भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने रिटायरमेंट से ठीक पहले NDTV के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर आदित्य राज कौल से 'ऑपरेशन सिंदूर', पाकिस्तान से आतंकी खतरे, चीन और LAC, ढाई मोर्चे पर युद्ध के खतरे, ड्रोन-वॉरफेयर, आर्टिकल 370 के बाद जम्मू-कश्मीर और पहलगाम आतंकी हमले, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में बगावत और अग्निपथ स्कीम पर बात की. 'ऑपरेशन सिंदूर' और पाकिस्तान पर सेना प्रमुख के साथ यह पहली विस्तृत बातचीत है.
सवाल: ऑपरेशन सिंदूर को कारगिल युद्ध के बाद भारत की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई माना जा रहा है और यह आपके कार्यकाल में हुआ. रिटायरमेंट से पहले आप इस अभियान के रणनीतिक परिणामों का किस प्रकार मूल्यांकन करते हैं? साथ ही आधुनिक युद्ध, प्रिसिजन स्ट्राइक और परमाणु शक्ति-संपन्न पड़ोस में एस्केलेशन मैनेजमेंट के संदर्भ में इससे भारतीय सेना को कौन-से स्थायी सबक मिले?
जवाब: ऑपरेशन सिंदूर को भारत के संकल्प, क्षमता और संयम के स्पष्ट प्रदर्शन के रूप में देखा जाना चाहिए. यह आतंकवाद के विरुद्ध भारत की एक संतुलित, सटीक और उद्देश्यपूर्ण सैन्य प्रतिक्रिया थी. इसका संदेश पूरी तरह स्पष्ट था- आतंकवाद की किसी भी घटना का निर्णायक उत्तर दिया जाएगा और आतंकवादियों तथा उन्हें संरक्षण, समर्थन या प्रोत्साहन देने वालों के बीच कोई भेद नहीं किया जाएगा.
रणनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि भारत ने आतंकवाद के प्रति अपनी प्रतिक्रिया का एक नया मानक स्थापित किया. इस अभियान ने सिद्ध किया कि राष्ट्रीय इच्छाशक्ति, विश्वसनीय खुफिया जानकारी, सटीक लक्ष्य-भेदन, संयुक्त सैन्य योजना और नियंत्रित तनाव प्रबंधन के माध्यम से बिना किसी अनियंत्रित संघर्ष की सीमा पार किए निर्णायक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं. इसने यह भी स्पष्ट कर दिया कि परमाणु हथियारों की धमकी का उपयोग आतंकवाद के लिए ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता.
सैन्य दृष्टिकोण से ऑपरेशन सिंदूर ने मल्टी-डोमेन कॉर्डिनेशन के महत्व को फिर स्थापित किया. जमीनी खुफिया जानकारी, निगरानी, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, वायु शक्ति, सूचना प्रबंधन और रणनीतिक संदेश, इन सभी ने एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य किया. यह केवल एक सैन्य हमला नहीं था, बल्कि एक समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया थी, जिसमें सटीकता, गति, सूचना अनुशासन और तनाव नियंत्रण सभी समान रूप से महत्वपूर्ण थे.
दुनिया भर में चल रहे संघर्षों से यह स्थायी सबक सामने आया है कि भविष्य के युद्ध लंबे और निरंतर चल सकते हैं. वहीं ऑपरेशन सिंदूर ने यह भी दिखाया कि संघर्ष छोटे, अत्यधिक तीव्र, तकनीकी-आधारित और लगातार सूचना निगरानी के बीच भी लड़े जा सकते हैं.
एक अन्य महत्वपूर्ण सीख यह है कि सटीक प्रहारों के लिए केवल हथियार पर्याप्त नहीं होते. उनके पीछे विश्वसनीय खुफिया तंत्र, मजबूत संचार नेटवर्क, इंटीग्रेट कमांड सेंटर और राजनीतिक तथा सैन्य नेतृत्व के बीच स्पष्ट समन्वय होना आवश्यक है. इसी प्रकार तनाव प्रबंधन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. भारत ने दृढ़ता से कार्रवाई करने, स्पष्ट संदेश देने, संघर्ष की तीव्रता पर नियंत्रण बनाए रखने और विरोधी को दुष्प्रचार फैलाने का अवसर न देने की अपनी क्षमता का सफल प्रदर्शन किया.
सवाल: ऑपरेशन सिंदूर को भारत का अब तक का पहला वास्तविक अर्थों में संयुक्त सैन्य अभियान कहा गया. सेना, वायुसेना और नौसेना ने एकीकृत बल के रूप में कितनी प्रभावी भूमिका निभाई? साथ ही, चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग को देखते हुए, क्या आपको विश्वास है कि भारत की इंटीग्रेट कमांड, जो अभी विकास के चरण में हैं, एक साथ दो मोर्चों पर पैदा होने वाली चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं?
जवाब: ऑपरेशन सिंदूर ने संयुक्त सैन्य संचालन के महत्व को अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया. यह ऐसा अभियान नहीं था जिसमें किसी एक सेना ने अकेले कार्य किया हो. जमीनी खुफिया जानकारी, निगरानी, साइबर एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सहायता, वायु शक्ति, सूचना प्रबंधन और रणनीतिक संदेश इन सभी ने एक-दूसरे की क्षमता को सशक्त बनाया. तीनों सेनाओं ने एक समान उद्देश्य, साझा परिचालन समझ और स्पष्ट राजनीतिक-सैन्य दिशा के साथ कार्य किया. यही एकजुट प्रयास इस अभियान की सफलता का आधार बना.
यह कॉर्डिनेशन किसी संकट की शुरुआत होने के बाद विकसित नहीं की जा सकती. यह वर्षों की योजना, संयुक्त अभ्यास, सैन्य सिद्धांतों के विकास, विभिन्न सेनाओं के बीच आपसी समझ और परिचालन समन्वय का परिणाम होती है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारी प्रतिक्रिया इसी दीर्घकालिक तैयारी का प्रमाण थी. इसने दिखाया कि जब सेंसर, हथियार प्रणाली, कमांडर और संचार नेटवर्क एकीकृत रूप से कार्य करते हैं, तब सशस्त्र बल निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं, सटीक शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं और संघर्ष की तीव्रता को आत्मविश्वास के साथ नियंत्रित कर सकते हैं.
जहां तक एक साथ दो मोर्चों की चुनौती का सवाल है, मैं इसे 'ढाई मोर्चों की चुनौती' कहना पसंद करूंगा. हमें उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर एक साथ पैदा होने वाले खतरों का सामना करने के लिए सदैव तैयार रहना होगा. साथ ही, आंतरिक सुरक्षा, प्रॉक्सी युद्ध और ग्रे-जोन गतिविधियों जैसी चुनौतियों से निपटने की क्षमता भी बनाए रखनी होगी. यह वास्तविकता भली-भांति समझी जा चुकी है और भारतीय सेना बिना किसी प्रकार के ध्यान भटकाव के ऐसी सभी परिस्थितियों का सामना करने के लिए बिल्कुल तैयार है.
थिएटराइजेशन इसी व्यापक परिवर्तन यात्रा का हिस्सा है. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद की स्थापना के बाद संयुक्त योजना, कमांड और कंट्रोल, जिम्मेदारियों के निर्धारण, रसद, संचार, सैन्य सिद्धांत, प्रशिक्षण और मानव संसाधन नीतियों के क्षेत्र में पर्याप्त आधारभूत कार्य किया गया है.
सवाल: पहलगाम नरसंहार और ऑपरेशन सिंदूर के एक साल से ज्यादा समय बाद भी ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान की सामरिक दिशा पर उसकी सेना की पकड़ पहले की तरह मजबूत बनी हुई है. क्या आपको लगता है कि रावलपिंडी का तथाकथित 'डीप स्टेट' संरचनात्मक रूप से भारत के साथ शांति का विकल्प चुनने में असमर्थ है? इसका जम्मू-कश्मीर की दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
जवाब: एक सैन्य कमांडर के रूप में हम किसी भी खतरे का आकलन जमीनी वास्तविकताओं जैसे इरादे, क्षमता, बुनियादी ढांचे और गतिविधियों के आधार पर करते हैं. यह सच है कि घुसपैठ के प्रयासों में कमी आई है, लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि यह प्रवृत्ति स्थायी रहेगी.
ऑपरेशन सिंदूर ने सीमा पार बैठे आतंकवादियों और उनके समर्थकों को दंडित किया है, लेकिन इतिहास बताता है कि भविष्य में फिर से दुस्साहसिक प्रयास किए जा सकते हैं. यही कारण है कि हमारी रणनीति में ऑपरेशन सिंदूर समाप्त नहीं हुआ है. यह आज भी हमारी सैन्य मुद्रा, तैयारी और दृढ़ संकल्प के रूप में जारी है. शांति भंग करने या आतंकवाद को प्रायोजित करने का कोई भी प्रयास दृढ़, संतुलित और निर्णायक प्रतिक्रिया को आमंत्रित करेगा.
जम्मू-कश्मीर में हमारी दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति सतर्कता, खुफिया-आधारित अभियानों तथा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs), केंद्रीय एजेंसियों, पुलिस और नागरिक प्रशासन के साथ घनिष्ठ समन्वय पर आधारित है. स्थानीय युवाओं की आतंकवादी संगठनों में भर्ती में भारी कमी आई है और सामान्य जनजीवन अधिक मजबूत हुआ है. सार्वजनिक कार्यक्रमों, पर्यटन, तीर्थयात्राओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सफल आयोजन जनता के विश्वास और सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है.
इसके बावजूद हम खतरे को लेकर पूरी तरह सतर्क हैं. घुसपैठ, कट्टरपंथीकरण, नार्को-आतंकवाद, दुष्प्रचार तथा आतंकवादी संगठनों द्वारा आधुनिक तकनीक के उपयोग जैसे प्रयासों पर लगातार निगरानी रखी जाएगी और उनका प्रभावी मुकाबला किया जाएगा. भारतीय सेना का दृष्टिकोण आगे भी जनता-केंद्रित, खुफिया-आधारित और परिचालन स्तर पर दृढ़ रहेगा.
सवाल: ऑपरेशन सिंदूर भारत के रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की एक बड़ी परीक्षा भी था. स्वदेशी प्रणालियों और क्षमताओं का प्रदर्शन कैसा रहा? अभी किन क्षेत्रों में क्षमता की कमी है और रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करना कितना आवश्यक है?
जवाब: ऑपरेशन सिंदूर ने सबसे व्यावहारिक रूप में आत्मनिर्भरता के महत्व को सिद्ध किया. किसी भी संकट की स्थिति में राष्ट्र को अपनी प्रणालियों, अपने औद्योगिक आधार और लंबे समय तक सैन्य अभियान चलाने की अपनी क्षमता पर भरोसा होना चाहिए.
इस अभियान के दौरान स्वदेशी प्रणालियों का प्रदर्शन शानदार रहा. इससे स्पष्ट हुआ कि स्वदेशी क्षमताएं अब केवल सहायक भूमिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निगरानी, संचार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सटीक प्रहार, सूचना प्रबंधन और परिचालन निर्णय लेने की प्रक्रिया का केंद्रीय हिस्सा बन चुकी हैं. हालांकि, हमें यथार्थवादी भी बने रहना होगा.
आधुनिक युद्ध अत्यंत तेजी से बदल रहा है और लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता, एडवांस गोला-बारूद, ड्रोन एवं एंटी-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सुरक्षित संचार, AI आधारित निर्णय प्रणाली, स्वायत्त प्लेटफॉर्म और युद्धक्षेत्र की पारदर्शिता जैसे क्षेत्रों में नई चुनौतियां लगातार सामने आती रहेंगी. ये आवश्यकताएं स्थिर नहीं हैं. विरोधी लगातार अपनी रणनीतियां बदलता है, तकनीक विकसित होती रहती है और इसलिए भारतीय सेना को हमेशा एक कदम आगे रहना होगा. प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए JAI (Jointness, Atmanirbharta and Innovation) के मंत्र को बहु-क्षेत्रीय युद्ध क्षमता में परिवर्तित किया जा रहा है.
सवाल: ऑपरेशन सिंदूर, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने भविष्य के युद्ध की समझ को पूरी तरह बदल दिया है, चाहे वह ड्रोन स्वॉर्म्स, लोइटरिंग म्यूनिशन, एआई आधारित लक्ष्य-भेदन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध या एंटी-ड्रोन ग्रिड हों. भारतीय सेना इन अनुभवों को किस प्रकार संस्थागत रूप दे रही है? क्या हमारी डॉक्ट्रिन तकनीकी विकास की गति के साथ पर्याप्त तेजी से विकसित हो रही है?
जवाब: हाल के संघर्षों ने स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन, सटीक मारक क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर प्रभाव, अंतरिक्ष आधारित सहायता और सूचना युद्ध अब अलग-अलग क्षमताएं नहीं रह गई हैं. ये सभी अब इंटीग्रेटेट युद्धक्षेत्र का हिस्सा हैं. ऑपरेशन सिंदूर ने भी यह सिद्ध किया कि भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम खुफिया जानकारी, सेंसर, हथियार प्रणालियों, नेटवर्क और कमांडरों को कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से इंटीग्रेट कर पाते हैं.
भारतीय सेना के लिए संदेश स्पष्ट है: तकनीकी केवल उच्च मुख्यालयों तक सीमित नहीं रह सकती. इसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैन्य संरचनाओं, यूनिट्स और प्रत्येक सैनिक तक पहुंचना होगा. इसी उद्देश्य से रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अशनि ड्रोन प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरियों जैसी नई यूनिट विकसित की जा रही हैं. इनका उद्देश्य सेना की गतिशीलता, निगरानी क्षमता, सटीक प्रहार, परिचालन पहुंच और तकनीक आधारित युद्धक्षेत्र जागरूकता को बढ़ाना है.
हम ट्रेनिंग, वॉरगेमिंग, क्षमता विकास और सैन्य सिद्धांतों के निरंतर परिष्कार के माध्यम से इन अनुभवों को संस्थागत रूप भी दे रहे हैं. बहु-क्षेत्रीय युद्ध संचालन, एंटी-ड्रोन प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर-इलेक्ट्रोमैग्नेटिक गतिविधियां, सूचना युद्ध और डेटा-केंद्रित कमान प्रणाली को हमारी सैन्य सोच का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा है.
हमारा लक्ष्य अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने के बजाय सभी क्षेत्रों स्थल, वायु, साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रो-मैगनेटिक स्पेक्ट्रम और कॉग्निटिव क्षेत्र को इंटीग्रेटेट रूप से संचालित करना है. सैन्य सिद्धांत हमेशा गतिशील होने चाहिए. अगर सिद्धांत धीरे विकसित होंगे तो तकनीक उनसे आगे निकल जाएगी, और अगर नई तकनीक बिना उपयुक्त सिद्धांत के अपनाई जाएगी तो उसका पूरा लाभ युद्धक्षेत्र में नहीं मिल पाएगा.
इसीलिए हम अपने सिद्धांतों को फील्ड ट्रायल, वास्तविक परिचालन अनुभव, उभरते खतरों और स्वदेशी तकनीकी विकास के साथ लगातार जोड़ रहे हैं. हमारा उद्देश्य केवल नई तकनीक खरीदना नहीं है, बल्कि उसे युद्धनीति, प्रशिक्षण, सैन्य संरचना और कमान प्रणाली का अभिन्न अंग बनाना है. साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि तकनीक चाहे जितनी एडवांस हो जाए, जमीन पर मौजूद सैनिकों का कोई विकल्प नहीं है.
हमारा दृष्टिकोण सरल है, 'जमीन पर स्मार्ट बूट्स, भुजा पर बाज (Eagle on the Arm), नेटवर्क पर सुनने वाले कान (Ears on the Net), आसमान में निगाहें (Eyes in the Sky) और क्लाउड में सोचने वाला मस्तिष्क (Mind in the Cloud).'
सवाल: आपने हाल ही में लद्दाख में सेना की परिचालन तैयारियों की समीक्षा की. कुछ विवादित क्षेत्रों में भारत और चीन के बीच डिसएंगेजमेंट की घोषणा की जा चुकी है, फिर भी दोनों पक्षों की सैन्य तैनाती पहले की तरह उच्च स्तर पर बनी हुई है. क्या आपको लगता है कि स्थिति वास्तव में स्थिर हो गई है, या हम केवल एक ऐसे रणनीतिक विराम में हैं जिसे चीन अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी भंग कर सकता है?
जवाब: उत्तरी सीमाओं पर स्थिति वर्तमान में स्थिर है, लेकिन संवेदनशील भी है. डिसएंगेजमेंट संबंधी समझौतों से जमीनी स्तर पर स्थिरता बढ़ी है और दोनों पक्ष अब एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी दिखाई दे रहे हैं. पिछले एक साल के दौरान कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हुई नई वार्ताओं ने तनाव कम करने, सीमा प्रबंधन से जुड़े नियमित मुद्दों के समाधान तथा आपसी विश्वास बढ़ाने में सहायता की है.
सामान्य स्थिति की ओर धीरे-धीरे लौटने के कुछ सकारात्मक संकेत भी दिखाई दे रहे हैं. इनमें WMCC के अंतर्गत सीमा निर्धारण के विकल्पों पर विचार करने हेतु एक्सपर्ट कमेटी का गठन, कैलाश मानसरोवर यात्रा का फिर से आरंभ, डायरेक्ट फ्लाइट्स की बहाली, तीन दर्रों के माध्यम से सीमा व्यापार पर सहमति और वीजा संबंधी नियमों में ढील जैसे कदम शामिल हैं.
सैन्य स्तर पर भी दोनों देशों के बीच हर साल 1100 से ज्यादा स्थानीय स्तर की बैठकें और संपर्क होते हैं. हॉटलाइन, फ्लैग मीटिंग और कमांडर स्तर की वार्ताओं जैसी स्थापित व्यवस्थाओं के माध्यम से स्थानीय समस्याओं का समाधान किया जाता है. लेकिन स्थिरता का अर्थ लापरवाही नहीं है.
भारतीय सेना किसी भी संभावित खतरे को रोकने और किसी भी आकस्मिक स्थिति का सामना करने के लिए मजबूत सैन्य तैनाती बनाए हुए है. उत्तरी सीमाओं पर बुनियादी ढांचे का विकास, निगरानी व्यवस्था, रसद, गतिशीलता तथा सैन्य क्षमता का निरंतर विस्तार हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है. हम सीमा प्रबंधन से लेकर किसी भी संभावित सैन्य चुनौती तक, हर स्तर की स्थिति का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
भारतीय सेना की दीर्घकालिक रणनीति स्पष्ट है. सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना, स्थानीय विवादों का समाधान संवाद के माध्यम से करना, लेकिन साथ ही अपनी तैयारी, सैन्य तैनाती और बुनियादी ढांचे को हर समय विश्वसनीय और प्रभावी बनाए रखना.
सवाल: आपने जम्मू-कश्मीर में हुए व्यापक बदलावों को बहुत करीब से देखा है. पहले उत्तरी सेना कमांडर के रूप में और फिर सेना प्रमुख के रूप में. अनुच्छेद 370 हटने, चुनावों और अब ऑपरेशन सिंदूर के बाद, राजनीतिक और विकास संबंधी पहलुओं से आगे बढ़कर आपका ईमानदार आकलन क्या है? कट्टरपंथ, सीमा पार घुसपैठ और शेष बचे आतंकवादी नेटवर्क की वर्तमान स्थिति आप किस प्रकार देखते हैं?
जवाब: जम्मू-कश्मीर में स्पष्ट परिवर्तन आया है. यह बदलाव केवल राजनीतिक या विकासात्मक नहीं है, बल्कि सुरक्षा वातावरण, जनता के विश्वास, हिंसा में कमी तथा सामान्य जीवन की निरंतरता में भी दिखाई देता है. लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं, पर्यटन, तीर्थयात्राएं, सार्वजनिक गतिविधियां और विकास परियोजनाएं, इन सभी ने स्थिरता के व्यापक वातावरण को मजबूत किया है.
सुरक्षा के नजरिए से भी संकेत उत्साहजनक हैं. हिंसा के स्तर में कमी आई है. स्थानीय युवाओं की आतंकवादी संगठनों में भर्ती लगभग समाप्ति की ओर है और स्थानीय आतंकवादियों की सक्रिय संख्या अब बहुत सीमित रह गई है. ऑर्गनाइज पत्थरबाजी और बंद कल्चर का लगभग समाप्त हो जाना जनता के बदलते व्यवहार और बढ़ते विश्वास का महत्वपूर्ण संकेत है.
यह उपलब्धि निरंतर सुरक्षा अभियानों, बेहतर खुफिया जानकारी, भारतीय सेना, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, जम्मू-कश्मीर पुलिस, खुफिया एजेंसियों और नागरिक प्रशासन के बीच उत्कृष्ट समन्वय तथा जनता के बढ़ते सहयोग का परिणाम है. इसके बावजूद हमें वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
आतंकवाद का बाकी हिस्सा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. सीमा पार से घुसपैठ, स्थानीय नेटवर्कों को पुनर्जीवित करने के प्रयास, कट्टरपंथ फैलाना, नार्को-आतंकवाद, ड्रोन का उपयोग, एन्क्रिप्टेड संचार तथा दुष्प्रचार जैसी गतिविधियां विरोधी तत्वों द्वारा आगे भी जारी रह सकती हैं.
सवाल: अग्निवीर योजना को एक ओर भारतीय सेना में ऐतिहासिक सुधार के रूप में सराहा गया है, तो दूसरी ओर इसकी आलोचना भी हुई है कि इससे सेना की पारंपरिक युद्ध क्षमता और सैन्य संस्कृति प्रभावित हो सकती है. अब जबकि अग्निवीर सक्रिय सैन्य इकाइयों में सेवा दे रहे हैं और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी उनकी भूमिका देखी गई है, इस योजना को लेकर आपका स्पष्ट आकलन क्या है? क्या यह अपने उद्देश्य में सफल रही है और क्या इसकी शर्तों में भविष्य में संशोधन की आवश्यकता है?
जवाब: अग्निपथ योजना को भारतीय सेना के मानव संसाधन में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य सेना को अधिक युवा, अधिक फिट, अधिक अनुशासित और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार बनाना है. अग्निवीर सैन्य इकाइयों के जीवन, प्रशिक्षण के मानकों और मैदानी परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को सफलतापूर्वक ढाल रहे हैं.
आज के बदलते युद्धक्षेत्र में सैनिकों के लिए केवल शारीरिक रूप से सक्षम होना पर्याप्त नहीं है, उन्हें तकनीकी रूप से भी दक्ष होना आवश्यक है. ड्रोन, निगरानी प्रणालियों, संचार नेटवर्क और आधुनिक युद्ध प्रणालियों को समझने और संचालित करने की उनकी क्षमता भारतीय सेना के लिए एक सकारात्मक योगदान है.
इसके साथ ही, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि यह योजना अभी विकासशील प्रक्रिया में है. पहले बैच का पूरा सर्विस साइकल अभी समाप्त नहीं हुआ है. इसलिए किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वास्तविक अनुभव, परिचालन प्रतिक्रिया और दीर्घकालिक प्रदर्शन का समग्र मूल्यांकन आवश्यक होगा.
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार 25 प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी सेवा में बनाए रखने का प्रावधान है. अगर भविष्य में परिचालन आवश्यकताओं, प्रशिक्षण के अनुभव या फील्ड से प्राप्त प्रतिक्रिया के आधार पर किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता महसूस होती है, तो उस पर संस्थागत स्तर पर विचार किया जा सकता है.
सवाल: चार दशकों से अधिक लंबे सैन्य जीवन में आपने आतंकवाद विरोधी अभियानों से लेकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनाती, संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों और अंततः भारतीय सेना के प्रमुख के रूप में अनेक भूमिकाएं निभाईं. इनमें से कौन-सी नियुक्तियां आपके लिए सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण रहीं, किसने आपके नेतृत्व को सबसे अधिक आकार दिया और कौन-सी यादें आज भी आपके साथ सबसे गहराई से जुड़ी हुई हैं? क्या कोई ऐसा क्षण, अभियान, निर्णय या किसी सैनिक के साथ हुई बातचीत है, जिसे आप अपने 40 से अधिक वर्षों के सैन्य जीवन को देखते हुए बार-बार याद करते हैं?
जवाब: चार दशकों से अधिक लंबे सैन्य जीवन में किसी एक नियुक्ति या किसी एक घटना को सबसे महत्वपूर्ण बताना कठिन है. प्रत्येक नियुक्ति आपको कुछ नया सिखाती है और प्रत्येक सैनिक, जिसका आप नेतृत्व करते हैं, आपके व्यक्तित्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है. मुझे देश के विभिन्न भौगोलिक और परिचालन क्षेत्रों में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. इसमें जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में आतंकवाद विरोधी अभियान, पश्चिमी मोर्चा, ऊंचाई वाले क्षेत्र, स्टाफ और प्रशिक्षण संबंधी नियुक्तियां और अंत में सेना प्रमुख की जिम्मेदारी शामिल है.
18 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स (18 JAK RIF) की कमान मेरे दिल के सबसे निकट रहेगी. एक कमांडिंग ऑफिसर अपने सैनिकों से ही नेतृत्व का वास्तविक अर्थ सीखता है. कठिन परिचालन परिस्थितियों में यह समझ आता है कि साहस हमेशा असाधारण घटनाओं में नहीं दिखाई देता. कई बार वह शांत धैर्य, अनुशासन, निष्ठा और बिना किसी तारीफ की अपेक्षा किए अपना कर्तव्य निभाने की भावना में दिखाई देता है. ये जीवन के ऐसे पाठ हैं जो कभी नहीं भूलते.
पूर्वोत्तर भारत ने भी मेरे व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया. मणिपुर में सैन्य संरचनाओं का नेतृत्व करना और बाद में आईजीएआर (पूर्व) के रूप में कार्य करना मुझे यह सिखाता रहा कि धैर्य रखना, लोगों को समझना और स्थानीय संवेदनशीलताओं का सम्मान करना कितना महत्वपूर्ण है.
उत्तरी कमान का नेतृत्व भी मेरे सैन्य जीवन की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक रहा. जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और उत्तरी सीमाओं की परिचालन जटिलताएं एक कमांडर से स्पष्ट सोच, धैर्य और निरंतर तैयारी की अपेक्षा करती हैं.
अगर कोई एक दृश्य है जिसे मैं अपने साथ लेकर जाऊंगा, तो वह फॉरवर्ड पोस्ट पर तैनात उस सैनिक का है, चाहे वह किसी पर्वतीय चोटी पर हो, आतंकवाद विरोधी अभियान में हो या रेगिस्तान में, जो हर समय सतर्क, अनुशासित और आत्मविश्वास से अपने कर्तव्य का पालन कर रहा होता है. ऐसे सैनिकों के साथ हुई बातचीत हमेशा यह याद दिलाती है कि भारतीय सेना का अस्तित्व क्यों है और नेतृत्व का वास्तविक अर्थ क्या है.
पद और रैंक समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन एक कमांडर और उसके सैनिक के बीच का विश्वास और संबंध हमेशा सैन्य जीवन का केंद्र बना रहता है. यही स्मृति मेरे साथ सबसे अधिक जीवंत रूप में रहेगी.
सवाल: इतिहास अक्सर सेना प्रमुखों का मूल्यांकन केवल उन संकटों से नहीं करता जिनका उन्होंने सामना किया, बल्कि उस संस्था से भी करता है जिसे वे अपने पीछे छोड़कर जाते हैं. आपको ऐसे सेना प्रमुख के रूप में याद किया जा सकता है जिसने ड्रोन, तकनीकी आधुनिकीकरण और भविष्य के युद्ध की क्षमताओं को विशेष गति दी. आज आप भारतीय सेना की आधुनिकीकरण प्रक्रिया और रणनीतिक तैयारी का किस प्रकार आकलन करते हैं?
जवाब: मैं इसे किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सेना की एक संस्थागत यात्रा के रूप में देखता हूं. आज भारतीय सेना पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी, अधिक तकनीक-सक्षम और बदलते युद्ध स्वरूप के लिए कहीं अधिक तैयार है. आधुनिकीकरण अब केवल नए हथियार या प्लेटफॉर्म खरीदने तक सीमित नहीं है. अब हमारा ध्यान ऐसी समग्र क्षमता निर्माण पर है जिसमें सैन्य सिद्धांत, संगठनात्मक संरचना, प्रौद्योगिकी, प्रशिक्षण और आत्मनिर्भरता सभी एक साथ आगे बढ़ें.
हाल के युद्धों ने यह सिद्ध कर दिया है कि ड्रोन अब केवल विशेष परिस्थितियों में उपयोग होने वाले साधन नहीं रहे. वे निगरानी, सटीक प्रहार, रसद, संचार और सूचना अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. साथ ही, शत्रु के ड्रोन के बढ़ते उपयोग ने एंटी-ड्रोन प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, वायु रक्षा, सुरक्षित नेटवर्क और डेटा एकीकरण को अग्रिम पंक्ति की अनिवार्य आवश्यकता बना दिया है.
हमारा प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि ड्रोन को अलग-थलग उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि बहु-स्तरीय, भूमिका-आधारित और नेटवर्क से जुड़े बहु-क्षेत्रीय युद्ध तंत्र के अभिन्न हिस्से के रूप में देखा जाए. रुद्र ब्रिगेड, भैरव बटालियन, अशनि ड्रोन प्लाटून, शक्तिबाण रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरियाँ इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं.
इनका उद्देश्य भारतीय सेना को अधिक चुस्त, अधिक सटीक, बेहतर नेटवर्कयुक्त और तेज़ प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाना है. हमारा लक्ष्य आधुनिक तकनीक को अग्रिम मोर्चे तक पहुंचाना है ताकि प्रत्येक स्तर पर कमांडरों और सैनिकों के पास बेहतर जानकारी हो और वे अधिक प्रभावी निर्णय ले सकें. रणनीतिक दृष्टि से आज भारतीय सेना पारंपरिक युद्ध, आतंकवाद विरोधी अभियान, हाइब्रिड युद्ध, नॉन कॉन्टेक्ट युद्ध और तकनीक आधारित संघर्ष सभी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है.
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