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कंटेंट पब्लिशर का, कमाई कंपनियों की...रेवेन्यू शेयरिंग का ये मॉडल क्यों गलत? अश्विनी वैष्णव भी चाहते हैं बदलाव

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियों को कंटेंट बनाने वालों के साथ रेवेन्यू का बंटवारा करना चाहिए. उन्होंने कहा कि पूरे डिजिटल इकोसिस्टम में एक निष्पक्ष रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल को लागू किया जाना चाहिए.

कंटेंट पब्लिशर का, कमाई कंपनियों की...रेवेन्यू शेयरिंग का ये मॉडल क्यों गलत? अश्विनी वैष्णव भी चाहते हैं बदलाव
  • अश्विनी वैष्णव ने टेक कंपनियों को कंटेंट क्रिएटर्स के साथ रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल लागू करने की आवश्यकता बताई है
  • केंद्रीय मंत्री ने कहा कि निष्पक्ष रेवेन्यू शेयरिंग से डिजिटल कंटेंट इकनॉमी मजबूत होगी
  • अगर कंपनियां रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल नहीं अपनाती हैं तो भारत में इसके लिए कानून लाया जाएगा
नई दिल्ली:

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि सोशल मीडिया और टेक कंपनियों को कंटेंट बनाने वालों के साथ अपने रेवेन्यू का बंटवारा करना चाहिए. उन्होंने कहा कि पत्रकार, मीडिया संस्थान, इन्फ्लुएंसर, प्रोफेसर और रिसर्चर सभी इन कंपनियों की डिजिटल कमाई में हिस्सेदारी के हकदार हैं. 

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) कॉन्क्लेव 2026 में वैष्णव ने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अपनी रेवेन्यू शेयरिंग नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा. उन्होंने कहा कि जो लोग असली कंटेंट बनाते हैं, उन्हें उनकी मेहनत का वाजिब हिस्सा मिलना ही चाहिए. अब हर जगह इस नियम को ठीक करना होगा.

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पूरे डिजिटल इकोसिस्टम में एक निष्पक्ष रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल को लागू किया जाना चाहिए. जो लोग कंटेंट तैयार कर रहे हैं, चाहे वो न्यूज प्रोफेशनल हों, दूर-दराज के इलाकों के क्रिएटर्स हों या अपनी रिसर्च साझा करने वाले एक्सपर्ट हों... वो सभी प्लेटफॉर्म पर होने वाली कमाई में उचित हिस्सेदारी पाने के हकदार हैं. 

केंद्रीय मंत्री को क्यों उठानी पड़ी आवाज

कोई भी सोशल मीडिया कंपनी या टेक प्लेटफॉर्म इसलिए चल रहा है, क्योंकि उस पर क्रिएटर्स, मीडिया संस्थान अपना कंटेंट डाल रहे हैं. लेकिन जब बात कमाई की आती है तो मुनाफा इन कंपनियों के पास चला जाता है. 

अश्विनी वैष्णव ने कहा कि प्लेटफॉर्म को अपलोड किए गए कंटेंट से बड़ा मुनाफा मिलता है, इसलिए क्रिएटर्स, मीडिया संस्थानों को भी इसका हिस्सा मिलना चाहिए. उनका कहना है कि रेवेन्यू शेयरिंग में पारदर्शिता और निष्पक्षता होने से भारत की डिजिटल कंटेंट इकनॉमी मजबूत होगी.

केंद्रीय मंत्री के इस बयान का मतलब ये हुआ कि जब सोशल मीडिया और टेक प्लेटफॉर्म क्रिएटर्स और मीडिया संस्थानों द्वारा तैयार कंटेंट से पैसा कमा रहे हैं तो उन्हें अपनी कमाई इन क्रिएटर्स या मीडिया संस्थानों के साथ साझा भी करनी चाहिए.

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और अगर कंपनियां नहीं मानी तो...?

अश्विनी वैष्णव ने साफ-साफ कहा है कि अगर कंपनियां अपनी मर्जी से रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल लेकर नहीं आतीं तो कानून लाया जाएगा. उन्होंने कहा कि कंटेंट बनाने वालों के साथ रेवेन्यू क बंटवारा होना ही चाहिए. अगर प्लेटफॉर्म इसे मर्जी से नहीं करते हैं तो दुनिया के कई देशों ने दिखाया है कि इसे कानूनी तरीके से कैसे करवाया जा सकता है.

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तो अभी क्या भारत में कोई नियम नहीं है?

नहीं. भारत में अभी ऐसा कोई नियम नहीं है जो सोशल मीडिया कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को कंटेंट क्रिएटर्स के साथ रेवेन्यू शेयरिंग करने के लिए बाध्य करते हों. भारत की डिजिटल इकनॉमी तेजी से बढ़ रही है. मार्च 2024 में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) और EY की एक रिपोर्ट आई थी. 

इसमें दावा किया गया था कि डिजिटल मीडिया कंपनियों ने एडवर्टाइजिंग से 41,469 करोड़ रुपये का रेवेन्यू कमाया था. लेकिन डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स को सिर्फ 2,345 करोड़ रुपये ही मिले थे. ये दिखाता है कि डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म और पत्रकारों के लिए रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल कितना जरूरी है. 

पिछले साल जुलाई में एड-टेक इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग फर्म Kofluence की एक रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट में सामने आया था कि भारत के सिर्फ 13% कंटेंट क्रिएटर्स ही हैं, जिन्हें कमाई हो रही है. इसमें बताया गया था कि भारत में 35 से 45 लाख कंटेंट क्रिएटर्स हैं और क्रिएटर इकनॉमी हर साल 22 फीसदी की दर से बढ़ रही है. इसके बावजूद सिर्फ 4.5 से 6 लाख क्रिएटर्स ही ऐसे हैं जिन्हें अपने काम का पैसा मिल रहा है.

दुनिया में क्या कोई रेवेन्यू शेयरिंग पर नियम है?

भारत में फिलहाल कोई कानून या नियम नहीं है जो डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया कंपनियों को अपना रेवेन्यू शेयर करने के लिए मजबूर करे. लेकिन दुनिया के कई देशों में रेवेन्यू शेयरिंग को लेकर नियम-कायदे हैं.

सबसे चर्चित ऑस्ट्रेलिया है, जहां 2021 में ही न्यूज पब्लिशर्स के साथ रेवेन्यू शेयरिंग को लेकर कानून बना दिया गया था. फेसबुक और गूगल जैसे कंपनियों ने ऑस्ट्रेलिया से जाने की धमकी भी दी थी लेकिन सरकार नहीं झुकी. आखिरकार कंपनियों को ही झुकना पड़ा और अब उन्हें न्यूज पब्लिशर्स के साथ रेवेन्यू शेयर करना होता है.

ऑस्ट्रेलिया के बाद कई यूरोपीय देशों में भी रेवेन्यू शेयरिंग को लेकर नियम बनाए गए हैं, जो कानूनी रूप से सोशल मीडिया कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपना रेवेन्यू कंटेंट क्रिएटर्स के साथ साझा करने के लिए बाध्य करता है.

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