विज्ञापन

ब्राह्मण, दलित से आदिवासी तक, सबके पूर्वज एक; BHU प्रोफेसर की DNA रिसर्च में जातियों पर बड़ा दावा

प्रोफेसर चौबे ने कहा कि यह साफ है कि हमारे यहां जो जाति व्यवस्था विकसित हुई है, वह स्थानीय स्तर पर ही है. इसे बाहर से किसी ने थोपा नहीं है.

ब्राह्मण, दलित से आदिवासी तक, सबके पूर्वज एक; BHU प्रोफेसर की DNA रिसर्च में जातियों पर बड़ा दावा
  • BHU के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे की रिसर्च में सभी भारतीय जातियों के पूर्वज एक ही पाए गए हैं
  • प्रोफेसर चौबे ने आर्य और द्रविड़ सिद्धांत को पूरी तरह भ्रामक बताते हुए जातीय विभाजन को खारिज किया है
  • वाई क्रोमोसोम अध्ययन से पता चला कि पितृत्व के आधार पर भारतीय जातियों के पूर्वज समान हैं
नई दिल्ली:

भारत में जाति व्यवस्था को लेकर अकसर बहस छिड़ी रहती है. इसके अलावा आर्य और द्रविड़ सिद्धांत की बातें भी होती रही हैं. जातीय वर्चस्व और श्रेष्ठता बोध को लेकर तो अकसर ही चिंता जताई जाती रही है. इस बीच बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे के नेतृत्व में चल रही रिसर्च ने बड़े दावे किए हैं. उनके अनुसार भारतीय समाज भले ही विभिन्न जातियों में विभाजित है, लेकिन सभी के पूर्वज एक हैं. उनका कहना है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, दलित समेत सभी जातियों के लोगों के पूर्वज एक थे. इस रिसर्च में उन्होंने 10 सालों से ज्यादा का वक्त लगाया है. हाल ही में पूर्वोत्तर भारत के लोगों पर उनकी एक रिसर्च प्रकाशित हुई है, जिसके बाद उनके शोध कार्य को लेकर चर्चाएं फिर से तेज हैं. 

उन्होंने NDTV को बताया कि भारत में उत्तर या दक्षिण या फिर आर्य और द्रविड़ के रूप में नस्लीय आधार पर बांटने वाली बातें गलत हैं. उन्होंने कहा कि आर्य और द्रविड़ वाली थ्योरी पूरी तरह से भ्रामक है. उन्होंने बताया कि वाई क्रोमोसोम के जरिए हमने देखा कि हमारे पूर्वज एक थे. उन्होंने बताया कि हम वाई क्रोमोसोम का अध्ययन कर रहे हैं, जिसके आधार पर पितृत्व तय होता है. पिता का जीन वाई क्रोमोसोम के जरिए ही आता है. प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि एक आदिवासी और क्षत्रिय की कॉमन एनसेसटरी यानी समान पूर्वज वाला संबंध डेढ़ हजार साल पुराना मिला. इसी प्रकार गुजरात के पटेल के साथ भी ऐसा ही संबंध पाया गया.

प्रोफेसर चौबे ने कहा कि यह साफ है कि हमारे यहां जो जाति व्यवस्था विकसित हुई है, वह स्थानीय स्तर पर ही है. इसे बाहर से किसी ने थोपा नहीं है. उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने जब सामाजिक- आर्थिक ताकत को हासिल कर लिया तो उन्होंने जाति तय कर ली. अन्य लोग आदिवासी रह गए. इस तरह ब्राह्मण, दलित, पिछड़ों से लेकर आदिवासी समुदाय तक के पूर्वज एक ही हैं. 

प्रोफेसर ने कहा कि हमने अब भारतीयों की मानसिकता पर भी शोध प्रारंभ किया है. उनका कहना था कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा प्रचारित 'एएनआइ' (ऐन्सेस्ट्रल नार्थ इंडियन) और 'एएसआइ' (ऐन्सेस्ट्रल साउथ इंडियन) थ्योरी असल में कभी भारत मे अस्तित्व में थी ही नहीं. भारत में ब्राह्मण से लेकर दलित तक सबके पूर्वज एक हैं. डीएनए शोध में यह सिद्ध हो चुका है.

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
India News, India News Hindi, Banaras Hindu University, Banaras Hindu University BHU, DNA Research
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com