Bashir Badr Passed Away: उर्दू जुबां के मशहूर शायर बशीर बद्र जी का 91 साल की उम्र में निधन है. नई उर्दू गजल के बेताज शायर माने जाने वाले बशीर बद्र जी अपने पीछे एक से बढ़कर एक ऐसे शेर छोड़ गए हैं जो मुद्दतों तक हम अपनी जुबां पर दोहराते रहेंगे. बशीर साहब तरन्नुम में क्या खूब गाते थे. कई लोगों का मानना है गालिब के बाद उर्दू न जानने वाले लोगों में भी सबसे ज्यादा मशहूर और लोकप्रिय शायर बशीर बद्र ही रहे हैं. यहां हम आपके लिए बशीर बद्र जी के कुछ सबसे मशहूर शेर लेकर आए हैं.
बशीर बद्र जी के चंद मशहूर शेर
1- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
2- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
3- न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
4- कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
5- ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है
6- कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
7- हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
8- मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ
9- पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
10- सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा
11- यहां लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे
12- तुम्हें जरूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आंखें हमारी कहां से लाएगा
13- मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
14- ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुम ने मिरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा
15- शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
16- घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
17- सात संदूकों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इंसां को मोहब्बत की जरूरत है बहुत
18- अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा
19- चरागों को आंखों में महफूज रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
20- आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
21- बे-वक़्त अगर जाऊंगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा
22- मोहब्बत अदावत वफ़ा बे-रुख़ी
किराए के घर थे बदलते रहे
23- ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
24- वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का
रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुश्बू
25- मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहां होगा
परिंदा आसमां छूने में जब नाकाम हो जाए
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