कहते हैं कि जब इंसान के हौसले बुलंद हों, तो मुश्किल से मुश्किल रास्ता भी मंजिल तक पहुंचा सकता है. ग्रेटर नोएडा की 44 वर्षीय पैरा एथलीट सुवर्णा राज ने इसे सच कर दिखाया है. दो साल की उम्र में पोलियो के कारण कमर के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया, लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी को मजबूरी के भरोसे नहीं छोड़ा. खेल को अपना जुनून बनाया और अब एशियन पैरा गेम्स 2026 में महिला एफ54 डिस्कस थ्रो स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है. उनकी कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि हिम्मत, मेहनत और खुद पर भरोसा रखने की मिसाल है. एशियन पैरा गेम्स 2026 में गोल्ड मेडल के मिलते ही सुवर्णा को एक साथ अलग-अलग राज्यों से नौकरी का ऑफर मिला है.
गोल्ड जीतते ही दो राज्यों में नौकरी का मिला ऑफर
साल 2017 से लगातार मेडल जीत रहीं सुवर्णा को नौकरी के लिए कभी कोई ऑफर नहीं मिला, लेकिन एशियन पैरा गेम्स 2026 में डिस्कस थ्रो का गोल्ड जीतते ही उन्हें दो राज्यों से नौकरी के प्रस्ताव मिले हैं. पैरालंपिक खिलाड़ी और एशियन पैरा गेम्स 2026 की स्वर्ण पदक विजेता सुवर्णा राज दिल्ली की राज्य दिव्यांग आयुक्त नियुक्त की जाएंगी. एलजी तरनजीत सिंह संधू ने चयन समिति की ओर से सुझाए गए तीन उम्मीदवारों के पैनल में से उनके नाम को अंतिम मंजूरी दी है. वहीं, सीएम योगी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए एशियन पैरा गेम्स-2026 में महिलाओं की डिस्कस थ्रो F54 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली सुवर्णा राज को हार्दिक बधाई दी. उन्होंने कहा कि अथक परिश्रम और अटूट संकल्प से अर्जित सुवर्णा की यह स्वर्णिम उपलब्धि असंख्य बेटियों के सपनों को नई उड़ान देने वाली है. मुख्यमंत्री योगी ने उनके स्वर्णिम भविष्य के लिए अनंत मंगलकामनाएं भी व्यक्त की. सुवर्णा का कहना है कि इतने साल तक खेल में उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद नौकरी का मौका नहीं मिला, लेकिन अब एक साथ दो ऑफर आने से उनके सामने यह सवाल है कि आखिर किस राज्य में जॉइन करें. हालांकि आधिकारिक तौर पर उनके पास कोई पत्र नहीं आया है.
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दो साल की उम्र में पोलियो ने बदली जिंदगी
सुवर्णा राज की जिंदगी की चुनौतियां बचपन से ही शुरू हो गई थीं. महज दो साल की उम्र में पोलियो के कारण उनके दोनों पैर प्रभावित हुए और कमर के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया. बचपन अस्पतालों और इलाज के बीच गुजरा. परिवार ने कई तरह के उपचार आजमाए, लेकिन उनकी जिंदगी की राह आसान नहीं हुई. करीब छह साल की उम्र में उन्हें दिव्यांग बच्चों के छात्रावास में भेज दिया गया. पहली से दसवीं कक्षा तक उन्होंने अलग-अलग हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की. लोगों की घूरती नजरें और ताने भी उनके सामने आए, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी. आगे चलकर उन्होंने कॉमर्स और एजुकेशन में स्नातक की डिग्री हासिल की.

खेल बना जिंदगी का सहारा
सुवर्णा को खेलों से हमेशा लगाव रहा. उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में गोला फेंक, चक्का फेंक और भाला फेंक जैसी स्पर्धाओं में हिस्सा लिया. पावरलिफ्टिंग में भी पदक जीते. धीरे-धीरे खेल उनके लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाने का जरिया बन गया. साल 2017 में उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में अपना सफर शुरू किया. कड़ी मेहनत और नियमित अभ्यास के दम पर वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने लगीं. वह एक खिलाड़ी होने के साथ-साथ एक्सेसिबिलिटी कंसल्टेंट और एक्सेस ऑडिटर के तौर पर भी काम करती हैं.
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पांचवें प्रयास में जीता गोल्ड मेडल
एशियन पैरा गेम्स 2026 में सुवर्णा ने महिला एफ54 डिस्कस थ्रो स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया. नागोया में आयोजित मुकाबले के दौरान उन्होंने अपने पांचवें प्रयास में 15.66 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया. ईरान की शाहला हदीदी ने 15.45 मीटर के थ्रो के साथ रजत पदक जीता, जबकि वियतनाम की थी न्गोक थुय गुयेन ने 14.65 मीटर के प्रदर्शन के साथ कांस्य पदक हासिल किया. सुवर्णा ने बताया कि रजत पदक विजेता के बीच महज 21 सेंटीमीटर का अंतर रहा.

मां बनने के बाद भी नहीं छोड़ा खेल
सुवर्णा की जिंदगी में खेल के साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी आईं. शादी के बाद मां बनने पर उन्होंने कुछ समय के लिए खेल से ब्रेक लिया, लेकिन बाद में फिर वापसी की. उन्होंने टेनिस में भी हाथ आजमाया और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया. साल 2015 में उन्हें युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय की ओर से राष्ट्रीय युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. 2026 में भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते. अब एशियन पैरा गेम्स का गोल्ड उनके करियर की एक और बड़ी उपलब्धि है. सुवर्णा राज की कहानी बताती है कि जिंदगी में चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मेहनत और लगातार प्रयास से अपनी पहचान बनाई जा सकती है. उनकी सफलता उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल हालात के बावजूद अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं.
- साथ में इशिका वर्मा का इनपुट
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