भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने कहा है कि किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में प्रभावी पुलिसिंग तीन महत्वपूर्ण स्तंभों पर टिकी होती है. ये स्तंभ हैं ड्यूटी, विवेक और जनविश्वास. उन्होंने कहा कि कानून पुलिस अधिकारियों को अधिकार देता है, लेकिन उन अधिकारों को जनता की सेवा में बदलने के लिए अनुशासन, तैयारी और पेशेवर ईमानदारी जरूरी है.
मुख्य न्यायाधीश नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ओ. पी. मिश्रा की पुस्तक ‘Beyond the Uniform: Duty, Discretion & Public Trust' के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक किसी बाहरी व्यक्ति की टिप्पणी नहीं बल्कि 36 वर्षों तक पुलिस सेवा में रहे अधिकारी के अनुभवों, चुनौतियों और विचारों का सार है.
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‘ड्यूटी सिर्फ कानून का पालन करना नहीं'
सूर्य कांत ने कहा, "भारत कानून के शासन के लिए प्रतिबद्ध देश है. इसलिए ड्यूटी का अर्थ केवल कानून के शब्दों और वैध आदेशों का पालन करना नहीं, बल्कि उस उद्देश्य के प्रति भी निष्ठा रखना है जिसके लिए पुलिस अधिकारी को अधिकार दिया गया है."
उन्होंने कहा, "जांच, गिरफ्तारी, आवाजाही को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियां पद की सजावट नहीं हैं, बल्कि जनता की ओर से सौंपी गई जिम्मेदारियां हैं." CJI ने कहा कि पुलिस का काम केवल अपराध होने के बाद शुरू नहीं होता. तैयारी करना, सूचना जुटाना, एजेंसियों के बीच तालमेल बनाना और संभावित खतरों को पहले पहचानना भी पुलिसिंग का अहम हिस्सा है.
BRICS सम्मेलन का दिया उदाहरण
हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन का उदाहरण देते हुए सूर्य कांत ने कहा, "ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की सफलता के पीछे पुलिस का पर्दे के पीछे किया गया काम महत्वपूर्ण होता है." उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था, ट्रैफिक प्रबंधन, विदेशी प्रतिनिधियों की सुरक्षा और चौबीसों घंटे सतर्कता जैसे कार्य पुलिस की अहम जिम्मेदारियां हैं. कई बार सबसे अच्छी पुलिसिंग वही होती है, जो किसी संकट को पैदा होने से पहले ही रोक दे.
‘विवेक का मतलब नियमों की अनदेखी नहीं'
CJI ने पुलिस के विवेकाधिकार की भूमिका पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा, "कानून सामान्य परिस्थितियों के लिए नियम तय करता है, लेकिन इंसानी जिंदगी हमेशा इतनी व्यवस्थित नहीं होती."
उन्होंने कहा कि कई परिस्थितियों में अधिकारी को मानवीय संवेदनाओं और कानूनी दायित्वों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है. एक ही शक्ति का इस्तेमाल जल्दबाजी या समझदारी दोनों तरीकों से किया जा सकता है. सूर्य कांत ने स्पष्ट कहा, "विवेकाधिकार का मतलब ड्यूटी से छूट या नियमों की अनदेखी करने की स्वतंत्रता नहीं है. सही अर्थों में विवेक वह बिंदु है जहां ड्यूटी का रूप न्याय में बदलता है."
पुलिस और अदालतें न्याय की एक ही श्रृंखला
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पुलिस और अदालतें न्याय व्यवस्था की एक ही कड़ी हैं. उन्होंने कहा, "सावधानी से दर्ज की गई FIR और निष्पक्ष जांच अदालत में न्याय होने की संभावना को मजबूत करती है." उन्होंने कहा कि अगर जांच और प्रक्रिया की शुरुआती कड़ी कमजोर पड़ जाए तो बाद में न्यायालयों के लिए स्थिति को पूरी तरह सुधारना मुश्किल हो जाता है.
‘जनविश्वास पुलिस की सबसे बड़ी ताकत'
सूर्य कांत ने कहा, "जनविश्वास केवल पुलिस की छवि का सवाल नहीं है. यह पुलिस के आचरण से अर्जित होता है और एक बार हासिल होने पर पुलिस बल की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बन जाता है." उन्होंने कहा कि जब नागरिकों को पुलिस पर भरोसा होता है तो वे जानकारी साझा करने और शांति बनाए रखने में अधिक सहयोग करते हैं.
पुलिसकर्मियों के बेहतर माहौल पर भी जोर
CJI ने कहा कि समाज यदि पुलिस से हर समय साहस, संयम और संवेदनशीलता की अपेक्षा करता है तो पुलिसकर्मियों को भी बेहतर प्रशिक्षण, आधुनिक संसाधन, जिम्मेदार नेतृत्व और बेहतर कार्य परिस्थितियां मिलनी चाहिए.
उन्होंने ओ. पी. मिश्रा को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने 36 वर्षों की सेवा के अनुभव को पुस्तक के रूप में नई पीढ़ी के सामने रखा है. यह पुस्तक केवल पुलिस अधिकारियों के लिए ही नहीं बल्कि छात्रों, युवा पेशेवरों और आम नागरिकों के लिए भी उपयोगी साबित होगी.
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