Begusarai Murder Case News: बिहार के बेगूसराय से न्यायपालिका से 'देर है पर अंधेर नहीं' की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने 38 साल पुराने घावों पर मरहम लगाने का काम किया है. साल 1988 में डंडारी थाना क्षेत्र के प्रतारपुर गांव में हुए जघन्य तिहरे हत्याकांड ने पूरे इलाके को दहला के रख दिया था. उसमें दशकों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-3 बृजेश कुमार सिंह की अदालत ने 12 दोषियों को सजा सुनाकर पीड़ित परिवार के लंबे इंतजार को खत्म किया है.
क्या था 1988 का वो खूनी संघर्ष?
घटना 10 अगस्त 1988 की सुबह करीब 7 बजे की है। पुरानी रंजिश को लेकर प्रतारपुर गांव में हथियारों से लैस हमलावरों ने तांडव मचाया था. इस हमले में महावीर यादव, राम पदारथ यादव और निरंजन यादव की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. हमलावरों ने न केवल गोलियां बरसाईं, बल्कि पीड़ित परिवार के घर को आग के हवाले कर दिया था.इस नरसंहार में दो महिलाएं भी गंभीर रूप से घायल हुई थीं. मृतक महावीर यादव के बेटे सुरेंद्र यादव ने इस मामले में 26 नामजद आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी.
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38 साल का लंबा सफर, 12 आरोपियों की हो गई मौत
न्याय की यह डगर इतनी लंबी रही कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही 26 आरोपियों में से 12 की मृत्यु हो गई. फैसले के दिन तक केवल 14 आरोपी ही जीवित बचे थे. अभियोजन पक्ष ने मजबूती से पैरवी करते हुए 12 गवाहों को पेश किया, जिनकी गवाही ने दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने में मुख्य भूमिका निभाई. यह मामला अपनी जटिलता के कारण 38 वर्षों में 10 अलग-अलग अदालतों से होकर गुजरा था.
सजा का ऐलान, किसे क्या मिला
अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर 14 में से 12 आरोपियों को दोषी पाया, जबकि 2 को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया . लाल बहादुर यादव, विनय यादव, गणेश यादव, जनार्दन यादव और कलमी यादव को धारा 302 के तहत उम्रकैद और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई. जबकि रामदेव यादव और ध्यानी यादव को 7 साल के सश्रम कारावास की सजा मिली. वहीं, गरीब दास यादव, अंगद यादव, जोगी यादव, रामचंद्र यादव और रफू यादव को डेढ़ साल की कैद और जुर्माने की सजा सुनाई गई.
'मेरे लिए यह धर्मयुद्ध था' - सरकारी वकील
इस मामले में सरकार की ओर से पैरवी कर रहे अपर लोक अभियोजक राम प्रकाश यादव फैसले के बाग बेहद भावुक नजर आए. उन्होंने इस केस की तुलना 'महाभारत' से करते हुए कहा कि यह मेरे लिए किसी धर्मयुद्ध से कम नहीं था. जैसे अर्जुन को अपनों के खिलाफ शस्त्र उठाने पड़े थे, मुझे अपने ही ग्रामीणों के खिलाफ सबूत पेश करने थे, जो कठिन था, लेकिन कर्तव्य सर्वोपरि है.10 अदालतों के चक्कर काटने के बाद आज सत्य की जीत हुई है.
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