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अनंत सिंह की विधायकी पर संकट, लेकिन क्या कानूनी पेच बनेगा ढाल? जानें दो MLC का मामला इससे कैसे है अलग

अब विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार को अनंत सिंह का जवाब और जदयू की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों का परीक्षण करना होगा. उनका निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी रहेगा और अदालत में चुनौती दी जा सकती है. इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी.

अनंत सिंह की विधायकी पर संकट, लेकिन क्या कानूनी पेच बनेगा ढाल? जानें दो MLC का मामला इससे कैसे है अलग
अनंत सिंह
ANI
पटना:

बिहार में अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता को लेकर विवाद गहरा गया है. JDU से 6 साल के लिए निष्कासित किए जाने के बाद विधानसभा सचिवालय ने उन्हें नोटिस जारी कर 7 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा है. पार्टी का आरोप है कि अनंत सिंह ने विधान परिषद चुनाव में जदयू के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ प्रचार किया और जन सुराज के प्रत्याशी का समर्थन किया. इसी आधार पर जदयू ने विधानसभा अध्यक्ष से उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की है. लेकिन इसी बीच दो निर्दलीय विधान पार्षदों का भाजपा के साथ जाना इस पूरे विवाद को नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ दे रहा है. बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज हाल ही में विधान परिषद का चुनाव जीते थे. दोनों ने पहले भाजपा में शामिल होने की बात कही थी. लेकिन विवाद बढ़ने पर उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने केवल BJP को समर्थन दिया है, पार्टी की सदस्यता नहीं ली है. भाजपा ने भी बाद में यही रुख अपनाया. दूसरी ओर, जन सुराज ने दोनों के खिलाफ विधान परिषद के सभापति के समक्ष सदस्यता समाप्त करने की मांग की है.

संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल कानून) में निर्दलीय और किसी राजनीतिक दल के टिकट पर निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं. दल-बदल कानून के पैरा 2(2) के अनुसार, यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है. ऐसे में राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उन्होंने वास्तव में भाजपा की सदस्यता ली थी या केवल समर्थन दिया था. यदि सदस्यता लेने के प्रमाण मिलते हैं तो उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है. केवल समर्थन देने से सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होती.

अनंत सिंह का मामला क्यों अलग? 

वहीं, अनंत सिंह का मामला पूरी तरह अलग है. वह JDU के टिकट पर विधायक चुने गए हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार किया. दल-बदल कानून के पैरा 2(1)(a) के तहत यदि कोई विधायक अपने आचरण से यह संकेत देता है कि उसने स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है. इसके लिए औपचारिक रूप से पार्टी से इस्तीफा देना आवश्यक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में कह चुका है कि किसी विधायक के व्यवहार और गतिविधियों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने पार्टी छोड़ दी है.

हालांकि, अनंत सिंह के मामले में केवल पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार करना ही सदस्यता समाप्त होने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता. यह देखना होगा कि उनका आचरण वास्तव में पार्टी छोड़ने जैसा था या फिर इसे पार्टी के भीतर असहमति और बगावत के रूप में देखा जाए. उन्होंने विधानसभा में पार्टी व्हिप का उल्लंघन नहीं किया है. इसलिए यह मामला व्हिप तोड़ने का नहीं, बल्कि स्वेच्छा से पार्टी छोड़ने की व्याख्या से जुड़ा हुआ है.

राजनीतिक तौर पर अनंत सिंह यह सवाल उठा सकते हैं कि जदयू समर्थित उम्मीदवार को हराने वाले दो निर्दलीय एमएलसी के मामले में भाजपा और अन्य दलों का रवैया अलग क्यों है, जबकि उनके खिलाफ सदस्यता समाप्त करने की मांग की जा रही है. लेकिन कानूनी दृष्टि से दोनों मामले अलग-अलग हैं. निर्दलीय एमएलसी के लिए किसी दल की सदस्यता ग्रहण करना अयोग्यता का आधार हो सकता है, जबकि अनंत सिंह के मामले में उनके आचरण से पार्टी छोड़ने का निष्कर्ष निकलता है या नहीं, यही मुख्य सवाल है.

विधानसभा में साक्ष्यों का परीक्षण होगा? 

अब विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार को अनंत सिंह का जवाब और जदयू की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों का परीक्षण करना होगा. उनका निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी रहेगा और अदालत में चुनौती दी जा सकती है. इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी. जदयू ने राजनीतिक कार्रवाई जरूर कर दी है, लेकिन सदस्यता रद्द कराने के लिए उसे दल-बदल कानून की निर्धारित शर्तों को साबित करना होगा.

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