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शंकराचार्य की पदवी से लेकर अधिकारियों के नोटिस तक, जानें अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद कितना पुराना

प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को नोटिस जारी कर 24 घंटे में यह साबित करने को कहा है कि वो शंकराचार्य हैं. आइए हम आपको बताते हैं कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और शंकराचार्य के पद को लेकर जारी विवाद कितना पुराना है.

शंकराचार्य की पदवी से लेकर अधिकारियों के नोटिस तक, जानें अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद कितना पुराना
नई दिल्ली:

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन आमने सामने आ गए थे. मेला प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया था. इसके बाद शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हो गई थी. इससे नाराज होकर शंकराचार्य ने धरना शुरू कर दिया. उनका धरना अभी भी जारी है. शंकराचार्य इस बात पर अड़े हैं कि प्रशासन माफी मांगे. उनका कहना है कि माफी के बिना वो अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे. इस बीच एक कड़ा कदम उठाते हुए मेला प्रशासन ने सोमवार को उन्हें एक नोटिस जारी किया. इसमें उनसे 24 घंटे में यह साबित करने को कहा गया है कि वो ही शंकराचार्य हैं. इस नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक मामले का जिक्र है. आइए जानते हैं कि क्या है यह विवाद जिसका जिक्र मेला प्रशासन ने अपने नोटिस में किया है. 

माघ मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से क्या पूछा है

माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को भेजे नोटिस में पूछा है कि उन्होंने अपने नाम के आगे 'शंकराचार्य' क्यों लगाया है? मेला प्राधिकरण के नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक मामले का उल्लेख है.मेला प्रशासन का कहना है कि अभी तक इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं हुआ है, ऐसे में कोई भी धर्माचार्य ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेकित नहीं हो सकता. बावजूद इसके स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला क्षेत्र में लगे शिविर के बोर्ड पर अपने नाम के आगे  'शंकराचार्य' अंकित किया है.

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कब बने शंकराचार्य

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शंकराचार्य बनाया गया था. शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का 99 साल की आयु में लंबी बीमारी के बाद 11 सितंबर 2022 को निधन हो गया था. उन्होंने मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर के झोतेश्वर स्थित परमहंसी गंगा आश्रम में अंतिम सांस ली थी. उनको समाधि देने से पहले ही उनके उत्तराधिकारियों के नाम का ऐलान कर दिया गया था.स्वामी स्वरूपानंद की वसीयत के आधार पर उनके निजी सचिव और शिष्य सुबोद्धानंद महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ और स्वामी सदानंद को द्वारका शारदा पीठ की गद्दी सौंपी थी. यह घोषणा शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के पार्थिव शरीर के सामने की गई थी. सनातन परंपरा में इन मठों के प्रमुखों को ही शंकराचार्य कहा जाता है.

इसके बाद से ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बनाए जाने को लेकर विवाद रहा है. उसी समय संन्यासी अखाड़े ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था. उस समय निरंजनी अखाड़े के सचिव और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने दावा किया है कि अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति नियमों के खिलाफ है. उनका कहना था कि शंकराचार्य की नियुक्ति की एक प्रक्रिया होती है जिसका पालन नहीं किया गया. 

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा शंकराचार्य विवाद 

सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2022 को शंकराचार्य के रूप में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पट्टाभिषेक अभिनंदन समारोह पर रोक लगा दी थी. यह समारोह 17 सितंबर 2022 को होना था. अदालत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना के पीठ को बताया था कि गोवर्धन मठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने एक हलफनामा दायर कर ज्योतिष्पीठ पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति का समर्थन नहीं किया है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उक्‍त आदेश पार‍ित किया. सुप्रीम कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने दिवंगत शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा ज्योतिष पीठ के उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने का झूठा दावा किया था. यह मामला 2020 से शीर्ष कोर्ट में चल रहा है. इसी मामले में एक नई याचिका दायर कर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पट्टाभिषेक को रोकने की मांग की गई थी. इस याचिका में मीडिया में आई खबरों के हवाले से बताया गया था कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पट्टाभिषेक 17 अक्तूबर 2022 को होने वाला है.इस याचिका में पट्टाभिषेक समारोह को रोकने की मांग की गई थी. 

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ की गद्दी सौंपी गई थी.

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ की गद्दी सौंपी गई थी.

वहीं माघ मेला प्रशासन के नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ओर से सोशल मीडिया पर कहा गया है कि जब पट्टाभिषेक 12 सितंबर 2022 को हो चुका है तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कोई मतलब नहीं है. उनका कहना है कि जब पट्टाभिषेक हो चुका है तो दुबारा क्यों होगा. उनका दावा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का पट्टाभिषेक वसीयत या इच्छा पत्र के मुताबिक हुआ है. इस वसीयत को कोर्ट ने भी मान्यता दे दी है.

द्वारका के गोवर्धन पीठ और ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के तौर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ही काबिज रहे. द्वारका के शंकराचार्य के रूप में उनकी नियुक्ति पर तो कोई विवाद नहीं था. लेकिन बदरीकाश्रम के शंकराचार्य के रूप में स्वामी वासुदेवानंद ने उनको सुप्रीम कोर्ट तक में चुनौती दी थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी स्वरूपानंद के दावे को सही माना था. 

कौन हैं अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती  

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में ब्राह्मणपुर गांव में 15 अगस्त 1969 को हुआ था. उनके बचपन का नाम उमाशंकर उपाध्याय था. उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई भी प्रतापगढ़ में ही हुई. इसके बाद उनके पिता उनको एक बार उन्हें गुजरात ले गए. वहां उनकी मुलाकात काशी (वाराणसी) के संत रामचैतन्य से हुई. उन्होंने बेटे को वहीं छोड़ दिया. करीब पांच साल तक गुजरात में रहकर पढ़ाई करने के बाद उमाशंकर काशी पहुंचे. वहां उनकी मुलाकात स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुई. इसके बाद उन्होंने वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. साल 2000 में उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गए. इसके बाद उमाशंकर उपाध्याय का नाम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हो गया. 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं. उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव में वाराणसी से पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की कोशिश की थी. उन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव में भी वाराणसी से पीएम मोदी के खिलाफ उम्मीदवार उतारा था. आजकल वो गौरक्षा को लेकर सक्रिय हैं. 

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