भारत की आजादी की लड़ाई में कई जननायकों का अहम योगदान रहा. ये ऐसे नायक थे, जो अलग-अलग धर्मों और अलग-अलग प्रांतों से आते थे, लेकिन सभी के मन में स्वराज की भावना थी. देश की आजादी के लिए उन्होंने अपने मतभेद भुलाकर एकजुट होकर लड़ने का फैसला किया. ऐसा ही एक नाम था-लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक.
तिलक का शुरुआती जीवन
बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था. उन्हें 'लोकमान्य' कहकर संबोधित किया जाता था, जिसका अर्थ है-जिसे जनता ने अपना नेता माना हो. शुरुआती जीवन में ही शिक्षक, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनकी पहचान बन चुकी थी. उनका नारा, "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा", हिंदुस्तानियों के दिल में आजादी की अलख जगाने के लिए काफी था.
तिलक का केसरी अखबार
1880 के दशक में बाल गंगाधर तिलक ने डेक्कन एजुकेशन सोसायटी की स्थापना की ताकि लोगों को राष्ट्रवादी शिक्षा मिल सके. इसके बाद उन्होंने मराठी अखबार 'केसरी' की शुरुआत की जिसमें उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सबसे मुखर होकर लिखा.
जब जेल चले गए थे तिलक
1908 में बाल गंगाधर तिलक ने अपने अखबार 'केसरी' में ब्रिटिश सरकार को जमकर निशाने पर लिया. उन्होंने खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी जैसे क्रांतिकारियों द्वारा किए गए बम हमलों का समर्थन करने वाले विचार व्यक्त किए. उनके लेखों और तीखी भाषा से अंग्रेजी सरकार इतनी बौखला गई कि उन्हें तत्कालीन बर्मा की मांडले जेल में छह साल की सजा सुना दी गई.
उस समय बाल गंगाधर तिलक के बचाव में युवा वकील और कांग्रेस नेता मोहम्मद अली जिन्ना सामने आए. इस मामले की सुनवाई पारसी जज जस्टिस दावर कर रहे थे.

बाल गंगाधर तिलक के नारे
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जिन्ना और तिलक की दोस्ती
मोहम्मद अली जिन्ना ने पूरी मजबूती के साथ तिलक का पक्ष रखा, लेकिन वह उन्हें जेल जाने से नहीं बचा सके. हालांकि, दो साल बाद जब एक बार फिर तिलक पर राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ तब जिन्ना ने उनकी सफल पैरवी की. इस बार तिलक पर केवल जुर्माना लगाया गया और उन्हें जेल नहीं जाना पड़ा.
हिंदू-मुस्लिम को कैसे किया एकजुट?
जब मोहम्मद अली जिन्ना तिलक के वकील बने, तब दोनों के रिश्ते भी काफी मजबूत हो चुके थे. यही वजह थी कि 1916 में दोनों नेताओं के बीच लखनऊ समझौता हुआ. यह हिंदू-मुस्लिम एकता की दिशा में उस समय का सबसे महत्वपूर्ण समझौता माना जाता है. इसके तहत यह संकल्प लिया गया कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में हिंदू और मुसलमान मिलकर संघर्ष करेंगे.
हालांकि, इस समझौते के चार साल बाद, यानी 1920 में बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया. वहीं, मोहम्मद अली जिन्ना भी धीरे-धीरे कांग्रेस की राजनीति से अलग रास्ते पर चल पड़े और आगे चलकर भारत के विभाजन में उनकी अहम भूमिका रही.
मुस्लिम भी करते थे तिलक को पसंद
पूर्व भाजपा विचारक सुधींद्र कुलकर्णी बाल गंगाधर तिलक से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं. उनके मुताबिक, मुसलमानों के बीच भी तिलक की लोकप्रियता काफी अधिक थी. उनका कहना है कि 1897 में, जब ब्रिटिश सरकार ने पहली बार तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया, तब उनके बचाव के लिए कोलकाता से करीब 16 हजार रुपये की आर्थिक मदद आई थी. इनमें से सातहजार रुपये एक मुस्लिम स्वामित्व वाले व्यवसायी ने दान दिए थे.
यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि बाल गंगाधर तिलक की पहचान केवल एक हिंदू नेता के रूप में नहीं थी बल्कि उन्हें एक ऐसे राष्ट्रवादी नेता के रूप में भी देखा जाता था जिन्होंने भारत की एकता और स्वतंत्रता के लिए सभी समुदायों को साथ लेकर संघर्ष किया.
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