विज्ञापन

आज फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर’ बता रहा... दिल्ली हाईकोर्ट ने 'जबरन माइक अड़ाकर' जवाब मांगने वालों पर कही ये बात

दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 जुलाई को अपने फैसले में कहा कि आज मोबाइल फोन और माइक्रोफोन वाला कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर’ बता सकता है जबकि अक्सर उसके पास न तो पत्रकारिता का कोई प्रशिक्षण होता है, न ही नैतिक समझ और न ही कोई जवाबदेही.

आज फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर’ बता रहा... दिल्ली हाईकोर्ट ने 'जबरन माइक अड़ाकर' जवाब मांगने वालों पर कही ये बात
मीडिया के लिए भी कानून बनाने की जरूरत को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि प्रेस की आजादी का उपयोग गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता या कानून व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने वाली सामग्री के प्रसार के लिए ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता इसलिए ऐसी व्यवस्था (नियमन) आवश्यक है, जो एक ओर प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करे और दूसरी ओर पत्रकारों की जवाबदेही सुनिश्चित करे. न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने हाल के वर्षों में सोशल मीडिया और डिजिटल मंच के तेजी से विस्तार के कारण ‘मीडिया के एक बड़े हिस्से' के बिना किसी नियम-कानून और बिना किसी संगठन के काम करने पर चिंता जताई.

न्यायमूर्ति कथपालिया ने कहा कि मीडिया को यह समझना चाहिए कि जनमत बनाने की उसकी ताक़त के साथ-साथ संयम, निष्पक्षता और जिम्मेदारी बरतने का एक अनकहा फर्ज भी जुड़ा होता है. उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘खुद को रिपोर्टर बताने वाले लोगों' का नागरिकों के सामने ‘‘आक्रामक तरीके से माइक अड़ाकर तुरंत जवाब मांगना'' और फिर उनके चुप रहने पर इसे ‘‘सवालों से बचने'' का तरीका बताना ‘‘आम बात'' हो गई है, ऐसे में लोगों के बीच गलत धारणा बनती है और जनता का बेवजह दबाव पैदा होता है.

लोकतांत्रिक समाज में प्रेस की आजादी को एक जरूरी स्तंभ मानते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘‘चुनिंदा रिपोर्टिंग, सनसनी फैलाने या बिना पुष्टि किए आरोपों'' के जरिए समाज के किसी हिस्से को निशाना बनाने या बदनाम करने की प्रवृत्ति ‘‘उतनी ही चिंताजनक'' है. उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे व्यवहार से सामाजिक दूरी बढ़ सकती है और सांप्रदायिक तनाव भी पैदा हो सकता है.

उच्च न्यायालय ने 16 जुलाई को अपने फैसले में कहा कि आज मोबाइल फोन और माइक्रोफोन वाला कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर' बता सकता है, जबकि अक्सर उसके पास न तो पत्रकारिता का कोई प्रशिक्षण होता है, न ही नैतिक समझ और न ही कोई जवाबदेही.'' उच्च न्यायालय उन दो आरोपियों की ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहा था, जिनपर जुलाई 2025 में सीमापुरी की एक अनधिकृत कॉलोनी में यूट्यूब चैनल के लिए रिपोर्टिंग कर रहे दो स्वतंत्र पत्रकारों के साथ मारपीट करने का आरोप है.

उच्च न्यायालय ने कहा कि शिकायतकर्ता और उसका साथी इलाके में मौजूद उपासना स्थल के बारे में एक वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे, जिससे स्थानीय लोग नाराज़ हो गए। आरोप है कि यह पूजा-स्थल बिना किसी मंज़ूरी के बनाया गया था. उच्च न्यायालय ने कहा कि यह घटना ‘स्पष्ट रूप से सामूहिक आक्रोश' का परिणाम थी और इसमें आरोपियों की संलिप्तता ‘संदिग्ध' थी, इसलिए उन्हें आजादी से वंचित करने का कोई कारण नहीं था. न्यायमूर्ति कथपालिया ने कहा, ‘‘अतः, दोनों जमानत याचिकाएं स्वीकार की जाती हैं और आरोपियों/आवेदकों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है.''

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Delhi High Court, Media Laws
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com