कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में तय किया गया कि पार्टी के कार्यक्रमों में पहले की तरह ही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे. बैठक के बाद कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि हमारा स्टैंड साफ है. 1937 के संकल्प में महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, रविन्द्र नाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल जैसे देश के वरिष्ठ नेताओं ने जो फैसला किया, हम उसका पालन करेंगे. कांग्रेस कार्यकर्ता वैसा ही करेंगे यानी पहले दो अंतरे गाएंगे.
अक्टूबर 1937 में कोलकाता में कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में वन्दे मातरम के पहले दो अन्तरों को गाने का संकल्प पारित किया गया था. बाद में 1948 में संविधान सभा में वंदे मातरम के पहले दो अन्तरों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया. तब से आम तौर पर वंदे मातरम के दो अंतरे ही गाए जाते थे. लेकिन इस साल की शुरुआत में मोदी सरकार ने वंदे मातरम के गायन में सभी छह अंतरे अनिवार्य कर दिए.
चार दिन पहले स्वतंत्रता समारोह के दौरान कांग्रेस मुख्यालय में नए नियमों के मुताबिक ही पूरा वन्दे मातरम गाया गया. हालांकि दो अंतरों के बाद कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी गाना रोकने का इशारा करती नज़र आईं. हालांकि तब कांग्रेस ने आधारिक रूप से वंदे मातरम रोकने की कोशिश से जुड़े सवालों का खंडन करते हुए कहा था कि सोनिया गांधी खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था करने के लिए कह रही थीं. लेकिन बाद में कांग्रेस ने साफ़ किया वो आगे से परंपरा के मुताबिक़ वन्दे मातरम के दो अंतरे ही गाएगी.
इसके दो दिन बाद गोवा में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे के कार्यक्रम में वन्दे मातरम के दो अंतरे ही गाए गए. सीडब्ल्यूसी की बैठक से एक दिन पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने गोवा में साफ़ कर दिया था कि कांग्रेस अपनी 90 सालों की परंपरा के अनुसार वन्दे मातरम के पहले दो अंतरे ही गाएगी. उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर ये अपराध तो सरकार को गांधी, नेहरू और पटेल के खिलाफ भी मुकदमा करना चाहिए!
सीडब्ल्यूसी की बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस के दौरान केसी वेणुगोपाल ने भी माना कि पंद्रह अगस्त को पूरा वन्दे मातरम संवादहीनता की वजह से गाया गया. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम कांग्रेस के लिए भावनात्मक मुद्दा है जबकि बीजेपी के लिए यह एक राजनीतिक मुद्दा है. कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में छात्रों के आंदोलन, राम मंदिर चढ़ावा चोरी और चीन के कथित अतिक्रमण को लेकर प्रस्ताव पारित किए गए और मोदी सरकार पर निशाना साधा गया.
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