नेता समय के मुताबिक अपने निर्वाचन क्षेत्र के साथ संबंध स्थापित करते रहते हैं. कोई भी नेता जब किसी क्षेत्र से बार-बार चुनाव लड़ता है, तो उसके और उस क्षेत्र के बीच एक मजबूत और स्थायी रिश्ता बन जाता है. उदाहरण के लिए, अमेठी और रायबरेली का गांधी परिवार—जिसमें इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी शामिल हैं, से समय के साथ गहरा राजनीतिक जुड़ाव बन गया. हालांकि,अमेठी में बीजेपी की स्मृति ईरानी की राहुल गांधी पर जीत एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई. इसने इस लंबे संबंध को चुनौती दी और बदल दिया.
सिद्धार्थ शंकर रे 1957 में पहली बार भवानीपुर से विधायक चुने गए थे. बाद में उन्होंने दार्जिलिंग और मालदा से भी चुनाव लड़ा, लेकिन भवानीपुर उनके नाम से जुड़ा रहा. इसके बाद ममता बनर्जी ने भवानीपुर में एक अलग बंगाली नेतृत्व की पहचान बनाई. यहां से चुनाव लड़ने के लिए बंगाली अभिजात्य वर्ग में स्वीकार्यता और सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव होना लगभग जरूरी माना जाने लगा.
कोलकाता का भद्रलोक
ममता बनर्जी न केवल भवानीपुर की विधायक रहीं, बल्कि दक्षिण कोलकाता से लंबे समय तक सांसद भी रहीं. भवानीपुर सीट इसी लोकसभा क्षेत्र में आती है. यह क्षेत्र उनके ऐतिहासिक राजनीतिक आधार के रूप में देखा जाता है. अब भवानीपुर और नंदीग्राम के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है. दक्षिण कोलकाता का अभिजात्य वर्ग शहरी और बहुसांस्कृतिक भवानीपुर से जुड़ा है, जबकि नंदीग्राम पूर्व मेदिनीपुर का ग्रामीण इलाका है, जहां किसान, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और वंचित समुदायों की बहुलता है. यहां मध्यम वर्गीय अभिजात्य वर्ग की तुलना में गरीब और खेती करने वाले लोग अधिक हैं.

मुख्यमंत्री बनने के बाद तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने शहरी मतदाताओं में भी अपनी पकड़ मजबूत की है.
सुवेंदु अधिकारी का नंदीग्राम से गहरा जुड़ाव है. मेदिनीपुर से होने के कारण उनकी छवि एक ग्रामीण नेता की बनी है. उनके व्यक्तित्व में शहरी से अधिक ग्रामीण विशेषताएं दिखाई देती हैं. यही भवानीपुर और नंदीग्राम के बीच मुख्य अंतर है.हालांकि, भवानीपुर अपनी विविधता के कारण अधिक रोचक है. यहां गैर-बंगाली मतदाताओं का बड़ा हिस्सा है, जिनमें गुजराती, मराठी, मारवाड़ी, बिहारी आदि समुदाय शामिल हैं. यहां कई पुराने गुरुद्वारे भी हैं, जिनसे लंबे समय से जुड़े मतदाता हैं. ममता बनर्जी नियमित रूप से इन गुरुद्वारों में जाती हैं. गैर-बंगाली समुदायों के साथ भी उनका मजबूत संबंध है. भवानीपुर में पारंपरिक बंगाली इलाकों के साथ-साथ अलीपुर जैसे समृद्ध इलाके और बालीगंज जैसे इलाके भी शामिल हैं.
भवानीपुर और ममता बनर्जी का साथ
इस तरह भवानीपुर एक कॉस्मोपॉलिटन और पूरी तरह शहरी चरित्र वाला विधानसभा क्षेत्र है. किसी मुख्यमंत्री के लिए पूरे बंगाल में नेतृत्व स्थापित करने में शहरी छवि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीएम) सत्ता में थी, तब कोलकाता में कांग्रेस को ज्यादा समर्थन मिलता था, जबकि ग्रामीण इलाकों में सीपीएम का दबदबा था. बाद में ममता बनर्जी ग्रामीण और वंचित वर्गों के समर्थन से सत्ता में आईं, लेकिन बुद्धदेव भट्टाचार्य के समय सीपीएम ने शहरी वोट बैंक भी मजबूत किया था. अंततः ममता बनर्जी ने कोलकाता के शहरी वोट बैंक को भी अपने पक्ष में कर लिया. वोट बैंक में इस तरह से बदलाव होता है.
नंदीग्राम ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र रहा है, 1901 में ब्रितानी सामान के बहिष्कार से लेकर 1921 के खिलाफत और असहयोग आंदोलन और 1946 के तेभागा आंदोलन तक. इस क्षेत्र में खासकर बांग्लादेश से प्रवास भी हुआ है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां 65.82 फीसद हिंदू और 34.04 फीसदी मुस्लिम आबादी है. पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 1951 के 19.85 फीसदी से बढ़कर 2011 में 27 फीसदी हो गई. इसमें नंदीग्राम की हिस्सेदारी भी शामिल है.

नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराने वाले सुवेंदु अधिकारी को आमतौैर पर ग्रामीण इलाके का नेता माना जाता है. कोलकाता के भवानीपुर में ममता के खिलाफ चुनाव लड़कर वो अपनी इस छवि को तोड़ना चाहते हैं.
नंदीग्राम में सुवेंदु और ममता को कितने वोट मिले थे
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में, सुवेंदु अधिकारी (बीजेपी) ने नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को 1,956 वोटों के अंतर से हराया था. सुवेंदु अधिकारी को एक लाख 10 हजार 764 वोट मिले थे, जबकि ममता बनर्जी ने एक लाख आठ हजार 808 वोट हासिल किया था.
अब नंदीग्राम और भवानीपुर दो बिल्कुल अलग तरह के चुनाव क्षेत्र बन चुके हैं. सुवेंदु अधिकारी दोनों जगह से चुनाव लड़कर खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. ग्रामीण नेता होने के बावजूद, वे मीडिया के जरिए शहरी छवि भी बनाने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि कोलकाता की सीट अधिक दृश्यता देती है. इस तरह नंदीग्राम से भवानीपुर तक का उनका सफर एक नई और दिलचस्प राजनीतिक दिशा को दर्शाता है.
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