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अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावे की जांच में सीसीटीवी वाली मुश्किल, नृपेंद्र मिश्र ने बताया कमी कहां रह गई

नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि आंकड़ा देना बहुत मुश्किल है. इसलिए क्योंकि एक पहलू यह है कि कब से गड़बड़ी हो रही थी. एक बात यह कि आखिर दान मिला कितना था. हमने अनौपचारिक रूप से दो से तीन साल के आंकड़े देखे, जिसमें पता चला कि मासिक चंदा हर महीने 10 से 12 करोड़ रहा है.

नृपेंद्र मिश्र ने राम मंदिर के दान को लेकर एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत की और सभी सवालों के जवाब दिए.
  • नृपेंद्र मिश्र ने दान चोरी मामले में एसआईटी जांच की कोई जानकारी नहीं होने की बात कही है
  • उन्होंने कहा कि ट्रस्ट में जुड़े स्वयंसेवक बिना वेतन समाजसेवा कर रहे थे, भ्रष्टाचार व्यक्तिगत स्तर का मामला है
  • टिन्नू यादव पर दान राशि का गलत उपयोग करने के आरोप हैं, उनकी संपत्ति जांच का विषय बनी हुई है

राम मंदिर चढ़ावे को लेकर तरह-तरह की जानकारी आ रही है. सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे भी किए जा रहे हैं. ऐसे में एनडीटीवी ने इस मसले पर सीधे राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र से एक्सक्लूसिव बात की. नृपेंद्र मिश्र ने राम मंदिर में दान की चोरी को लेकर कहा कि मुझे एसआईटी की जांच की कोई जानकारी नहीं है. वह हमारे साथ जानकारी साझा भी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार के साथ शेयर करनी है. यह पता चला है कि एसआईटी बीते तीन दिनों से डेली 10 घंटे जांच कर रही है. 

ट्रस्ट में क्या साठगांठ हुई?

ट्रस्ट की साठगांठ के सवाल पर नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि कुछ लोग इस काम से जुड़े हैं और वे निश्चित तौर पर स्वयंसेवक थे. इसका अर्थ है कि वे बिना किसी वेतन के समाजसेवा कर रहे थे. ऐसे स्वयंसेवकों की सिफारिश तो निश्चित तौर पर ट्रस्ट के लोगों की ओर से हुई होगी, लेकिन साठगांठ वाली बात सही नहीं है. यह व्यक्तिगत करप्शन का मामला है, जिसमें निष्ठा को खोकर भ्रष्टाचार किया गया. 

टिन्नू यादव का मामला क्या है?

टिन्नू यादव की ओर से 40 लोगों की तैनाती दान की गिनती में किए जाने और भ्रष्टाचार में हाथ होने पर नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि यह नाम आया है. उन्होंने कहा कि वह ड्राइवर था और फिर जब ट्रस्ट स्वरूप में आया तो उसे बड़ी जिम्मेदारियां मिल गईं. यह सही है कि कुछ संवेदनशील जिम्मेदारियां भी उसके पास थीं. अब उसने कैसे विश्वास का बेजा इस्तेमाल किया, यह कहना बहुत कठिन है. इनकी ओर से क्या गलत किया गया, यह देखना होगा. आरोप है कि इन्होंने बहुत सारी संपत्ति बना ली है. उनका कहना है कि संपत्ति पहले से बनी है. इसलिए जांच का विषय है कि उन्होंने कैसे दान की राशि का बेजा इस्तेमाल किया. 

चंपत राय समेत अन्य की कितनी जिम्मेवारी?

चंपत राय समेत ट्रस्ट का नेतृत्व करने वाले लोगों की जिम्मेदारी को लेकर नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि यह संभव नहीं है कि टॉप के लोग हर चीज की निगरानी कर सकेंगे, लेकिन वे कंट्रोल पॉइंट होते हैं और उसके माध्यम से जवाबदेही तय हो सकती है. एसआईटी जांच की निष्पक्षता को लेकर नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि तीन अधिकारी हैं और वे अलग-अलग भूमिकाओं में रहे हैं. ऐसे में वे एक निष्पक्ष रिपोर्ट देंगे. राज्य सरकार चाहती है कि श्रद्धालुओं का विश्वास कायम हो. कमेटी भी यही चाहती है. इसलिए निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठता.

क्या ट्रस्ट को आगे आकर बात रखनी चाहिए थी?

इस पर नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि जो भी बयान ट्रस्ट देगा, वह आधिकारिक होगा. इसलिए वह जांच के बाद तथ्यों पर आधारित बात ही करेगा. अब जब ट्रस्ट ने जांच के लिए पत्र लिख दिया तो फिर अपनी तरफ से बयान देना ठीक नहीं है. ट्रस्ट ने आंतरिक तौर पर ऑडिट की बात कही थी और फिर एसआईटी गठित कराई.

तो आखिर कितने करोड़ रुपये का गबन हुआ? 

नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि आंकड़ा देना बहुत मुश्किल है. इसलिए क्योंकि एक पहलू यह है कि कब से गड़बड़ी हो रही थी. एक बात यह कि आखिर दान मिला कितना था. हमने अनौपचारिक रूप से दो से तीन साल के आंकड़े देखे, जिसमें पता चला कि मासिक चंदा हर महीने 10 से 12 करोड़ रहा है. पिछले 11 महीने में 16 करोड़ लोगों ने दर्शन किए. इसके आधार पर ट्रस्ट ने कहा कि 83 करोड़ रुपये आए हैं. इसका अनुपात निकाला जाए तो हर व्यक्ति 5 रुपये दान कर रहा है. इस पर नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि यह तो कम लग रहा है. मैं समझता हूं कि अधिकांश लोगों ने इससे अधिक ही दान किया होगा. 

दान के पैसे से राम मंदिर का निर्माण हुआ?

इस पर मिश्रा ने कहा कि निर्माण समिति से कोई ब्योरा एसआईटी ने नहीं मांगा है. उन्होंने कहा कि कोई भी पेमेंट निर्माण समिति नहीं करती. हमारे पास कोई संसाधन नहीं हैं, सिर्फ 5 लोग हैं. शुरुआत में जो चंदा जुटा था, उसमें 3200 करोड़ रुपये मिले थे. वह एकदम अलग रखा गया है. उन्होंने कहा कि फाइनेंशल ट्रांजेक्शन ट्रस्ट ही करता है. हर दिन आने वाले चढ़ावे का इस्तेमाल अलग होता है. इससे दिन-प्रतिदिन का खर्च निकलता है. वेतन, आयोजन, मुफ्त भोजन की व्यवस्था इससे होती है. प्रतिदिन करीब 2000 लोग खाना खाते हैं. इसके अलावा पहले जो दान आया था, उसका इस्तेमाल सिर्फ निर्माण में होता है. उसका खर्च मेंटनेंस में नहीं होता है. 

क्या सीसीटीवी फुटेज गायब हैं? 

इस पर नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज की एक अवधि होती है. जैसे मोबाइल में मैसेज के लिए एक सिस्टम है कि आप कितने दिन के लिए चाहते हैं? इसी तरह डोनेशन रूम में लगे सीसीटीवी फुटेज के स्टोरेज की अवधि 45 दिन ही है. इसलिए अब वह उपलब्ध नहीं है. उसे डिजिटल अर्काइव नहीं किया जा सका. ऐसे में जांच में यह समस्या आएगी.

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लेखक के बारे में
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विजय शंकर पांडेय
चीफ सब एडिटर
देश और दुनिया देखने और समझने का कौतूहल बचपन से रहा. हिन्दी और संस्कृत से मेलजोल पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण हुआ. युवा होते ही राजनीति दिलचस्प लगने लगी... और पढ़ें
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