यह बात साल 1994 के सर्दियों की है. 'पाकीज़ा' जैसी कालजयी फिल्म बनाने वाले कमाल अमरोही के शहर अमरोहा में एक बड़े मुशायरे का आयोजन हो रहा था. देश के कई नामचीन फनकार अदब के इस ऐतिहासिक शहर में जुटे थे. उन्हीं में एक बेहद अज़ीम शायर भी वहां आने वाले थे. किसी वजह से उन्हें मंच पर पहुंचने में थोड़ी देर हो गई, तो सामने बैठी बेताब भीड़ शोर-शराबा करने लगी. आयोजक सोच में पड़ गए थे कि क्या अदब के इस शहर अमरोहा में आज कोई बेअदबी होने वाली है? वे इसी उधेड़बुन में थे कि तभी उन बुजुर्ग शायर ने मंच संभाला और माइक पर अपनी गज़ल के ये मिसरे पढ़े:
'कोई कांटा चुभा नहीं होता, दिल अगर फूल सा नहीं होता.
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफ़ा नहीं होता.'
उनकी आवाज़ में वो मखमली शोखी और कहने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि पल भर में पूरा शामियाना 'वाह-वाह' के शोर से गूंज उठा. शोर मचाती भीड़ पल भर में सलीके से बैठ गई. हुड़दंग को एक झटके में अनुशासन में बदल देने वाला यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि बशीर बद्र थे. उन्होंने उस शाम अपनी जादुई मौजूदगी से बता दिया था कि शायरी भारी-भरकम उर्दू या फारसी के मुहावरों की मोहताज नहीं होती, बल्कि आम इंसान की रोजमर्रा की जुबान में भी गहरी बात कही जा सकती है और लोग उसे पसंद भी करते हैं. अमरोहा के उस मुशायरे की वो जादुई शाम बशीर बद्र के पूरे जीवन का एक छोटा सा अक्स भर थी. असल में बशीर साहब की पूरी जिंदगी ही इसी तरह के विरोधाभासों, संघर्षों और एक मखमली बगावत से बुनी गई थी. वे उर्दू अदब के उन गिने-चुने चिरागों में से थे, जिन्होंने गजल की रवायत को बदला भी और उसे आम आदमी के बेहद करीब भी ले आए.
अलीगढ़ से शुरू हुई मखमली बगावत
बशीर बद्र का सफर साल 1965 के आस-पास अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कैंपस से एक प्रोफ़ेसर के रूप में परवान चढ़ा. उस दौर में उर्दू अदब पर पारंपरिक सोच का कड़ा पहरा था.ऐसे माहौल में बशीर साहब एक मशहूर बात कही थी- शायरी को महलों की दासी बने रहने के बजाय उस आम आदमी की जुबान बनना होगा जो सुबह लोकल ट्रेन पकड़कर दफ्तर जाता है.रूढ़िवादी गलियारों में इसे उर्दू की तहजीब को 'हल्का' करने वाली बात मानी गई. लेकिन बशीर साहब कहां मानने वाले थे. उन्होंने अपनी पीएचडी की थिसिस 'आजादी के बाद उर्दू गजल का तनकीदी मुताला' लिखकर साबित कर दिया कि उर्दू शायरी को अगर लंबी उम्र जीनी है, तो उसे आम बोलचाल की 'हिंदुस्तानी' भाषा को अपनानी ही होगी.
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में...
बशीर साहब सिर्फ एक उम्दा शायर नहीं थे, वे इतिहास और अदब को सहेजने वाले एक बेहद सलीकेदार इंसान थे. मेरठ में उनके घर में मीर, गालिब और इकबाल के दौर की ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियां थीं, जो दुनिया में कहीं मिलना मुश्किल थीं. सबसे बड़ा नुकसान यह था कि बशीर साहब की खुद की लिखी हुई ऐसी सैकड़ों गजलें और नज्में वहां मौजूद थीं जो कभी छपी ही नहीं थीं, सिर्फ उनके निजी कागजों पर दर्ज थीं.साल 1987 में मेरठ में हुए भीषण दंगों के दौरान दंगाइयों ने उनके इस आशियाने को आग के हवाले कर दिया. बशीर साहब अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सिर्फ अपनी जान बचाकर वहां से भाग पाए. जब वे लौटे, तो वहां काली राख बची थी. कहते हैं कि वे घंटों उस मलबे के सामने चुपचाप बैठे रहे. उनका वो मशहूर शेर—
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में'
इसी हादसे के बाद उपजी हुई दार्शनिक सोच थी. इस सदमे ने उन्हें भीतर से इतना अकेला कर दिया कि उन्होंने हमेशा के लिए उत्तर प्रदेश छोड़ दिया और भोपाल आकर पूरी तरह अंतर्मुखी हो गए.
आम शब्दों को दी अपनी नज्म में जगह
बशीर साहब ने गजल में उन चीजों को एंट्री दी, जिनकी कल्पना भी उस दौर के पारखी नहीं कर सकते थे. उन्होंने गजल में 'डायरी', 'चिट्ठी', 'ट्रेन की खिड़की', 'छतरी', 'लिफाफा' और 'सिगरेट के धुएं' को जगह दी.वे मानते थे कि अगर कोई आम इंसान अपनी प्रेमिका को याद करते हुए खत लिख रहा है, तो वह 'हिज्र' या 'फिराक' जैसे भारी शब्द नहीं सोचेगा, वह बस उदास होगा. बशीर साहब ने इंसानी रिश्तों के उस बारीक मनोविज्ञान को पकड़ा जिसे लोग अक्सर छोड़ देते थे. उनका यह शेर जिंदगी जीने और कूटनीति का सबसे बड़ा व्यावहारिक फलसफा है, जिसे उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कह दिया था:
'दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों.'
अल्जाइमर का क्रूर मजाक
जिस शख्स ने दुनिया को 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो' जैसा कालजयी शेर दिया, जिंदगी के आखिरी पड़ाव में समय ने सबसे पहले उसकी यादें ही छीन लीं. भोपाल के एक शांत कोने में रहते हुए बशीर साहब अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) के उस मुकाम पर पहुंच गए थे, जहां वे कमरे में बैठी अपनी पत्नी अलका बद्र को देखकर पूछते थे कि "आप कौन हैं?"आखिरी दिनों में जब कभी उनके सामने कोई उनका ही पुराना शेर पढ़ता था, तो वे बच्चों की तरह ताली बजाकर कहते थे, "वाह! कितना उम्दा शेर है, किसने लिखा है?" बशीर बद्र का इस दुनिया से रुखसत होना सिर्फ एक महान फनकार का जाना नहीं है, बल्कि उर्दू गजल के उस स्वर्ण युग का पूरी तरह से खामोश हो जाना है, जिसने शायरी को मखमली मिजाज और आम आदमी की धड़कन बनाया था. आज भले ही बशीर साहब हमारे बीच नहीं रहे और उनकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं, लेकिन जब भी यह दुनिया मोहब्बत और बिछड़ने के दर्द को बयां करना चाहेगी, उनके लिखे अलफाज हमेशा जिंदा रहेंगे. चलते-चलते उनका यही शेर जेहन में कौंध जाता है:
'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए.'
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