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डिजिटल सुरक्षा का खोखला ढांचा: ऐप कैब के 'लूपहोल्स' और हमारी बेटियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

दिल्ली के महरौली में कैब ड्राइवर द्वारा मासूम से दरिंदगी और हत्या ने ऐप-कैब कंपनियों के सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है. आपराधिक रिकॉर्ड के बावजूद ड्राइवर का टैक्सी चलाना डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम और महिला सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान है.

डिजिटल सुरक्षा का खोखला ढांचा: ऐप कैब के 'लूपहोल्स' और हमारी बेटियों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
टैक्सी ऐप में लूपहोल्स

राजधानी दिल्ली का महरौली इलाका एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था और इंसानियत के ढहते ढांचे का गवाह बना है. फुटपाथ पर अपने परिवार के साथ सो रही एक 11 साल की मासूम बच्ची को एक कैब ड्राइवर ने अगवा किया, उसके साथ दरिंदगी (रेप) की और फिर गला दबाकर उसकी हत्या कर दी. इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है. जनता आक्रोश में है, लेकिन सबसे बड़ा झटका तब लगा जब दिल्ली पुलिस की तफ्तीश में सामने आया कि इस उसके ऊपर पहले से भी मारपीट और नशे में टैक्सी चलाने के कुछ केस दर्ज हैं. सवाल यह उठता है कि करोड़ों का टर्नओवर करने वाली टेक-कंपनियों के सुरक्षा दावों को ठेंगा दिखाकर इतना बड़ा अपराधी दिल्ली की सड़कों पर सवारी गाड़ियां कैसे दौड़ा रहा था?

'अपवाद' नहीं, ये सिलसिलेवार अपराध हैं

जब भी ऐसी कोई भयावह घटना होती है, टेक कंपनियां इसे एक 'दुर्भाग्यपूर्ण अपवाद' बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि यह सिस्टम की क्रॉनिक बीमारी है.

दिल्ली उबर रेप केस (2014): याद करिए साल 2014 का वो उबर रेप केस, जिसने निर्भया कांड के जख्मों को हरा कर दिया था. मुख्य आरोपी शिव कुमार यादव पर पहले से ही रेप जैसे कई क्रिमिनल केस थे, लेकिन उसने फर्जी पुलिस वेरिफिकेशन सर्टिफिकेट के सहारे ऐप पर एंट्री पा ली थी.

ग्रेटर नोएडा ओला केस (2018): एक महिला पैसेंजर ने दिल्ली से कैब बुक की. असली ओला ड्राइवर ने अपनी मर्जी से बीच रास्ते में अपने एक अनवेरीफाइड दोस्त को कार के अंदर बैठा लिया, जिसने बाद में कार में महिला के साथ रेप किया. 

सिस्टम का वो झोल, जिसका फायदा अपराधी उठाते हैं

आखिर भारत में ऐप-आधारित कैब कंपनियों (Ola/Uber) का सुरक्षा तंत्र इतना कमजोर क्यों है? इसके पीछे तीन मुख्य कड़वी सच्चाइयां हैं:

थर्ड-पार्टी पर निर्भरता: ये अरबों की कंपनियां खुद जमीन पर जाकर ड्राइवरों का कोई बैकग्राउंड चेक नहीं करतीं. ये सिर्फ स्थानीय थानों द्वारा जारी 'कैरेक्टर सर्टिफिकेट' पर निर्भर रहती हैं, जिसे हासिल करना भारत में कितना आसान है, यह किसी से छिपा नहीं है.

डेटाबेस का आपस में न जुड़ना: भारत में राष्ट्रीय स्तर पर क्रिमिनल रिकॉर्ड्स का कोई एक लाइव, सेंट्रलाइज्ड डिजिटल डेटाबेस नहीं है. अगर किसी अपराधी पर बिहार के किसी थाने में केस दर्ज है, तो दिल्ली या बेंगलुरु के थाने को उसकी भनक तब तक नहीं लगती जब तक वहां की पुलिस से संपर्क न किया जाए. अपराधी इसी 'कम्युनिकेशन गैप' का फायदा उठाते हैं.

अपराधियों के दो बड़े अचूक हथियार: 'अकाउंट स्वैपिंग' और 'फर्जी एड्रेस'

टेक कंपनियों की नाक के नीचे अपराधी ड्राइवर्स मुख्य रूप से दो खतरनाक हथकंडे अपनाते हैं:

अकाउंट स्वैपिंग / सब-कॉन्ट्रैक्टिंग (स्टीयरिंग किसी और के हाथ में): इसमें ऐप पर जिस व्यक्ति के कागजात और KYC क्लियर होते हैं, वह खुद आराम करता है और अपना फोन व आईडी पासवर्ड अपने किसी अनवेरीफाइड दोस्त या रिश्तेदार को थमा देता है.

जुलाई 2018 में ऐसा ही मामला सामने आया था जब एयरपोर्ट जा रही एक महिला पैसेंजर को शराब के नशे में धुत कैब ड्राइवर ने किडनैप करने की कोशिश की थी. टोल बूथ पर महिला ने चिल्लाकर अपनी जान बचाई. बाद में पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि वह गाड़ी और आईडी ऐप पर सुरेश नाम के व्यक्ति पर रजिस्टर्ड थी, लेकिन गाड़ी उसका भाई चला रहा था. यानी ऑन-पेपर सुरक्षा बिल्कुल दुरुस्त थी, लेकिन ऑन-ग्राउंड स्टीयरिंग एक किडनैपर के हाथ में थी.

फर्जी पते का खेल: कई अपराधी ड्राइवर्स स्थानीय मकान मालिकों से सांठगांठ करके या जाली रेंट एग्रीमेंट बनाकर पुलिस वेरिफिकेशन के लिए फर्जी पता दे देते हैं. कांड करने के बाद जब पुलिस उस पते पर पहुंचती है, तो वहां सिर्फ एक खाली कमरा या कोई अनजान शख्स मिलता है.

अमेरिका और ब्रिटेन का सुरक्षा तंत्र: जहां लूपहोल्स की गुंजाइश नहीं

विकसित देशों में यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सरकारें और कंपनियां किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेतीं.

अमेरिका (USA) का मॉडल: यहां कंपनियां सरकारी सोशल सिक्योरिटी नंबर (SSN) के जरिए ड्राइवर के टैक्स, क्रेडिट और क्रिमिनल इतिहास को थर्ड-पार्टी स्पेशलिस्ट एजेंसियों (जैसे Checkr) से क्रॉस-वेरिफाई कराती हैं. साथ ही, वहां Motor Vehicle Record (MVR) चेक होता है, जो ड्राइवर के पूरे ड्राइविंग इतिहास (एक्सीडेंट, ड्रिंक एंड ड्राइव) का कच्चा चिट्ठा खोल देता है.

ब्रिटेन (UK) का मॉडल: यहां कोई भी ऐप कंपनी सीधे तौर पर किसी को ड्राइवर नहीं रख सकती. ड्राइवर को पहले सरकारी काउंसिल (जैसे लंदन में TfL) से Enhanced DBS Check पास करके सरकारी लाइसेंस लेना होता है, जो सीधे नेशनल पुलिस कंप्यूटर से लिंक होता है.

विदेशी सिस्टम भारत से बेहतर क्यों है?

बायोमेट्रिक फेशियल रिकग्निशन: अमेरिका और ब्रिटेन में उबर जैसे ऐप्स में Real-Time ID Check अनिवार्य है. ड्राइवर को ट्रिप शुरू करने से पहले या दिन में कई बार रैंडमली ऐप के अंदर अपनी लाइव सेल्फी देनी होती है. अगर चेहरा रजिस्टर्ड ड्राइवर से मिसमैच हुआ, तो अकाउंट तुरंत परमानेंट ब्लॉक हो जाता है. यह तकनीक भारत में 'अकाउंट स्वैपिंग' के धंधे को पूरी तरह खत्म कर सकती है.

कंटीन्यूअस मॉनिटरिंग: भारत में वेरिफिकेशन सिर्फ एक बार (ऑनबोर्डिंग के समय) होता है. इसके विपरीत, विदेशों में हर 6 महीने या सालभर में ड्राइवर का क्रिमिनल रिकॉर्ड ऑटो-चेक होता है. अगर कैब चलाने के दौरान भी ड्राइवर पर कोई नया केस दर्ज होता है, तो सिस्टम को तुरंत अलर्ट मिल जाता है.

एग्रीगेटर्स को 'सॉफ्टवेयर' नहीं, 'ट्रांसपोर्ट कंपनी' मानना होगा

महरौली की इस ताजा और दिल दहला देने वाली घटना ने यह साफ कर दिया है कि भारत में कैब एग्रीगेटर्स केवल एक 'सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म' होने का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते. जब तक भारत में हर ट्रिप से पहले अनिवार्य बायोमेट्रिक/सेल्फी वेरिफिकेशन, सख्त सरकारी रेगुलेशन और एक एकीकृत नेशनल क्रिमिनल डेटाबेस को लागू नहीं किया जाता, तब तक 'सेफ राइड' का हर दावा सिर्फ एक छलावा रहेगा. अब समय आ गया है कि हमारी सरकारें इन कंपनियों को पैसेंजर्स की सुरक्षा के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह बनाएं, ताकि डिजिटल इंडिया के इस दौर में किसी और मासूम को अपनी जान न गंवानी पड़े.

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