- DRDO ने हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए स्क्रैमजेट कंबस्टर का लंबी अवधि का सफल परीक्षण किया है.
- भारत ने MIRV तकनीक वाली एडवांस अग्नि मिसाइल और लंबी दूरी की हाइपरसोनिक एंटी शिप मिसाइल का परीक्षण भी किया है.
- भारत अब अगली पीढ़ी की सैन्य तकनीक विकसित करने वाली शक्ति बन रहा है.
यह टेस्ट इसलिए बेहद अहम है क्योंकि स्क्रैमजेट इंजन ही हाइपरसोनिक मिसाइल का दिल माना जाता है. DRDO ने 1200 सेकंड तक इंजन को सफलतापूर्वक चलाकर दिखाया कि भारत अब Mach 5 से ज्यादा रफ्तार वाली मिसाइल बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.
चीन और पाकिस्तान के खिलाफ जल्द ही भारत की स्ट्राइक क्षमता और रणनीतिक ताकत कई गुना बढ़ सकती है क्योंकि भारत एक ऐसी तकनीक के टेस्ट में सफलता पा चुका है जिसके इस्तेमाल से दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को रिस्पांस देने का बहुत कम समय मिलेगा. इस टेस्ट की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें एक्टिव कूलिंग, थर्मल बैरियर कोटिंग और इंडिजिनस फ्यूल जैसी जटिल तकनीकें भारत ने खुद विकसित की हैं.
भारत ने क्या बड़ा कारनामा किया है?
दुनिया इस समय एक नए हथियारों के दौर में प्रवेश कर चुकी है. इस दौर में कोई भी युद्ध केवल टैंकों और लड़ाकू विमानों से नहीं, बल्कि स्पीड, AI, हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी और प्रिसिजन स्ट्राइक से जीते जाएंगे. इसी दौड़ में भारत ने पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई परीक्षण किए हैं जिन्होंने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है.
इसी दौरान सबसे बड़ी खबर आई DRDO के हैदराबाद स्थित DRDL लैब से, जहां भारत ने हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के लिए एक्टिवली कूल्ड फुल स्केल स्क्रैमजेट कंबस्टर का सफल लंबी अवधि का परीक्षण किया. यह परीक्षण 1200 सेकंड यानी करीब 20 मिनट तक चला. रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की सैन्य तकनीक में गेम चेंजर मान रहे हैं.
क्या हैं हाइपरसोनिक मिसाइलें और ये इतनी खतरनाक क्यों हैं?
हाइपरसोनिक मिसाइलें आवाज की गति से कम से कम पांच गुना तेज चलती हैं. यानी Mach 5 या उससे ज्यादा. कुछ भारतीय प्रोजेक्ट Mach 10 तक की स्पीड हासिल करने की दिशा में बताए जा रहे हैं. इतनी तेज गति पर दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम के पास प्रतिक्रिया देने का समय बेहद कम रह जाता है.
आज दुनिया में अमेरिका, रूस और चीन इस टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम कर रहे हैं. रूस यूक्रेन युद्ध में किंझाल मिसाइल का इस्तेमाल कर चुका है. चीन DF-17 जैसी हाइपरसोनिक प्रणालियों पर आगे बढ़ चुका है. ऐसे में भारत का इस क्लब में प्रवेश केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि रणनीतिक संदेश भी है.

स्क्रैमजेट इंजन
Photo Credit: DRDO
स्क्रैमजेट तकनीक क्यों अहम है
स्क्रैमजेट इंजन सामान्य रॉकेट इंजन से अलग होता है. यह वातावरण की ऑक्सीजन का इस्तेमाल करता है और हाई स्पीड होने के बावजूद इसके अंदर दहन लगातार बरकरार रहती है. हालांकि सबसे बड़ी चुनौती होती है- इतनी तेज रफ्तार में इंजन को पिघलने से बचाना और दहन के लौ को स्थिर रखना.
DRDO ने जिस एक्टिव कूलिंग तकनीक और थर्मल बैरियर कोटिंग का इस्तेमाल किया है, वह दिखाता है कि भारत अब केवल मिसाइल नहीं बल्कि उसके सबसे कठिन इंजन सिस्टम भी खुद विकसित कर रहा है.
इससे भारत को क्या फायदा होगा?
इससे सबसे बड़ा असर हिंद महासागर और इंडो पैसिफिक क्षेत्र में दिखाई देगा. चीन लगातार हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है. ऐसे में लंबी दूरी की हाइपरसोनिक एंटी शिप मिसाइल भारत के लिए बड़ा हथियार साबित हो सकती है.
हाल ही में DRDO ने 1500 किलोमीटर रेंज वाली लॉन्ग रेंज हाइपरसोनिक एंटी शिप मिसाइल का सफल परीक्षण भी किया. यह मिसाइल समुद्र में दुश्मन के बड़े युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर को निशाना बना सकती है.
इसका मतलब साफ है. अगर हिंद महासागर में किसी भी दुश्मन नौसेना ने दबाव बनाने की कोशिश की तो भारत अब हजारों किलोमीटर दूर से तेज और सटीक हमला करने की क्षमता की तरफ बढ़ रहा है.
अग्नि मिसाइल और MIRV तकनीकें
भारत ने हाल ही में एडवांस अग्नि मिसाइल का भी परीक्षण किया जिसमें MIRV तकनीक शामिल बताई गई. MIRV यानी मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल रिन्ट्रा व्हिकल. इसका मतलब ये है कि अब एक मिसाइल कई अलग अलग लक्ष्यों को निशाना बना सकती है.
यह तकनीक भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को कई गुना बढ़ा देती है. क्योंकि दुश्मन के लिए ऐसी मिसाइल को रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है.
रणनीतिक तौर पर देखें तो यह चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए बड़ा संदेश है. खासकर चीन इसलिए क्योंकि उसके पास पहले से MIRV क्षमता मौजूद है और अब भारत भी उसी स्तर की तकनीकी क्षमता की तरफ बढ़ रहा है.

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आत्मनिर्भर भारत- स्वदेशी तकनीक
इन परीक्षणों का सबसे अहम पहलू यह है कि इनमें बड़ी मात्रा में स्वदेशी तकनीक और भारतीय उद्योग की भागीदारी रही. डीआरडीओ ने विश्वविद्यालयों, निजी कंपनियों और घरेलू इंडस्ट्री पार्टनर्स के साथ मिलकर यह तकनीक विकसित की है.
यह वही बदलाव है जिसकी चर्चा वर्षों से होती रही. पहले भारत दुनिया से हथियार खरीदता था. अब भारत खुद अगली पीढ़ी की सैन्य तकनीक बनाने की दिशा में बढ़ रहा है.
आने वाले समय में क्या बदल जाएगा?
रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि अगले 10 सालों में युद्ध का चेहरा पूरी तरह बदल जाएगा. ड्रोन स्वॉर्म, AI आधारित टारगेटिंग, हाइपरसोनिक हथियार और स्पेस बेस्ड सर्विलांस सबसे बड़े हथियार होंगे.
भारत के हालिया परीक्षण यही संकेत देते हैं कि नई दिल्ली भविष्य के युद्धों के लिए खुद को तैयार रख रहा है. शायद यही सबसे बड़ा बदलाव है. क्योंकि अब भारत केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करने वाला देश नहीं बल्कि तकनीकी सैन्य शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.
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