- भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत को मजबूत किया है
- सिख समुदाय को आगे बैठाना पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी का संकेत माना जा रहा है
- पंजाब में भाजपा के लिए चुनौतियां धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों से बंगाल की तुलना में अधिक जटिल हैं
भारतीय जनता पार्टी की इस वक्त खुशी का ठिकाना नहीं है. पार्टी के लोगों के लिए मानो समय रहते होली-दिवाली आ गई हो. वजह साफ है 4 मई को आए 5 विधानसभा चुनाव के नतीजे. भारतीय जनता पार्टी के लिए पश्चिम बंगाल की फतह सबसे बड़ी रही जहां पहली बार पार्टी की जीत का कमल खिला है. पश्चिम बंगाल भाजपा का वो सपना रहा है जिसे उसने 2016,2021 और 2026 में और मजबूती से लड़ा है. 2006 से पहले भी कोशिशें हुईं लेकिन 2014 के बाद पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने इसपर विशेष फोकस किया और अब नतीजा सामने है. बीजेपी कभी थकती नहीं है, और एक नतीजे के बाद दूसरे की तैयारियों में लग जाती है. पीएम मोदी के बंगाल, असम की खास विजय के दौरान दर्शक दीर्घा की आगे की कतार में सिख समुदाय का जोश बता रहा था कि भारतीय जनता पार्टी ने अब पंजाब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी कर ली है. आइए आपको पूरी बात समझाते हैं.
इस एक वीडियो में छिपा है खास संदेश
बंगाल,असम सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे का तेज पीएम मोदी और उनके साथ बैठे मंत्रियों के चेहरे पर साफ दिख रहा था. पीएम मोदी मंच पर थे और सामने लोगों का हुजूम,लेकिन दिल्ली के बीजेपी मुख्यालय में मोदी के संबोधन से पहले कुछ ऐसा दिखा जिसने राजनीतिक पंडितों को एक इशारा दे दिया और वो था आगे की कतार में सिख समुदाय की उपस्थिति. मोदी के आने से पहले सभी जो बोले सो निहाल सत श्री आकाल के नारे लगाते दिखे. सिख समुदाय को आगे की कतार में बैठाना महज इत्तेफाक मात्र नहीं था बल्कि इसके पीछे असली संदेश 2027 पंजाब चुनाव था.
इस वीडियो में अगले बड़े राजनितिक बदलाव का हिंट है। pic.twitter.com/5Gat4bf5xI
— Aishwarya Paliwal (@AishPaliwal) May 4, 2026
पंजाब जीतना बीजेपी का टार्गेट
पश्चिम बंगाल से 15 साल बाद टीएमसी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के बाद भारतीय जनता पार्टी अब पंजाब की ओर नजर गड़ा चुकी है. 2027 में वहां चुनाव है. सत्ता में आम आदमी पार्टी है जिसके मुखिया भगवंत मान हैं. बीजेपी की दाल वहां नहीं गलती. इसका ये मतलब नहीं कि पार्टी ने वहां तन-मन से मेहनत नहीं की पर नतीजे हमेशा निराशाजनक ही रहे. बीजेपी के पास इस वक्त राघव चड्ढा के रूप में मजबूत नेता हाथ लगा है जो खुद आम आदमी पार्टी की ओर से पंजाब प्रभारी थे. हालांकि भाजपा के लिए यहां की लड़ाई आसान नहीं है.
पंजाब में पिछले दो चुनावों के नतीजे
2022 विधानसभा चुनाव नतीजे
➔आम आदमी पार्टी- 92
➔कांग्रेस-18
➔शिरोमणि अकाली दल-3
➔बीजेपी-2
➔बसपा-1
2017 विधानसभा चुनाव नतीजे
➔कुल सीटें: 117
➔भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC): 77 सीटें
➔आम आदमी पार्टी (AAP): 20 सीटें (गठबंधन सहयोगियों के साथ)
➔शिरोमणि अकाली दल (SAD): 15 सीटें
➔भारतीय जनता पार्टी (BJP): 3 सीटें
क्यों मुश्किल है पंजाब फतह?
पंजाब में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए राह बंगाल जैसी आसान नहीं होने के कई गहरे राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक कारण हैं. हालांकि बीजेपी ने 2026 में बंगाल में अपनी पहली जीत दर्ज की है, लेकिन पंजाब की चुनौतियां पूरी तरह अलग और अधिक जटिल हैं:
1. धार्मिक और सामाजिक संरचना (Demographic Barriers)सिख बहुल राज्य: पंजाब भारत का एकमात्र सिख बहुल राज्य है.बंगाल में बीजेपी ने 'हिंदू ध्रुवीकरण' (Hindu Consolidation) के जरिए अपनी जगह बनाई, जो पंजाब में संभव नहीं है क्योंकि वहां हिंदुत्व कार्ड का जादू नहीं चलता.
पंथिक राजनीति: पंजाब की राजनीति में 'पंथिक' (सिख धार्मिक) पहचान बहुत मजबूत है. बीजेपी की छवि वहां अभी भी एक 'शहरी हिंदू पार्टी' की है, जिससे वह ग्रामीण और सिख वोट बैंक में पैठ नहीं बना पा रही है
2. ग्रामीण आधार और किसान आंदोलन (Rural Base & Farmer Protests)किसानों की नाराजगी: तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के बाद हुए आंदोलन ने बीजेपी और ग्रामीण पंजाब के बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी है.शहरी बनाम ग्रामीण: बीजेपी पारंपरिक रूप से पंजाब के शहरी इलाकों तक सीमित रही है. बंगाल में पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार किया, लेकिन पंजाब के गांवों में उसका प्रवेश अभी भी एक बड़ी चुनौती है.
3. मजबूत क्षेत्रीय विकल्प (Presence of Strong Rivals)बहुकोणीय मुकाबला: बंगाल में मुख्य मुकाबला बीजेपी और टीएमसी के बीच सिमट गया था.पंजाब में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप) और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) जैसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी मौजूद हैं.
अकाली दल से अलगाव: लंबे समय तक अकाली दल का 'छोटा भाई' रहने के कारण बीजेपी का अपना स्वतंत्र संगठनात्मक ढांचा पंजाब में काफी कमजोर है.बंगाल में उसने अपना ढांचा शून्य से खड़ा किया, लेकिन पंजाब में वह अकाली दल की मशीनरी पर निर्भर थी.
4. क्षेत्रीय अस्मिता बनाम केंद्रीय विमर्श (Regional Identity)पंजाब की स्वायत्तता: पंजाब हमेशा से राष्ट्रीय लहर के विपरीत (Contrarian) वोट करने के लिए जाना जाता है.बंगाल में भी 'बंगाली अस्मिता' का मुद्दा था, लेकिन बीजेपी वहां उसे काटने में सफल रही.पंजाब में भाषाई और धार्मिक पहचान का मिश्रण इसे अधिक कठिन बनाता है.
5. नेतृत्व का अभाव (Lack of Local Face): पंजाब में बीजेपी के पास ऐसा कोई बड़ा स्थानीय सिख चेहरा नहीं है जो मास लीडर (Mass Leader) हो.हालांकि पार्टी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़ और रवनीत सिंह बिट्टू जैसे नेताओं को शामिल किया है, लेकिन ये नेता अन्य पार्टियों से आए हैं, जिससे कैडर के बीच सामंजस्य की कमी देखी जा रही है.
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