- बालगंगा डैम सिंचाई घोटाले में ठाणे की अदालत ने ट्रायल जज को अचानक बदलने का प्रशासनिक आदेश जारी किया है.
- इस घोटाले की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो ने की थी जिसमें 92 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे.
- आरोपी निसार खत्री की जज बदलने की याचिका दिसंबर 2025 में खारिज कर दी गई थी और उस पर जुर्माना भी लगाया गया था.
महाराष्ट्र के बहुचर्चित बालगंगा डैम सिंचाई घोटाले में एक बार फिर हलचल मच गई है. ठाणे की अदालत में चल रहे इस आपराधिक मामले को अचानक एक जज से दूसरे जज को सौंपे जाने के ताजा प्रशासनिक आदेश ने न केवल कानूनी हलकों बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है. हैरानी इस बात की है कि कुछ ही सप्ताह पहले इसी केस में ट्रायल जज को बदलने की मांग को अदालत ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था. ऐसे में यह तबादला कई तरह के सवालों को हवा दे रहा है.
क्या है बालगंगा डैम घोटाला?
इस मामले की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने की थी. वर्ष 2016 में ACB ने लगभग 30,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की, जिसमें ठेकेदार निसार खत्री और कोंकण सिंचाई विकास महामंडल से जुड़े कई सरकारी अधिकारियों पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए. जांच के अनुसार, कथित भ्रष्टाचार के चलते राज्य के खजाने को 92 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ.
इतने बड़े घोटाले के बावजूद मामला वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. न आरोप तय हुए, न ट्रायल आगे बढ़ा. लंबे इंतजार के बाद 2025 में विशेष न्यायाधीश जी. टी. पवार ने सभी आरोपियों पर आरोप तय किए और मामले की औपचारिक सुनवाई शुरू की. इससे यह उम्मीद जगी थी कि अब केस गति पकड़ लेगा.
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ट्रांसफर अर्जी खारिज… फिर भी जज बदले!
दिसंबर 2025 में आरोपी निसार खत्री ने प्रधान जिला न्यायाधीश, ठाणे के समक्ष आवेदन देकर केस को जज पवार से हटाने की मांग की थी. लेकिन जज एस. बी. अग्रवाल ने अर्जी को बेबुनियाद करार देते हुए इसे खारिज कर दिया और खत्री पर 20,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया.
इसके बावजूद अब एक प्रशासनिक आदेश के तहत यह मामला जज जी. टी. पवार से हटाकर न्यायाधीश दुर्गाप्रसाद देशपांडे को सौंप दिया गया है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही प्रशासनिक तबादले सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हों, लेकिन किसी केस में ट्रांसफर की याचिका को न्यायिक स्तर पर ठुकराए जाने के बाद अचानक जज बदल जाना संदेह पैदा करना स्वाभाविक है.
हाईकोर्ट के आदेश ने भी बढ़ाई चर्चा
विवाद को और बल अक्टूबर 2025 के उस आदेश से मिला, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट ने निसार खत्री को बालगंगा डैम मामले में 303 करोड़ रुपये देने का आदेश दिया था. राज्य सरकार ने इस फैसले को न तो चुनौती दी, न ही आगे बढ़ाया. यही वजह है कि कानूनी और राजनीतिक हलकों में इसे लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं.
राजनीतिक तूल भी गहरा
यह घोटाला पहले भी महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा मुद्दा रहा है. तत्कालीन विपक्ष के नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे कभी बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार का प्रतीक बताते हुए कांग्रेस‑एनसीपी सरकार पर जमकर आरोप लगाए थे. अब जब केस ट्रायल के महत्वपूर्ण चरण में है, ऐसे में अचानक जज बदलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रश्नों को भी जन्म देता है.
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अब आगे क्या?
करोड़ों रुपये के आरोपों से जुड़े इस मामले का ट्रायल फिलहाल ठाणे की अदालत में लंबित है. कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रायल जज को बदलने की याचिका हाल ही में खारिज हुई, उसके तुरंत बाद प्रशासनिक आदेश से जज बदल दिया गया और हाईकोर्ट के 303 करोड़ रुपये वाले आदेश पर भी सरकार की चुप्पी बनी रही.
इन सब कारणों से यह मामला फिर से सुर्खियों में है और आने वाले दिनों में कानूनी, राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर बहस तेज होना तय है.
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