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This Article is From Apr 30, 2026

35 साल से चल रहा ट्रायल, नाराज सुप्रीम कोर्ट ने की पुलिस अफसर के खिलाफ कार्यवाही रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने 35 वर्षों से लंबित आपराधिक मामले में पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई रद्द की, ट्रायल में गंभीर देरी को न्याय के खिलाफ माना. मामला 1989 का था जिसमें दंगा, मारपीट, अपमान और रेलवे अधिनियम के तहत आरोप थे, लेकिन अभियोजन पक्ष ने कोई गवाह पेश नहीं किया.

35 साल से चल रहा ट्रायल, नाराज सुप्रीम कोर्ट ने की पुलिस अफसर के खिलाफ कार्यवाही रद्द
नई दिल्‍ली:

सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद दुर्लभ और अहम फैसले में लगभग 35 वर्षों से लंबित एक आपराधिक मामले में पुलिस अधिकारी के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि ट्रायल में काफी देरी अपने आप में न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है. आखिर, इस देरी की वजह क्‍या रही?  

यह मामला वर्ष 1989 में दर्ज किया गया था, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धाराओं 147 (दंगा), 323 (मारपीट), 504 (अपमान) और रेलवे अधिनियम की धारा 120 के तहत आरोप लगाए गए थे. मामला प्रयागराज की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (रेलवे) अदालत में लंबित था. न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और उज्जल भुइयां की पीठ ने संक्षिप्त आदेश में कहा कि इतने लंबे समय तक ट्रायल में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई. अदालत ने पाया कि साढ़े तीन दशकों में अभियोजन पक्ष एक भी गवाह पेश नहीं कर सका.

याचिकाकर्ता अकेले आरोपी बचा था...

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि इस दौरान पांच आरोपियों में से दो की मृत्यु हो चुकी है, जबकि दो अन्य को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया. इस तरह याचिकाकर्ता अकेला आरोपी बचा था. अदालत ने कहा कि करीब 35 वर्षों तक मामले के लंबित रहने और किसी ठोस प्रगति के अभाव में कार्यवाही को जारी रखना न्यायोचित नहीं है. इसी आधार पर केस को रद्द करना उचित समझा गया.

वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार ने देरी के पीछे वर्ष 2000 में राज्य के विभाजन और उत्तराखंड के गठन को कारण बताया. सरकार का कहना था कि आरोपी उत्तराखंड में रह रहा था और उत्तर प्रदेश की अदालत में पेश नहीं हो रहा था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना और मामले को समाप्त करने का निर्णय लिया. इससे पहले भी अदालत ने ट्रायल पर रोक लगा दी थी. यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में देरी को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है.

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