फिरोजशाह मेहता नेता, वकील, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्हें बॉम्बे का शेर या बॉम्बे का बेताज बादशाह कहा जाता था. उन्होंने 19वीं सदी में मॉडर्न बॉम्बे की बुनियाद रखी. आज मुंबई में जो इन्फ्रास्ट्रक्चर, गगनचुंबी इमारतें और शासन का ढांचा दिखाई देता है, उसमें मेहता का बड़ा योगदान है. अंग्रेजों के आगे झोली फैलाने की बजाय उन्होंने भारत में पहले स्वदेशी बैंक की स्थापना की, ताकि मुंबई के लिए फंड जुटाया जा सके. अमीर पारसी परिवार में 4 अगस्त 1845 को जन्मे फिरोजशाह मेहता ने मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज से पढ़ाई पूरी की. पारसी समुदाय में MA की डिग्री पाने वाले वो पहले शख्स थे. बैरिस्टर की पढ़ाई उन्होंने लंदन के लिंकोल्न्स इन से की और 1868 में भारत लौट आए. इंग्लैंड प्रवास के दौरान वे दादाभाई नौरोजी के संपर्क में आए.
पहला स्वदेशी बैंक बनाया
मुंबई के विकास के लिए फंड की कमी थी तो मेहता ने बैंकिंग सेक्टर में अंग्रेजों के वर्चस्व को तोड़ने के लिए सर सोराबजी पोचखानवाला के साथ मिलकर 1911 में भारत का पहला स्वदेशी बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की. एजुकेशन सेक्टर में बॉम्बे यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के तौर पर उन्होंने बड़ा योगदान दिया. 50 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी से 21 दिसंबर 1911 को बैंक बना. फिरोजशाह मेहता इसके पहले अध्यक्ष बने.
मुंबई में जल संकट दूर किया
पारसी समुदाय के फिरोजशाह मेहता को बॉम्बे नगर निगम का पिता तक कहा जाता था. 1870 की दशक में बॉम्बे का प्रशासन बिखरा था. फिरोजशाह मेहता ने बॉम्बे प्रशासन पर ब्रिटिश कमिश्नरों की मनमानी के खिलाफ कानूनी जंग लड़ी.1872 का बॉम्बे म्यूनिसिपल कानून बना और नगर निगम बनने के साथ मेयर और पार्षद के तौर पर जनप्रतिनिधियों के हाथों में सत्ता आई. मेहता खुद 1884, 1885, 1905 और 1911 में चार बार मुंबई नगर निगम मेयर चुने गए.बॉम्बे में मलेरिया और हैजा जैसी जानलेवा बीमारियों के लिए ड्रेनेज सिस्टम, तानसा और विहार झील से शहर में पानी की आपूर्ति का संकट दूर किया.
Remembering Sir Pherozeshah Mehta on his birth anniversary.
— Dr Syed Naseer Hussain, M P (@NasirHussainINC) August 4, 2026
A distinguished freedom fighter, jurist, and former President of the Indian National Congress, Sir Pherozeshah Mehta was a pioneering advocate of constitutional reform, civic governance, and representative institutions.… pic.twitter.com/bFkhhXmXwc
मुंबई को दिया मॉडर्न लुक
संकरी सड़कों की जगह चौड़ी रोड बनवाईं. बड़े पार्कों के साथ जुहू, अंधेरी समेत मुंबई के पूरे तटीय इलाके की दशा बदल दी. नगर निगम में मेहता को बॉम्बे का बेताज बादशाह कहते थे.एक बार बॉम्बे के अंग्रेजी म्यूनिसिपल कमिश्नर ने घमंड में भारतीय पार्षदों के अधिकारों को कमजोर करने वाला प्रस्ताव पारित कराया तो मेहता ने जोरदार आवाज में कानून की ऐसी बारीकियां गिनाईं कि अंग्रेज अधिकारी सन्न रह गए. कमिश्नर को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा.
शाही ठाठ-बाट, राजसी अंदाज
शाही ठाठ-बाट, राजसी अंदाज और पहनावा उनकी पहचान थी. फिरोजशाह मेहता खास पारसी पगड़ी, अंग्रेजी सूट या लंबे काले कोट में अदालत या रैलियों में पहुंचते थे. मेहता बॉम्बे की सड़कों पर अपनी शाही बग्घी में निकलते थे. रसूख इतना था कि लोग सम्मान में खड़े हो जाते थे. वायसराय लॉर्ड रिपन ने कहा था कि फिरोजशाह मेहता की तर्कशक्ति ब्रिटिश सांसदों को भी पीछे छोड़ने वाली है.
अदालत में मेहता के सामने कांपते थे अंग्रेज जज
बॉम्बे हाईकोर्ट में एक बार जब ब्रिटिश जज ने भारतीय वकील से बदसलूकी की तो कोर्ट रूम में मौजूद मेहता से सहा नहीं गया. उन्होंने जज से कहा, वकील अंग्रेज हो या भारतीय, उसके सम्मान की रक्षा करना जज की जिम्मेदारी है.कानून के तमाम दांवपेंच उन्होंने गिनाए तो जज को तुरंत माफी मांगनी पड़ी. उन्होंने भारतीय विरोधी दुष्प्रचार का अंग्रेजों का हथकंडा रोकने के लिए 1913 में द बॉम्बे क्रॉनिकल अखबार शुरू किया.
बीएमसी में उनकी आदमकद प्रतिमा
ब्रिटिश सरकार ने प्रथम विश्व युद्ध में प्रेस पर कठोर प्रतिबंध लगे, लेकिन मेहता ने बिना भय के लेख छापे.धमकियों पर मेहता ने जवाब दिया, अखबार बिके या बंद हो जाए, सच छापना बंद नहीं होगा.बॉम्बे में छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के ठीक बाहर बीएमसी (BMC) मुख्यालय में उनकी आदमकद प्रतिमा गवाह है कि कैसे एक शख्स ने देश की वित्तीय राजधानी मुंबई के भविष्य की नींव रखी थी.
कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक
फिरोजशाह मेहता 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के वक्त उसके संस्थापक सदस्यों में से एक थे. 1890 में कलकत्ता अधिवेशन में वो कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए. वो कांग्रेस के नरम दल यानी उदारवादी धड़े के प्रमुख नेता थे. उनका मानना था कि संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से आजादी हासिल करनी चाहिए. उन्होंने जस्टिस तेलंग और दिनशा वाचा के साथ 1885 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना भी की.वो बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल और इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिलके सदस्य रहे. उन्होंने स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाले पुलिस बिल जैसे मुद्दों पर सरकार का कड़ा विरोध किया. ब्रिटिश सरकार ने 1904 में कानून और जनसेवा के लिए उन्हें नाइट (Sir) की उपाधि दी. 5 नवंबर 1915 को उनका निधन हो गया.
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