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This Article is From Dec 02, 2020

यौन हिंसा के आरोपी को राखी बांधने वाले आदेश पर SC में बोले अटॉर्नी जनरल- 'ज्युडिशियरी में महिलाओं...'

बुधवार को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित दलीलें दाखिल कर कहा है कि न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए. इससे यौन हिंसा से जुड़े मामलों में ज्यादा संतुलित और सशक्त दृष्टिकोण अपनाया जा सकेगा.

यौन हिंसा के आरोपी को राखी बांधने वाले आदेश पर SC में बोले अटॉर्नी जनरल- 'ज्युडिशियरी में महिलाओं...'
MP हाईकोर्ट के एक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में हो रही है बहस. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
नई दिल्ली:

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) ने कुछ महीनों पहले छेड़छाड़ के आरोपी को पीड़िता से राखी बंधवाने का आदेश दिया था, जिसके बाद इसके विरोध में कई महिला वकील सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंच गई थी. अब इस फैसले का विश्लेषण सुप्रीम कोर्ट में हो रहा है. बुधवार को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित दलीलें दाखिल कर कहा है कि न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए. इससे यौन हिंसा से जुड़े मामलों में ज्यादा संतुलित और सशक्त दृष्टिकोण अपनाया जा सकेगा.

AG ने कहा कि कभी कोई महिला भारत की मुख्य न्यायाधीश नहीं रही है. सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों की क्षमता है लेकिन सिर्फ दो ही महिला जज हैं. AG ने विभिन्न हाईकोर्ट व ट्रिब्यूनल की जानकारी भी दी है. पीड़िता को राखी बांधने के लिए यौन उत्पीड़न के आरोपी को जमानत देने के मामले में ये लिखित दलीलें दी गई हैं.

SC ने की थीं सख्त टिप्पणियां

पिछली सुनवाई में अटॉर्नी जनरल ने आरोपियों को पीड़िता से राखी बंधवाने के लिए कहने के मप्र हाईकोर्ट के आदेश पर टिप्पणी की थी कि इस नाटक की निंदा की जानी चाहिए और ऐसा लगता है कि अदालत अपने दायरे से बाहर चली गई है. जजों को शिक्षित करने की जरूरत है. जज भर्ती परीक्षा में लिंग संवेदीकरण का एक हिस्सा होना चाहिए. जजों,  राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी और राज्य न्यायिक अकादमी के लिए परीक्षा में लैंगिक संवेदनशीलता पर कार्यक्रम होना चाहिए. 

कोर्ट ने कहा था कि जब तक संवेदनशीलता का संबंध है, लिंग संवेदीकरण और शिकायत निवारण समिति सुप्रीम कोर्ट में है. जिला और अधीनस्थों अदालतों के अलावा हाईकोर्ट में भी लिंग संवेदीकरण के बारे में लेक्चर दिए जाने की जरूरत है.

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SC ने एजी, याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेपकर्ताओं से इस मुद्दे पर नोट प्रसारित करने को कहा था. पहले सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर अटॉर्नी जनरल के के के वेणुगोपाल की मदद मांगी थी. बता दें कि 9 महिला वकीलों ने जमानत की शर्त को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. दलीलों में कहा गया है कि इस तरह के आदेश महिलाओं को एक वस्तु की तरह दिखाते हैं.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल 30 जुलाई को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने छेड़छाड़ के आरोपी को सशर्त जमानत दी थी. शर्त यह थी कि आरोपी रक्षाबंधन पर पीड़ित के घर जाकर उससे राखी बंधवाएगा और रक्षा का वचन देगा. अप्रैल में पड़ोस में रहने वाली महिला के घर में घुसकर छेड़छाड़ के आरोप में जेल में बंद विक्रम बागरी ने इंदौर में जमानत याचिका दायर की थी.

सभी पक्षों के तर्क सुनने के बाद जस्टिस रोहित आर्या की सिंगल बेंच ने आरोपी को 50 हजार के मुचलके के साथ जमानत दी. उसमें शर्त यह भी थी कि वह 3 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन 11 बजे अपनी पत्नी को साथ लेकर पीड़ित के घर राखी और मिठाई लेकर जाएगा और पीड़िता से आग्रह करेगा कि वह उसे भाई की तरह राखी बांधे. इसी के साथ विक्रम पीड़ित की रक्षा का वचन देकर भाई के रूप में परंपरा अनुसार उसे 11 हजार रुपए देगा और पीड़िता के बेटे को भी 5 हजार रुपये कपड़े और मिठाई के लिए देगा. इतना ही नहीं, इस सबकी तस्वीरें रजिस्ट्री में जमा कराने के निर्देश भी कोर्ट ने दिए थे. 

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