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'बस 2 लोगों को जोड़ना है...' घर-घर मर्सिडीज का सपना बेचने वाली Amway के साथ क्या हुआ?

Amway india loss: सफेदपोश सेमिनार, मर्सिडीज के वादे और सर्किल वाला नेटवर्क. कभी भारत के हर घर तक पहुंचने वाली Amway का तिलिस्म अब टूट रहा है. समझिए डायरेक्ट सेलिंग की यह अनदेखी कहानी.

'बस 2 लोगों को जोड़ना है...' घर-घर मर्सिडीज का सपना बेचने वाली Amway के साथ क्या हुआ?

Amway india mlm business model crisis: कोट-पैंट में एक चमकता हुआ चेहरा, हाथ में मार्कर और सामने व्हाइट बोर्ड. एक बड़ा गोला, उसके नीचे दो गोले, और उन दो के नीचे चार और गोले. डायलॉग वही पुराना "बस दो लोगों को जोड़ना है, फिर वो दो और को जोड़ेंगे. आप सोएंगे और आपके खाते में डॉलर बरसेंगे. 9 से 5 की नौकरी को कहिए अलविदा, घर के बाहर खड़ी होगी चमचमाती मर्सिडीज और हाथ में होगा विदेश का टिकट." इसे कहते हैं MLM यानी मल्टी-लेवल मार्केटिंग. सपनों की इस 'सर्किल वाली माया' को 90 के दशक में भारत के घर-घर तक पहुंचाने वाला सबसे बड़ा नाम था एमवे (Amway). हम में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसके घर में कभी इसका प्रोटीन पाउडर, टूथपेस्ट या लिक्विड क्लीनर न पहुंचा हो. लेकिन आज उन सुनहरे दावों की जमीनी हकीकत क्या है?

आंकड़े गवाही दे रहे हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में एमवे इंडिया को करीब 74.25 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है. पिछले साल यह 53 करोड़ था, यानी घाटा कम होने के बजाय और गहरा गया. कंपनी की आमदनी भी 10.5% लुढ़क गई. अब बड़ा सवाल यह है कि दूसरों को करोड़पति बनाने का फॉर्मूला बेचने वाली कंपनी खुद घाटे के भंवर में क्यों फंस गई?

बेसमेंट से शुरू हुआ 'सपनों का सौदा'

कहानी 1959 की है. अमेरिका के मिशिगन में दो जिगरी दोस्त रिच डिवोस और जे वैन एंडेल ने अपने घर के बेसमेंट से एक कंपनी खड़ी की. नाम रखा 'अमेरिकन वे' यानी Amway.

इनका मॉडल क्रांतिकारी था. कंपनी ने कहा कि हम टीवी पर करोड़ों के विज्ञापन नहीं देंगे, न ही थोक और फुटकर दुकानदारों की चेन बनाएंगे. हमारा विज्ञापन और सेल्समैन आम इंसान ही होगा. मॉडल तीन पहियों पर दौड़ता था.

खुद सामान बेचो और मार्जिन कमाओ.

दोस्तों-रिश्तेदारों को जोड़कर नेटवर्क (डाउनलाइन) बनाओ.

पूरी टीम की बिक्री पर मोटा कमीशन और बोनस पाओ.

लेकिन यहीं से एक महीन लकीर धुंधली होने लगी, क्या यह असली कारोबार है या सिर्फ नए लोगों को फंसाने वाली पिरामिड स्कीम?

1975 में अमेरिकी रेगुलेटर FTC ने शिकंजा कसा, लेकिन 70% स्टॉक बेचने की शर्त और बायबैक गारंटी जैसे कड़े नियमों के चलते एमवे बच निकली.

भारत में एंट्री और 'सफेदपोश' क्रांति

1998 में जब एमवे ने भारत में कदम रखा, तो देश आर्थिक उदारीकरण के दौर से गुजर रहा था. मिडिल क्लास अपनी बंदिशों को तोड़ना चाहता था. एमवे ने नब्ज पकड़ी "पार्ट-टाइम काम, फुल-टाइम रईसी."

हाउसवाइफ्स, छोटे शहरों के नौजवान और नौकरीपेशा लोग इसके मुरीद बन गए. घर-घर डेमो होने लगे, मोटिवेशनल सेमिनार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंजने लगी.

लेकिन भारत में एक पेंच हमेशा फंसा रहा, डायरेक्ट सेलिंग और गैरकानूनी मनी सर्कुलेशन के बीच का फर्क.

2011 से कानून का शिकंजा कसना शुरू हुआ. केरल से लेकर आंध्र प्रदेश तक छापे पड़े. 2013-14 में कंपनी के तत्कालीन सीईओ विलियम पिनकनी की गिरफ्तारी हुई. इसके बाद 2022 में ED ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत कंपनी की 757 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्तियां अटैच कर लीं. आरोप लगा कि महंगे दामों पर प्रोडक्ट बेचकर पिरामिड फ्रॉड चलाया जा रहा है.

बाजार बदला तो एमवे को लगे ये 5 बड़े झटके

कानूनी मार तो थी ही, लेकिन एमवे की कमर असल में बदली हुई दुनिया ने तोड़ी.

ई-कॉमर्स की दस्तक: 20 साल पहले विदेशी सप्लीमेंट्स मिलना मुश्किल था. आज Amazon और Flipkart पर एक क्लिक में हजारों ऑप्शन मौजूद हैं. किसी डिस्ट्रीब्यूटर की मिन्नतें करने की जरूरत ही नहीं बची.

D2C ब्रांड्स की बाढ़: Mamaearth, Minimalist, Plum और MuscleBlaze जैसे नए दौर के ब्रांड्स ने सीधे ग्राहकों तक सस्ती और बेहतरीन चीजें पहुंचाईं. एमवे के महंगे प्रोडक्ट्स कमीशन के बोझ तले दब गए.

इंटरनेट और एक्सपोजर: पहले सेमिनारों में जो बोल दिया जाता था, वही सच था. आज यूट्यूब और गूगल पर एक सर्च करते ही 'MLM की सच्चाई' और पिरामिड स्कीम्स की पोल खुल जाती है.

इन्फ्लुएंसर कल्चर: जो काम पहले रिश्तेदार घर आकर करते थे, वो आज इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स सेकंड्स में कर रहे हैं. नई पीढ़ी अब 'रिश्तेदारी के दबाव' में नहीं, 'ऑनलाइन रिव्यू' देखकर खरीदारी करती है.

खुलती आंखें और गिरता भरोसा: कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च बताती हैं कि खर्च और सेमिनार की फीस जोड़ने के बाद करीब 99% लोग MLM में पैसा गंवाते हैं. चंद कामयाब चेहरों की चमक के पीछे लाखों डूबे हुए सपनों की दास्तान थी.

भारत में डायरेक्ट सेलिंग इंडस्ट्री आज भी 23 हजार करोड़ से ज्यादा की है. वेस्टीज और मोदीकेयर जैसी घरेलू कंपनियां नए अंदाज में चल भी रही हैं. लेकिन वो दौर लद गया जब सिर्फ बड़े सपने दिखाकर जेबें खाली कराई जा सकती थीं.

चलते-चलते एक बात हमेशा याद रखिए, अगर किसी सिस्टम में कमाई सामान की असली मांग से नहीं, बल्कि नए लोगों को फंसाने से हो रही हो तो सावधान हो जाइए. क्योंकि असली दौलत मेहनत और वैल्यू से बनती है, तालियों की गड़गड़ाहट और खोखले वादों से नहीं.

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