- पूरी दुनिया में इबोला वायरस को लेकर अलर्ट है, भारत भी पूरी तरह सतर्क
- WHO ने भी इबोला को हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर रखा है
- हालांकि, भारत में सभी तरह के एहतियात बरते जा रहे हैं, और तैयारियां पूरी है
कांगो और युगांडा और दक्षिण सूडान में फैले इबोला वायरस का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे लेकर हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दिया है. भारत में अभी इस खतरनाक वायरस कोई रोगी नहीं मिला है लेकिन इसको लेकर तैयारी पूरी है. साल 1976 से अब तक कांगो में इबोला वायरस के कई मामले सामने आए, लेकिन वहां से इस बीमारी का बड़ा फैलाव भारत में नहीं हुआ. इस मामले पर NCDC के पूर्व निदेशक डॉ सुजीत सिंह ने NDTV से बातचीत इस बीमारी के खतरे के बारे में बताया है.
इबोला का स्ट्रेन खतरनाक
डॉ सिंह ने कहा कि चिंता की बात यह है कि WHO की समीक्षा में पता चला है कि इस बार वायरस का स्ट्रेन अलग है. उन्होंने कहा कि भारत में इसकी टेस्टिंग फैसिलिटी अभी उतनी प्रभावी नहीं मानी जाती है. डॉ सिंह ने कहा कि मुश्किल ये है कि इस बीमारी की दवा और वैक्सीन भी फिलहाल उपलब्ध नहीं है.
यह बीमारी रेस्पिरेटरी रूट या मच्छरों से नहीं फैलती है. संक्रमण का खतरा मुख्य रूप से सिम्प्टमेटिक यानी लक्षण वाले मरीजों से होता है. ऐसे मामलों को स्क्रीनिंग के जरिए आसानी से पकड़ा जा सकता है. मौजूदा स्ट्रेन का खतरा अभी पहले की तुलना में कितना ज्यादा है, इसका पूरा आकलन अभी नहीं हुआ है. WHO ने चेतावनी जारी की है और भारत में जॉइंट मॉनिटरिंग ग्रुप तथा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय लगातार स्थिति का आकलन कर रहे हैं. उसी के आधार पर एयरपोर्ट, यात्रियों, स्वास्थ्य संस्थानों और राज्यों के लिए एडवाइजरी जारी की गई है.
डॉ. सुजीत सिंह, पूर्व निदेशक, NCDC
युगांडा और दक्षिण सूडान में मामले
उन्होंने कहा कि इबोला वायरस के युगांडा और दक्षिण सूडान में संदिग्ध मामले सामने आए हैं. ऐसे में ट्रैवल से जुड़े मामलों में, 2 से 21 दिन के इनक्यूबेशन पीरियड को देखते हुए, भारत में भी संदिग्ध मामले सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
भारत खतरनाक श्रेणी में नहीं
डॉ सिहं ने बताया कि इबोला के लिए हमें विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार तैयारी करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि WHO ने इसे “पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न” घोषित किया है. इसके तहत WHO दो तरह की सिफारिशें जारी करता है. पहला, उन देशों के लिए जहां खतरा ज्यादा है. डॉ सिंह ने बताया कि भारत फिलहाल उस श्रेणी में नहीं आता, जो हमारे लिए राहत की बात है. दूसरा, अन्य देशों के लिए WHO ने जो गाइडलाइन और SOP जारी किए हैं, भारत को उनके अनुसार तैयारी करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि इबोला के लिए एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग मजबूत हो ताकि संभावित मरीजों की पहचान समय रहते की जा सके. अस्पतालों में भी पर्याप्त तैयारी होनी चाहिए ताकि मरीज का सही इलाज और आइसोलेशन हो सके.
एयरपोर्ट स्क्रीनिंग जरूरी
NCDC के पूर्व निदेशक ने बताया कि 2015-16 में भारत में इबोला का एक मामला सामने आया था. उस दौरान एक यात्री वेस्ट अफ्रीकी देश से भारत आया था. RTPCR टेस्ट में वह सामान्य पाया गया, लेकिन सीमेन और स्राव की जांच में पॉजिटिव मिला था. उन्होंने कहा कि उस व्यक्ति को करीब 4 महीने तक निगरानी में रखा गया और हर 15 दिन में उसका टेस्ट किया गया. ICMR और NCDC की रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद ही उसे जाने की अनुमति दी गई. उन्होंने कहा कि इसलिए एयरपोर्ट स्क्रीनिंग बेहद जरूरी है.
राज्यों को भी करनी चाहिए तैयारी
डॉ सिहं ने कहा कि राज्यों को अपनी जांच और तैयारी की सुविधाओं का एक्सपर्ट टीम से निरीक्षण कराना चाहिए ताकि किसी कमी का पता चल सके. उन्होंने कहा कि अस्पतालों में N95 मास्क, PPE किट और क्वॉरेंटाइन की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि मेरी जानकारी के मुताबिक, 500 से 600 लोग ऐसे आए हैं जिनका यात्रा इतिहास प्रभावित देशों से जुड़ा रहा है. ऐसे मामलों में यह पता लगाना जरूरी है कि क्या वे किसी संक्रमित या संदिग्ध मरीज के संपर्क में आए थे? यह भी देखना जरूरी है कि यात्रा के बाद उनमें बीमारी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं या नहीं. अगर लक्षण मौजूद हैं, तभी संक्रमण दूसरे लोगों तक फैलने का खतरा बढ़ता है. सरकार ने दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल को नोडल अस्पताल बनाया है.
संक्रामक बीमारी है इबोला
डॉ सिंह ने बताया कि यह एक संक्रामक बीमारी है और अगर इसका फैलाव बढ़ता है तो यह चिंता का विषय हो सकता है. हालांकि, सरकार की मौजूदा तैयारी, स्वास्थ्य व्यवस्था और विशेषज्ञों के अनुभव को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत इस स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरीके से तैयार है. उन्होंने कहा कि फिलहाल लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन जागरूक रहना जरूरी है. यह ऐसी बीमारी है जिसकी एयरपोर्ट पर मजबूत स्क्रीनिंग और निगरानी के जरिए काफी हद तक रोकथाम की जा सकती है. भारत के लिए अभी कोई चिंता और खतरे की बात नहीं है.
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