- दिल्ली-NCR में 46 डिग्री तक पहुंचता तापमान और NDMA का अलर्ट लोगों के स्वास्थ्य और कामकाज पर प्रभाव डाल रहा है.
- अत्यधिक गर्मी से शरीर में डिहाइड्रेशन, नींद की कमी और थकान बढ़ती है, जिससे प्रोडक्टिविटी घटती है.
- बढ़ती गर्मी से बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची है और कृषि प्रभावित होने से महंगाई में वृद्धि का खतरा है
दिल्ली‑NCR में पड़ रही भीषण गर्मी अब सिर्फ तापमान का आंकड़ा नहीं, बल्कि लोगों के शरीर और दिमाग पर सीधा हमला बन गई है. नोएडा, गाजियाबाद समेत पूरे क्षेत्र में NDMA के 'लू से भी भीषण लू' वाले अलर्ट और 46°C तक पहुंचते तापमान ने हालात को और गंभीर बना दिया है.
‘लू से भी भीषण लू' का अलर्ट
20 मई को नोएडा और गाजियाबाद के लोगों को मोबाइल पर NDMA 'लू से भी भीषण लू' का अलर्ट मिला. IMD ने भी दिल्ली‑NCR के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है. तापमान पहले ही 44.5°C पार कर चुका है और आने वाले दिनों में 46°C तक पहुंचने का अनुमान है. दोपहर में 20 किमी/घंटा की रफ्तार से चल रही शुष्क हवाएं माहौल को 'चलती भट्टी' में बदल रही हैं.
क्यों लंबा लग रहा है 9 से 5 का समय
इस भीषण गर्मी का असर सिर्फ शरीर पर नहीं, बल्कि काम की रफ्तार और मानसिक स्थिति पर भी सीधे पड़ रहा है. सूखी हवाएं माहौल को चलती भट्टी जैसा बना रही हैं. यही वजह है कि ऑफिस का 9‑5 का समय अब लोगों को असामान्य रूप से लंबा और थकाऊ लग रहा है.
दरअसल, इतनी गर्मी में शरीर लगातार खुद को ठंडा रखने के लिए संघर्ष करता है. दिल की धड़कन बढ़ती है, पसीना तेज़ी से निकलता है और शरीर में पानी की कमी होने लगती है, जिससे ध्यान व ऊर्जा दोनों घटते हैं. ऊपर से गर्म रातों में ठीक से नींद नहीं मिलती, जिससे थकान और बढ़ जाती है. वैज्ञानिक रूप से भी यह साबित है कि ज्यादा तापमान पर उत्पादकता घटती है और दिमाग में 'टाइम डाइलेशन' यानी समय लंबा लगने का अहसास बढ़ता है. दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद जैसे कंक्रीट वाले शहरों में ‘अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव के कारण हालात और बिगड़ रहे हैं, जिससे दिन के साथ‑साथ रात भी राहत नहीं दे रही.
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शरीर के अंदर क्या हो रहा है?
शरीर का तापमान नियंत्रित करने के लिए दिल की धड़कन बढ़ती है. खून की नसें फैलती हैं. अत्यधिक पसीना आता है, जिससे तेजी से डिहाइड्रेशन होता है. सूखी ‘लू' पसीने को जल्दी सुखा देती है, लेकिन शरीर से पानी भी तेजी से खींच लेती है. हल्का पानी कम होना भी-
- ध्यान कमजोर करता है
- थकान बढ़ाता है
- काम करने की क्षमता घटाता है
नींद भी बन रही है दुश्मन
रात में तापमान 25-27°C से नीचे नहीं जा रहा, जिससे नींद अधूरी रहती है. सुबह से ही शरीर थका हुआ रहता है. यानी काम शुरू होने से पहले ही ऊर्जा खत्म.

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दिमाग पर असर: ‘टाइम स्लो' क्यों लगता है
वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि 24-26°C के बाद ही उत्पादकता गिरने लगती है. जब तापमान 45°C के आसपास पहुंचता है, तो फोकस कमजोर होता है. इससे याददाश्त पर असर पड़ता है, निर्णय लेने की क्षमता कम होती है और छोटी-सी मेहनत भी भारी लगती है.
'टाइम डाइलेशन' का असर
गर्मी में दिमाग लगातार असहजता महसूस करता है. पसीना, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द बना रहता है. इससे हर मिनट लंबा महसूस होता है. यही वजह है कि ऑफिस का 9-5 अब 9-7 जैसा लग रहा है.
‘हीट ट्रैप' बनते शहर
दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद जैसे कंक्रीट आधारित शहरों में Urban Heat Island Effect बढ़ गया है. दरअसल कंक्रीट गर्मी सोखकर रात तक छोड़ता है. हरियाली कम होने से राहत नहीं मिलती और ट्रैफिक व प्रदूषण गर्मी बढ़ाते हैं.
हीट वेव क्या होती है?
हीट वेव यानी लू वह स्थिति है जब हवा का तापमान सामान्य स्तर से काफी ज्यादा बढ़ जाता है और यह मानव शरीर के लिए खतरनाक या घातक साबित होने लगता है. जब किसी क्षेत्र का वास्तविक तापमान या सामान्य औसत तापमान एक निश्चित सीमा से ऊपर चला जाता है, तो इसे हीट वेव की स्थिति माना जाता है.

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, मैदानी क्षेत्रों में यदि किसी स्थान का अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाता है, तो वहां हीट वेव की स्थिति मानी जाती है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में यह सीमा 30 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होती है.
हीट वेव को दो आधारों पर समझा जाता है. पहला, सामान्य तापमान से अंतर के आधार पर. अगर तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस अधिक हो, तो उसे हीट वेव कहा जाता है, और यदि यह अंतर 6.4 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो जाए, तो इसे गंभीर हीट वेव (Severe Heat Wave) माना जाता है.
दूसरा, वास्तविक तापमान के आधार पर. अगर अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाए, तो यह हीट वेव की श्रेणी में आता है, जबकि 47 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान को गंभीर हीट वेव की स्थिति माना जाता है.
स्वास्थ्य पर खतरनाक असर
हीट वेव का असर कई स्तर पर दिखता है.
1. हीट क्रैम्प: इस दौरान मांसपेशियों में दर्द बना रहता है और हल्का बुखार बना रहता है.
2. हीट एग्जॉशन: इस दौरान चक्कर, थकान, उल्टी जैसा महसूस होता है और अधिक पसीना आता है.
3. हीट स्ट्रोक (घातक): 104°F+ बॉडी टेम्परेचर होता है. इसमें बेहोशी जैसा महसूस होता है.
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सिर्फ गर्मी नहीं, आर्थिक संकट भी
इस साल हीट वेव का असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. लगातार बढ़ती गर्मी ने बिजली की मांग को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है. 25 अप्रैल को देश में बिजली की अधिकतम मांग 256.11 गीगावॉट तक पहुंच गई, क्योंकि एयर कंडीशनर और कूलर का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है.
गर्मी और कम बारिश का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है, जिससे फसलों को नुकसान होने की आशंका है. इसका परिणाम महंगाई के रूप में सामने आ सकता है, खासकर खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने का खतरा है. इसके अलावा वैश्विक स्तर पर होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और तेल आपूर्ति की अनिश्चितता ने ऊर्जा कीमतों को ऊपर धकेला है, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है.
अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस साल महंगाई दर 5 से 5.8 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. ग्रामीण इलाकों में आमदनी पर असर पड़ने से मांग में कमी आ सकती है, जो आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर सकती है.
क्या करें: बचाव के उपाय
भीषण गर्मी से बचाव के लिए रोजमर्रा की आदतों में बदलाव बेहद जरूरी हो गया है. घर और ऑफिस में काम करते समय बार-बार पानी और ORS लेना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो. कोशिश करें कि ज्यादा मेहनत वाले काम सुबह के समय ही निपटा लें, जब तापमान अपेक्षाकृत कम होता है. बीच-बीच में 2-3 मिनट का कूलिंग ब्रेक लेना भी शरीर को राहत देता है.
बाहर निकलते समय खास सावधानी जरूरी है. दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच धूप में जाने से बचें. हल्के, ढीले और सूती कपड़े पहनें, साथ ही छाता या टोपी का इस्तेमाल करें ताकि सीधे सूरज की किरणों से बचा जा सके.
कुछ चीजों से परहेज भी जरूरी है. अत्यधिक चाय, कॉफी या शराब पीने से बचें, क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी बढ़ाते हैं. खाली पेट बाहर निकलना भी नुकसानदायक हो सकता है. अगर शरीर में चक्कर आना, मतली, या अत्यधिक थकान जैसे लक्षण दिखें, तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.
दिल्ली‑NCR की मौजूदा गर्मी अब सिर्फ मौसम की स्थिति नहीं रह गई है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, कामकाज और अर्थव्यवस्था से जुड़ा बड़ा संकट बनती जा रही है. जब तापमान 46 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच जाता है, तो काम का धीमा पड़ना आलस नहीं बल्कि शरीर की मजबूरी होती है. ऐसे में इस चुनौती से निपटने के लिए व्यक्तिगत सावधानी के साथ-साथ नीतिगत स्तर पर भी गंभीर सोच की जरूरत है.
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