- सरकार स्पेशल कोर्ट बनाने पर सहमत
- सुप्रीम कोर्ट की छवि मन में भय पैदा करती है, इसे दूर करना होगा
- CJI जस्टिस सूर्यकांत ने UAPA से जुड़े मामलों की सुनवाई में देरी पर अपनी राय रखी.
CJI Surya Kant: साल 2020 के दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम समेत कई आरोपियों के खिलाफ UAPA मामलों में सुनवाई में हो रही देरी के बीच देश के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने एक इटरव्यू के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि इन गंभीर मामलों में सुनवाई जल्द पूरी होना जरूरी है. उन्होंने कहा कि साक्ष्यों का अंतिम निपटारा ही लंबे समय तक जेल में बंद कैदियों की जमानत न मिलने की शिकायतों का समाधान हो सकेगा.
'UAPA मामले पर न्यायिक स्तर पर ध्यान देने की जरूरत'
विचारधीन कैदियों के सालों तक जेल में रहने और न्यायपालिका की हो रही आलोचना के सवाल पर सीजेआई सूर्यकांत ने किसी खास मामले या आरोपी का जिक्र किए बिना कहा, 'यूएपीए एक ऐसा मामला है जिस पर न्यायिक स्तर पर ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने एक बड़ी सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि इस समस्या का एक हिस्सा एक समानांतर न्यायिक प्रक्रिया के जरिए प्रभावी ढंग से हल किया गया है, जिसके माध्यम से मैं केंद्र सरकार को यूएपीए, पीएमएलए और एनडीपीएस मामलों में सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने के लिए राजी किया है.
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'स्पेशल कोर्ट बनाने पर सहमत'
सीजेआई ने कहा कि शुरुआत हो चुकी है. सरकार स्पेशल कोर्ट बनाने पर सहमत हो गई है और काम शुरू कर दिया है. उन्होंने कहा कि यदि हम इन विशेष अदालतों के माध्यम से हम एक साल के अंदर या अत्यंत तेजी से मुकदमों को संपन्न कराने में सफल रहे तो जमानत और लंबी कैद से जुड़ा यह पूरा विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. आने वाले सालों में मुकदमों की तेजी से सुनवाई का मनचाहा नतीजा मिलेगा और इससे आरोपियों की शिकायतें दूर होंगी.
न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में अपनी चुनौतियों का जिक्र करते हुए ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, 'लंबित मामलों से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है. शनिवार को निचली अदालतों में लंबित मामलों की कुल संख्या पांच करोड़ का आंकड़ा पार कर शनिवार को 5.05 करोड़ हो गई, जिनमें से 1.1 करोड़ दीवानी और 3.9 करोड़ आपराधिक मामले थे.
सुप्रीम कोर्ट की दूसरी चुनौती
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दूसरी बड़ी चुनौती के रूप में आम आदमी और सुप्रीम कोर्ट के बीच की दूरी को कम करना है. उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की छवि आम तौर पर आम आदमी के मन में भय पैदा करती है, क्योंकि उसे आशंका रहती है कि उसका मामला बिना सुनवाई के लंबित रह सकता है या उसे पर्याप्त कानूनी सहायता नहीं मिल सकती. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के बारे में इन नकारात्मक भावनाओं को दूर किया जाना चाहिए. बार एसोसिएशन को पीठ के साथ मिलकर सक्रिय भूमिका निभानी होगी. उन्हें नेतृत्वकारी भूमिकाओं के माध्यम से लोगों तक पहुंचने की इस जिम्मेदारी को निभाना होगा.
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