना. ट्रंप ने यह भी कहा कि चीन को वेनेजुएला तेल पर डील करने के लिए स्वागत है- यानी अमेरिका वेनेजुएला को वैश्विक बाजार में फिर सक्रिय देखना चाहता है. यह सब मिलकर बताता है कि मामला केवल भारत-वेनेजुएला व्यापार नहीं, बल्कि अमेरिका-रूस-चीन-भारत के बीच चल रहे ऊर्जा-भू-राजनीतिक खेल का हिस्सा है.

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भारत कितना तेल आयात करता है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है.  2022 के बाद से भारत ने रूस से तेल खरीद तेज की क्योंकि पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूसी क्रूड भारी डिस्काउंट पर उपलब्ध था. नतीजा यह हुआ कि कुछ महीनों में रूस भारत का सबसे बड़ा सप्लायर बन गया.

दरअसल, वेनेजुएला के तेल कारोबार पर सख्त अमेरिकी प्रतिबंध लगने से पहले तक भारत वेनेजुएला के कच्चे तेल का बड़ा आयातक था. भारत तब वेनेजुएला से हर रोज चार लाख बैरल तक कच्चे तेल का आयात करता था. भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने की तकनीकी और क्षमता मौजूद है.

हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर बढ़ते टैरिफ के मद्देनजर भारत ने साल 2020 में वेनेजुएला से तेल आयात कम करना शुरू कर दिया था और 2024 के दौरान वहां से अपने आयात का केवल 1% - 1.5% तक क्रूड ही लिया था. 2025 में जब ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बने और उन्होंने वेनेजुएला से तेल खरीदने पर अमेरिकी आयात पर 25% टैरिफ की घोषणा की तो भारत ने वेनेजुएला से तेल खरीदना लगभग शून्य कर दिया. 

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25% टैरिफ और अमेरिकी दबाव

खबर के मुताबिक, ट्रंप ने पिछले साल मार्च में वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाया था. तब जानकारों ने उसे एक असामान्य कदम बताया था. इसके पीछे सीधे-सीधे तेल व्यापार के जरिए जियो-पॉलिटिकल दबाव बनाना था. भारत ने इसके बाद वेनेजुएला से खरीद लगभग पूरी तरह रोक दी थी. 

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत ने पिछले साल नवंबर 2025 तक कुल तेल इंपोर्ट का 0.3 फीसद हिस्सा ही वेनेजुएला से इंपोर्ट किया था. अब ट्रंप के ताज़ा बयान से संकेत मिलता है कि यह चैनल फिर खुल सकता है- ताकि रूस पर निर्भरता कम हो और वेनेजुएला की सप्लाई को बाजार मिले.

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ट्रंप की दोहरी चाल, भारत का दोहरा फायदा

यहां समझने की बात यह है कि अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध नहीं लगाए, बल्कि टैरिफ का व्यापारिक हथियार इस्तेमाल किया- ताकि भारत अपने आयात का स्रोत बदले. इस रणनीति का दोहरा लक्ष्य भी है- इससे रूस की तेल से होने वाली कमाई को सीमित करना जहां एक लक्ष्य है, वहीं दूसरा वेनेजुएला की वैश्विक तेल बाजार में वापसी जिससे अमेरिकी कंपनियों को बड़ा मुनाफा हो सके.

वहीं एक्सपर्ट कहते हैं कि इसका भारत को भी दोहरा फायदा मिल सकता है- पहला, भारत के पास वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने का इंफ्रास्ट्रक्चर है. लिहाजा भारत को इसका दीर्घकालिक फायदा मिल सकता है. दूसरा, चूंकि अब ट्रंप प्रशासन ये संकेत दे रहा है कि यदि भारत रूसी तेल खरीद घटाता है, तो उस पर लगे अतिरिक्त 25% टैरिफ हटाए जा सकते हैं. तो भारत को इसका फायदा भी होगा.

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वेनेजुएला वापस आ रहा है तो रूस का क्या होगा?

वैसे वेनेजुएला फिलहाल बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में सक्षम नहीं है.  लेकिन अमेरिकी कंपनियों के कमान संभालने की स्थिति में उत्पादन बड़े पैमाने पर करना उसके लिए आसान होगा. इसके बाद भी चूंकि भारत से वेनेजुएला की दूरी रूस और मध्य-पूर्व की तुलना में अधिक है तो लॉजिस्टिक्स का खर्च बढ़ेगा.

अब भू-राजनीतिक कारणों से भारत भले ही वेनेजुएला से तेल खरीदना शुरू कर दे पर वो रूस से तेल की खरीद बंद नहीं करेगा. खासकर तब जब डिस्काउंट बना रहता है. इसलिए वनेजुएला की वापसी का मतलब ये नहीं है कि भारत जितना तेल रूस से खरीदता है वो अब वेनेजुएला से खरीदने लगेगा.

ट्रंप ने प्रेस से जो बात की उसमें उन्होंने यह भी कहा कि 2019 में भारत ने प्रतिबंधों के कारण ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था और अमेरिका से तेल खरीदने लगा था. हालांकि तब यह भी कारण था कि ईरान में अमेरिकी प्रतिबंध, वेनेजुएला में राजनीतिक संकट, लीबिया और इराक में अस्थिरता की वजह से भारत को अपने प्रतिदिन की मांग की पूर्ति के लिए अमेरिका का रुख करना पड़ा था. पर भारत ने अपना एनर्जी बास्केट पूरी तरह से बदला नहीं, बल्कि उसमें संतुलन बनाए रखा है. यही अब भी होगा. भारत रूस से तेल आयात बंद नहीं करेगा पर एनर्जी बास्केट में फिर संतुलन लाएगा. भारत हमेशा अपनी लागत, सुरक्षा प्राथमिकताओं और ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लेगा.

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मान लीजिए भारत रूस से आयात में 10–15% की कटौती करता है और उसका एक हिस्सा वेनेजुएला से भरता है, तो यह कूटनीतिक नजरिए से अमेरिका के लिए अहम होगा. भारत अपने ऑयल इम्पोर्ट बास्केट में उस देश को जोड़ेगा जो कि उसका पूर्व बड़ा सहयोगी भी रहा है. 

यहां एक बात और भी अहम है कि अमेरिका ने वेनेजुएला से तेल खरीदने का विकल्प दिया है, जबकि तब ईरान पर प्रतिबंध लगाए गए थे. एक्सपर्ट्स के नजरिए में यह जियोपॉलिटिकल वजहों से अमेरिका का अपनी रणनीति में शिफ्ट भी है.

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वेनेजुएला से तेल खरीदना भारत के लिए कितना फायदेमंद?

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है. वेनेजुएला का तेल भंडार करीब 300 अरब बैरल का है, लेकिन वर्षों की राजनीतिक-आर्थिक अस्थिरता और प्रतिबंधों के कारण उसका उत्पादन ढांचा कमजोर रहा है. अमेरिका अब वेनेजुएला पर कुछ प्रतिबंध ढीले कर रहा है ताकि उत्पादन और निर्यात बढ़े- और बाजार में रूसी बैरल की जगह ले सके.

वेनेजुएला से तेल खरीदना तीन कारणों से भारत के लिए लाभकारी है-

1. भारी क्रूड पर छूट: वेनेजुएला का तेल आमतौर पर भारी होता है, जिस पर वो डिस्काउंट देता आया है.
2. रिफाइनिंग फिट: भारत में कई रिफाइनरियां (जैसे रिलायंस, IOC के कुछ कॉम्प्लेक्स) भारी क्रूड को प्रोसेस करने में कुशल हैं.
3. रणनीतिक फायदाः रूस, मध्य-पूर्व और अमेरिका के अलावा एक बड़ा तेल सोर्स का जुड़ना भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाता है.

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इसके अलावा यह बता दें कि भारत का तेल आयात बिल सालाना सैकड़ों अरब डॉलर का होता है. यदि वेनेजुएला से डिस्काउंटेड भारी क्रूड मिलता है और रिफाइनर उसे कुशलता से प्रोसेस कर लेते हैं, तो औसत खरीद लागत थोड़ी घट सकती है. लेकिन वेनेजुएला का हिस्सा शुरू में सीमित होगा, इसलिए कुल आयात बिल पर तुरंत इसका बड़ा असर नहीं दिखेगा- इसमें धीरे-धीरे सुधार आएगा.

कच्चे तेल की लागत में कमी का असर पेट्रोल-डीजल खुदरा कीमतों पर सीधे और तुरंत नहीं पड़ता, क्योंकि भारत में टैक्स संरचना और सरकारी नीति बड़ी भूमिका निभाती है. फिर भी, यदि रिफाइनिंग मार्जिन सुधरते हैं और अंतरराष्ट्रीय कीमतें स्थिर रहती हैं, तो मुद्रास्फीति दबाव को सीमित रखने में मदद मिल सकती है- खासकर ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स लागत के जरिए.

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अर्थव्यवस्था पर असर?

कुल मिलाकर भारत के लिए यह कदम ऊर्जा सुरक्षा, लागत और कूटनीतिक संतुलन के नजरिए से जहां अहम, वहीं तुरंत आर्थिक लाभ की उम्मीद नहीं होगी. इसे फिलहाल जियो-पॉलिटिक्स में संतुलन साधने की कवायद के तौर पर देखा जा सकता है जिसके दीर्घकालिक फायदे होंगे.

इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर असर क्या पड़ेगा इसे एसबीआई की इकोरैप रिपोर्ट 'तेल में उबाल: तेल की अर्थव्यवस्था को समझने का वक्त' में अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष ने जाहिए किए गए अनुमान से समझिए. उन्होंने उस रिपोर्ट में बताया था कि तेल की कीमतें अगर 10 डॉलर प्रति बैरल घटती या बढ़ती हैं तो भारत के आयात बिल में करीब आठ अरब डॉलर की कमी या वृद्धि हो जाती है.

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